Friday, 29 January 2016

रंग विषयाधारित

रंग (विषयाधारित) 'अब तुम भी अपना रंग दिखाओगी मुझे?, नही मेम साहब रंग नही, सच में मैं, अब काम छोड़ रही हूँ, मेरा मर्द अब सरकारी अस्पताल में ठेके में चपरासी की नौकरी लगा है। अब मैं भी आपकी तरह मेम बनकर घर पर बैठेगी !,बहुत अरसे से हसरत थी। मेम साहब…" मेम साहब mrs. ममता सिंह  निशब्द;|
शान्ति पुरोहित

Wednesday, 27 January 2016

नियति

नियति
शादी होने में अभी वक़्त था कि सड़क दुर्घटना में रमा का चेहरा विकृत हो गया, सिर्फ एक बार रवि का फोन आया था।
तीन साल होने को आये एक बार भी आकर देखा नही,
शायद अंतर की सुंदरता उसके लिए कोई मायने नही रखती।
अचानक रवि ने रमा को सामने देखा तो अचकचा कर बोला रमा तुम ! हाँ मैं, ही हूँ, मनोज ने मुझे सहारा दिया , आज तो दो कम्पनियों की मालिक हूँ।
तुम्हे तो पता ही था तुम्हारी सुंदरता का ही मैं पुजारी था। रमा! कहाँ खो गयी फिर अतीत में विचरण करने लगी हो क्या?, मनोज ने झिंझोड़ते हुए रमा से कहा।
शान्ति पुरोहित

Friday, 22 January 2016

माँ भारती

"देश की रक्षा के लिए किये जा रहे युद्ध में आज वीर सैनिक रघुवीर प्रताप सिंह की बहुत जरूरत महसूस की जा रही है, अभी भी रवानगी में कुछ दिन बाकी है! 
काश वो पहुँच ही जाये।, सेना के बड़े अधिकारी आपस में विचार विमर्श कर रहे थे।,
"माँ , मेरे अलावा तुम्हे देखने वाला कोई नही है ! कैसे छोड़ जाऊँ अकेला इस हालत में ,ये मुझसे नही होगा।
गम्भीर बीमारी से जूझते हुए अस्पताल के बेड पर पड़ी हुई माँ को रघुवीर प्रताप ने कहा।
अरे ! बेटा इस माँ को देखने वाला तो अस्पताल का डॉ है ,पर भारत माँ की रक्षा के लिए तो तुम वीर जवान ही हो जो अपनी जान की परवाह न करते हुए माँ की रक्षा के लिए तैनात रहते हो।, जाओ बेटा भारत माँ तुम्हारी राह देख रही है। , 
शान्ति पुरोहित

Monday, 18 January 2016

यह कैसा स्वप्न

 कैसा यह स्वप्न
दादाजी , आज हम दोनों साथ-साथ खाना खाएंगे, साथ ही रात्रि सैर करने भी जायेंगे।,
कितने दिन हुए है, शतरंज की बाजी भी नही खेली।
दादी को भी टेनिस में हराना है।
मेरा दोस्त पल्लव हमेशा कहता रहता है कि "तेरे दादा-दादी तुझे कितना प्यार करते है हमेशा तेरे साथ भी रहते है।
तेरा होम - वर्क भी करवा देते होंगे न!
मेरे दादा- दादी तो बहुत दूर चले गए ,जब भी वो आते थे हम बहुत मस्ती करते थे।
दादा जी आज आज वादा करो कभी हमे छोड़ कर गाँव अकेले रहने नही जाओगे।,
आठ वर्ष का नन्हा नीरव सोते में कब से बड़बड़ा रहा है,पास ही में नीरव् के पापा सोच रहे है यह कैसा स्वप्न है । ग्लानि भरे भाव से पत्नी रमा की और ताक रहे है कि काश....
शान्ति पुरोहित

अनजानी राह

अनजानी राह
सतविंदर कभी अपनी माँ से एक दिन के लिए भी दूर नही गया।
स्कूल भी जाता तो वापस आकर माँ से लिपट जाता था।
बेहद शर्मीले स्वभाव का लड़का था सतविंदर।
बुरे दोस्तों की संगत में ऐसा पड़ा कि घर से रिश्ता ही टूट गया ।
दोस्तों ने उसे एक अनजानी राह पर भटकने के लिए छोड़ दिया।
अभी तक उसने ऐसा कोई काम नही किया जिससे वो जीवन की मुख्य धारा में फिर से न लौट सके ।
यह सब सोचते-सोचते सतविंदर के पिता को एक राह सूझी जिससे उनका बेटा अनजानी राह से फिर से सही राह पर आ सके।
उन्होंने पेपर में यह छपवा दिया कि "सतविंदर की माँ नही रही पिता बहुत परेशान है तुम जहाँ भी हो आ जाओ ।
चाचा जी एक लड़के ने आपके लिए यह लिफाफा दिया है।
खोल कर देखा तो उसमे कुछ रुपये निकले और फटा हुआ कागज का टुकड़ा जिसमे लिखा था ' माँ के अंतिम संस्कार के लिए कुछ पैसे भेज रहा हूँ अपना ख्याल रखियेगा ,आपका बेटा शतविन्दर
शान्ति पुरोहित

हम बहुत कुछ है

पापा मेरा रिजल्ट आगया , देखो मैं भी अपनी चारो बड़ी बहनो से कम नही हूँ!, 
रीना हाँफती हुई आयी और पापा के पैर छूने झुकी, इतने में पापा ने उसे उठाकर गले लगाया।
गर्व से पापा का सीना चौड़ा हो गया ।
" देखो आज मेरी सभी बेटियां प्रशासनिक सेवा में चयनित हो गयी ! गदगद होते गए पत्नी सुरेखा से कहा।
परिवार में सब लोग कितना सुनाते थे, मेरी बेटियो को हीन भावना से देखते थे। बेटा नही बन सकती बेटियां सास तो हमेशा सर पर ही सवार रहती थी।
मम्मी ! मुहँ खोलो कहाँ खो गयी आप ! बिसरी बाते भूल जाओ , सेलिब्रेशन की तैयारी करो।
बेटी बेटे से कम नही माँ।
शान्ति पुरोहित

छुआछूत ,पेट पूजा

"छुआछूत "
पेट पूजा 
भोजन की सख्त जरूरत महसूस की जा रही थी, सभी शिकारी थक चुके थे।वापस जंगल से शहर का लंबा रास्ता तय करने के लिए शरीर में ऊर्जा की अति आवश्यकता थी।
" आप सब बहुत थके हुए, और भूख से बेहाल लग रहे हो , उच्च जाति के लोग लग रहे हो, निम्न जाति के व्यक्ति की भावना की कद्र करते हो तो खाना खा लो।
सुबह से शाम हो गयी है, आपको भूख तो अवश्य ही लगी होगी ।, जंगल में रहने वाले दंपति ने विनंती भरे लहजे में कहा। 
कल शाम से ही पेट में अन्न का एक दाना भी नही गया, मैं तो खा रहा हूँ ! उनमे से जिन पर जात -पात का ज्यादा ही भूत सवार रहता था , उसी व्यक्ति ने सबसे पहले पेट पूजा करी।
शान्ति पुरोहित

Friday, 25 December 2015

करणी का फल

"करणी का फल "
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आज सासु माँ की बहुत याद आ रही है , 
कड़ाके की ठंड में रात को दस बजे तक भी जब मैं अपनी व्यस्तता का बहाना बनाकर खाना नही बनाती थी,तो भी कभी कोई शिकायत नही करती मुझसे। 
रमा के आज एक-एक कर वो सब बाते फ़िल्म की तरह दिमाग में चल रही है।
रात को ही क्या दिन में भी यही हाल था। कई बार तो सासु माँ को इस अवस्था में खुद भी बनाकर खाना पड़ जाता था। 
अरे! आप बैठी -बैठी क्या सोच रही है मुझे महिला एवं बाल कल्याण दफ्तर में मीटिंग के लिए जाना है,,जल्दी से किचन में आईये और काम में हाथ बटाईए , बहू की रौबदार आवाज से रमा  की तन्द्रा भंग हुई।
शान्ति पुरोहित

Thursday, 24 December 2015

जन्मदिन की पार्टी


"जन्मदिन की पार्टी"
न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रतीक शर्मा के बेटे के जन्मदिन का अवसर था।
जाहिर सी बात है मेहमानो को तो निमन्त्रित करना ही था
प्रतीक की पत्नी जो जिला शिक्षा अधिकारी थी, चाहती थी कि बेटे का जन्मदिन चुनिंदा लोगो के साथ किसी होटल में मनाया जाय।
पर प्रतीक चाहता था घर में अपने पूरे परिवार के साथ मनाया जाय।
अंत में बेटे का जन्मदिन घर में ही मनाना तय हुआ।
प्रतीक के परिवार के लोग दूसरे शहर से आये थे और पत्नी के उसी शहर से आये थे।
प्रतीक के परिवार के लोग उस समय चकित रह गए जब उन्हें पास ही के खाली पड़े प्रतीक के किसी परिचित के घर यह कह कर ठहराया गया कि रात को जब केक पार्टी होगी आपको लेने आ जाऊँगा।
"भाई साहब क्या सोच रहे हो, प्रतीक के छोटे भाई ने कहा तो प्रतीक की तन्द्रा भंग हुई ,उसे याद आया कि पत्नी ने कभी भी मेरे परिवार के लोगो को अपने बराबर नही समझा बल्कि उन्हें छूत की बीमारी ही समझा। अपने परिवार को श्रेष्ठ , सबकुछ जानते हुए भी एक बार फिर अपने परिवार की तोहीन करवाई ।
शान्ति पुरोहित

Tuesday, 15 December 2015

निर्माण

निर्माण
कल ही हरिया शहर से मजदूरी करके कुछ पैसा लेकर गाँव आयेगा, तो सबसे पहले टूटी झोपडी को बंधवाना है। बहू पेट से है, और जाड़ा सर पर है। पताशी कच्चा आँगन लीपते हुए मन ही मन सोच विचार कर रही थी।
तभी रामू भागता हुआ आया, " माँ! भाई को पुलिस पकड़ कर ले गयी है ।पाकिस्तान से कुछ आतंकवादी भारत की सीमा में अनधिकृत रूप से प्रवेश का गए हैं। उनहोंने हरिया को भी उन्ही में से एक समझ लिया। अब हरिया जो कमाई शहर से करके लाया था वह वकील की फीस में चली गयी । 
शान्ति पुरोहित

" दोगलापन"

" दोगलापन" 
अरे माँ उठो! आज आने में थोडा लेट हो गयी, क्या करूँ! 
सासु माँ की तबियत आज सुबह से ठीक नही थी, तो किचन सम्भालना पड़ गया। पता नही बुढ़िया को ठंड कहाँ से लग गयी ! दो स्वेटर तो पहन कर रहती है ,फिर भी सुबह से खांस रही है।
विपिन तो है ही ममा पुत्र, जब विपिन घर से निकलते है तभी तो उसकी माँ से नौकरों जैसे काम करवा सकती हूँ 
रीटा ने माँ को गरमा गर्म टमाटर का सूप पिलाते हुए कहा
माँ सूप पीते हुए सोच रही थी, कि क्या ये मेरी बेटी की व्यहारिकता ठीक है!,
इसी उधेड़ बून में सूप की प्याली हाथ से गिर गयी ।
रीटा ने बड़े प्यार से माँ को सम्भाला ।
शान्ति पुरोहित





"मार्गदर्शन"


"मार्गदर्शन"
"बाल विवाह का दंश झेल कर युवा हुई किरण, जीवन के दोराहे पर खड़ी थी। 
पति ने बचपन में हुए विवाह को मानने से इंकार कर दिया, घर वाले अभी भी आस लगाये बैठे थे कि काश ! ये अपने ससुराल चली जाये।
" तभी उसे अपनी प्राइमरी स्कूल की अध्यापिका की याद आई जा पहुंची उनके घर ।
" मेरा जीवन समाज की थोथी मानसिकता और रीति -रिवाज में उलझ गया है, ऐसे में कोई राह ही नही सूझ रही है।, 
अरे ! इसमें घबराने की और परेशान होने वाली क्या बात है , शिक्षा के मंदिर में चली आओ , मेरा मतलब है तुम अपनी शिक्षा फिर से शुरू करो। 
अध्यापिका जी जब रिटायर हुई तो स्कूल फंक्सन में विशिष्ठ अतिथि सुश्री किरण सिंह ही थी।
शान्ति पुरोहित

Friday, 11 December 2015

वही घटना

करीब दो घण्टे से मूसलाधार बारिश बरस रही है, और घर में बहू के तानो की बरसात बराबर चालू है।
रामनरेश जी को आज बहू के ताने विष बुझे तीर के समान कड़वे लग रहे है।
जब सहन शक्ति चुक गयी सुनने की तो पत्नी सुरेखा का हाथ पकड़ कर तेज बारिश में ही वृद्ध आश्रम के लिए निकल गए।
थोड़ी ही देर बाद निर्मल जब घर आता है तो बताता है कि उसके सास -ससुर ,यानी बहू के माता -पिता उसे इतनी बरसात में पास ही के पार्क में बैठे मिले जो भीगने के कारण थर -थर काँप रहे थे| उसकी पत्नी का मायका उसी शहर में जो था |
"बाबूजी -माँ, देखो आपके लिए गरमागरम गाजर का हलुवा लाया हूँ आओ आप और मैं साथ खाएंगे।,निर्मल के आवाज देने पर भी उसके माँ -बाबूजी नही आये तो पत्नी से अपने माँ-बाबूजी के बारे में पूछा |
अपने माँ -पापा को इस हालत में देखकर निर्मल की पत्नी मन ही मन में जान गयी कि उसके माँ - बाबूजी के साथ जो इस वक्त थर-थर काँप रहे थे। भाभी ने शायद उनके साथ भी ..... वही घटना"
शान्ति पुरोहित
 

Friday, 20 March 2015

हाउस वाईफ ( लघुकथा )

http://www.yuvasughosh.com/2015/03/20/हाउस-वाईफ-लघुकथा/

हाउस वाईफ ( लघुकथा )
टाउन हॉल खचाखच भरा था। तालियों की गड़गड़ाहट से पता चला कि मिस. रस्तोगी हाल में आ गयी है। आज उनकी कहानियों की दसवी बुक का विमोचन शहर के जाने- माने साहित्यकार के हाथो होना है।.. आप तो एक हाउस वाईफ थी ..फिर इतनी बड़ी उपलब्धि कैसे हासिल की ? पत्रकारो ने मिस रस्तोगी से सवाल किया । देखिये " मेरी इस उपलब्धि और कामयाबी का सारा श्रेय मेरे पति को जाता है, जिन्होंने मुझे घर में रहकर ही कुछ करने की पुर जोर सलाह दी। वृद्ध सास- ससुर जी की सेवा टहल के कारण रस्तोगी जी को बाहर जाना बिलकुल नही जँचा। कहीं न कहीं mr. रस्तोगी भी जिम्मेवार थे।
शान्ति पुरोहित

Friday, 13 March 2015

नारी की पीड़ा

 नारी निकेतन की संचालिका आभा के पास एक औरत आयी, जिद कर रही थी  उसे यहाँ नहीं रहना,  उसका पति उसे बहुत प्यार करता है उसे लेने जरुर आएगाकमलानाम था, उसका पति शहर घुमाने लेकर आया थाजब वो दुकान से चुडिया खरीद रही थीपति मौका पाकर उसे वहीं छोड़ गया|
रात भर पति के इन्जार मे बैठी रहीदो दिन तक वो नहीं आयादो दिन तक कुछ भी पेट में नहीं जाने से कमला बेहोश हो गयीआभा ने उसे देखा तो  यहाँ ले आयी |
ज्यादा कहने पर कमला के पति को खोज कर अपनी पत्नी को आश्रम से घर ले जाने के लिए बोलाउसने कहा दो दिन से घर से बाहर पराये लोगो के साथ रही औरत की मेरे घर में कोई जगह नहीं है|
दस साल बाद कमला का पति लुटा-पिटा सा उसके पास आया चलो कमला घर चलो|, कमला ने कहा ” वो कमला अपने पति के दोगले व्यवहार के कारण मर गयी है| तुम्हारे सामने कमला है वो जिन्दा लाश है जो किसी की भी पत्नी नहीं हो सकती,तुम जा सकते हो|
शान्ति पुरोहित 

''बचपन क्यूँ नहीं रहा बचपन जैसा ''

बदलते परिवेश ने बच्चो के बचपन को अपने जाल में जकड़ लिया है| जब तक टीवी, मोबाईल और मायावी इंटरनेट नहीं था, तब तक ही बचपन था| तब उस जमाने में बच्चे खेल-कूद में अपना समय बिताते थे| जिससे उनका शारीरिक विकास तो होता ही था, आपस में मिल-जुल कर रहने की प्रवृति भी पुष्ट होती थी| तब खो-खो , कबड्डी, कंचा और भी अन्य लाभकारी खेल हुआ करते थे | लेकिन आज जमाना बदल गया है| आज तो चार वर्ष का बच्चा बिना मोबाईल के नही रह सकता| काफी हद तक इसमें माता-पिता का योगदान है| आजकल माता पिता दोनों कमाने बाहर जाते है| अति व्यस्तता के कारण बच्चे को मोबाईल देकर अपना पीछा छुडाना चाहते है| बच्चा पुरे दिन घर में अकेला या नौकरों के साथ रहता है और मोबाईल या कम्प्यूटर से चिपका रहता है| उसे कोई पूछने वाला नहीं होता है कि वह क्या देख रहा है, क्या कर रहा है| पुरे दिन नेट पर चैट से व् अन्य अवांछित साईट पर गतिविधि करते रहते है| ऐसे में कहाँ बचा रहता है उनका निश्छल और निर्दोष बचपन?
परिणामत: बच्चो का भविष्य भी चौपट हो जाता है बचपन तो खत्म होता ही है| क्यूँकि इन सब गतिविधियों में लिप्त रहकर बच्चे अल्पायु में ही व्यस्क हो जाते है| बच्चे देश का भविष्य होते है| आज के बच्चे ही कल देश के कर्णधार होते है| अभिभावकों को चाहिए कि वो काम के साथ-साथ समय निकाल कर बच्चो पर पूर्ण निगरानी रखे उन्हें अपना वक्त और प्यार देकर सही मार्ग पर चलने को प्रेरित करे| तो बच्चो का बचपन फिर से आ सकता है आजकल बच्चे जो भी मांग करते है अभिभावक बिना सोचे समझे तुरंत पूरी कर देते है ऐसे हालत में बच्चा जिद्दी हो जाता है और हर जायज-नाजायज मांग रखता रहता है| बच्चो के बचपन को बरकरार रखने के लिए अभिभावक को फिर से सोचना होगा जिससे कि उनका बच्चा बचपन में बच्चा ही रहे ना कि व्यस्क बने |
शान्ति पुरोहित

दुखो से छुटकारा

आखिर आज मीरा ने दुखो से छुटकारा पा ही लिया| जीवन और मृत्यु के बीच की कड़ी टूट गयी | चिर शांति मिल गयी | अंतिम यात्रा में हजारो लोगो के साथ बहू बेटा भी चल रहे थे बेटा-बहु के रोज -रोज के आपस के झगड़े ने मीरा का सब खत्म कर दिया | बेटे ने पत्नी से तंग आकर आत्महत्या कर ली थी | तब से अब तक बहू और बड़ा बेटा बहू और बेटियों ने मीरा को पैसो के लिए परेशान करने में कोई कसर नही छोड़ी थी |
पिता ने व्यापर में कमाये धन को मीरा के बुढापे के सहारे के लिए बैंक में रख छोड़ा पैसा ही मीरा का जी का झंझाल बना | माँ की देखभाल के लिए किसी के पास समय कभी रहा नही | वृद्ध माँ दो -दो बहू के रहते खुद का खाना हाथो से बनाकर खाती थी | बेटा, बहू के आगे मेमना जो बना रहता था |
जैसी करनी वैसी भरनी । माँ ने अपने बचे हुए धन को अपने वकील की मदद से एक वृद्ध आश्रम बनाने में लगा दिया था | जिससे उस जैसे सताए वृद्ध वहां अंतिम दिनों में चैन की जिंन्दगी जी सके | माँ के मरने के तीसरे ही दिन लालची परिवार ने जब धन पाने के लालच में माँ का सामान सम्भाला तो पता चला धन तो माँ खर्च कर चुकी है |
शान्ति पुरोहित

साहस

गाँव में स्कूल नही था । कारण गाँव में जो बस आती थी वो दूसरे दिन ही वापस जा पाती थी । कोई भी अध्यापक गाँव में रहना नही चाहता था। सरपंच ने अपने स्तर पर बहुत कोशिश की शहर जाकर कलेक्टर और शिक्षा मंत्री से गुहार लगाई ।पर कुछ नही हुआ। कहते है ना ” जहाँ चाह वहाँ राह ” गाँव के ही रहने वाले कुछ अध्यापक जो सेवा निवृत होकर आ गए थे उन्होंने गाँव के बच्चों को पढ़ाने का बीड़ा उठाया । भवन नही होने की स्थिति में गाँव के ही एक टूटे फूटे अहाते में ही बच्चों को पढ़ाया जाने लगा । शहर के स्कूल में एडमिशन और गाँव में पढ़ाई। इससे ये फायदा हुआ कि बच्चों का कीमती समय आने- जाने की परेशानी से बच जाता था। अगले वर्ष मेरिट लिस्ट में आने वाले बच्चों के नाम में गाँव के चार विद्यार्थियो का नाम था।
शान्ति पुरोहित

जूठन

जूठन
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मासूम बच्चे को गोद में लेकर करीब दस वर्षीय लडकी मेरे दरवाजे पर रोटी मांगने आयी तो उत्सुकतावश मैने उससे पूछा कि वो इतने छोटे बच्चे को लेकर क्यूँ मांगने निकली है क्या उसके माँ- बाप काम पर गये है ? तपाक से वो लडकी बोली ” पिता मजदूरी करता था | दुर्घटना में कुछ दिन पहले ही मारा गया है| माँ, किसी दुसरे आदमी के साथ भाग गयी | रह गये हम दोनों अनाथ, इतनी छोटी बच्ची ने अपने छोटे भाई के भरण-पोषण की जिम्मेदारी अपने नन्हे कन्धो पर ले ली | ये देखकर मेरा तो कलेजा ही मुहं को आने लगा |पीठ पीछे भाई को बाँध कर उसके नन्हे हाथ लोगो के सामने फैलने लगे | कोई दे देता, कोई मुहं बिचका कर आगे बढ़ जाता |जैसे -तैसे करके अपना और भाई का पेट भरती थी |कभी -कभी तो भाई का ही पेट भरने जीतनी रोटी मिलती तब खुद भूखे पेट ही सो जाती थी |आज खबर अच्छी मिली है उसने बताया ”गाँव के मुखिया की मौत हुई है पन्द्रह दिन तो भर पेट खाना मिलेगा |वो सुबह से ही मुखिया के दरवाजे पर आस के साथ बैठ गयी कि जल्दी से कोई खाना जूठा छोड़े ….
शान्ति पुरोहित

"बचपन "

"बचपन " 
"बचपन" को याद कर के अपना वर्तमान नही बिगाड़ना चाहती । बहुत ही मुश्किल भरा बचपन था मेरा। सात बच्चों को पालना पिताजी के लिए बड़ी मुसीबत भरा काम था। उस पर आय सीमित। पिताजी बेकरी में हेल्पर का काम करते थे। माँ आस-पास के घरो में खाना बनाती थी। फिर भी दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ नही होता था।कई बार माँ को भूखे पेट सोना पड़ता था। पढ़ने में रूचि और तीव्र इच्छा होने के बावजूद पांचवी तक पढ़ने के आगे विराम लगा दिया पिताजी ने असमर्थता जता कर स्कूल जाना बंद करा दिया था। दूसरे भाई बहन तो स्कूल का मुहं तक नही देख पाये। मुझे पढ़ना था तो गाँव के प्रधान से मदद माँग कर पढ़ी। मेरा उद्देश्य था कि पढ़ -लिख कर गाँव के बच्चों के लिए निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था करना। आज गाँव में सरकारी स्कूल में प्रधानाध्यापिका के रूप में कार्यरत हूँ। और स्कूल के अलावा घर में निशुल्क पढ़ाती हूँ। स्कूल में असहाय बच्चों की मदद करना मेरी प्रथम जिम्मेदारी है
शान्ति पुरोहित