Friday, 20 March 2015

हाउस वाईफ ( लघुकथा )

http://www.yuvasughosh.com/2015/03/20/हाउस-वाईफ-लघुकथा/

हाउस वाईफ ( लघुकथा )
टाउन हॉल खचाखच भरा था। तालियों की गड़गड़ाहट से पता चला कि मिस. रस्तोगी हाल में आ गयी है। आज उनकी कहानियों की दसवी बुक का विमोचन शहर के जाने- माने साहित्यकार के हाथो होना है।.. आप तो एक हाउस वाईफ थी ..फिर इतनी बड़ी उपलब्धि कैसे हासिल की ? पत्रकारो ने मिस रस्तोगी से सवाल किया । देखिये " मेरी इस उपलब्धि और कामयाबी का सारा श्रेय मेरे पति को जाता है, जिन्होंने मुझे घर में रहकर ही कुछ करने की पुर जोर सलाह दी। वृद्ध सास- ससुर जी की सेवा टहल के कारण रस्तोगी जी को बाहर जाना बिलकुल नही जँचा। कहीं न कहीं mr. रस्तोगी भी जिम्मेवार थे।
शान्ति पुरोहित

Friday, 13 March 2015

नारी की पीड़ा

 नारी निकेतन की संचालिका आभा के पास एक औरत आयी, जिद कर रही थी  उसे यहाँ नहीं रहना,  उसका पति उसे बहुत प्यार करता है उसे लेने जरुर आएगाकमलानाम था, उसका पति शहर घुमाने लेकर आया थाजब वो दुकान से चुडिया खरीद रही थीपति मौका पाकर उसे वहीं छोड़ गया|
रात भर पति के इन्जार मे बैठी रहीदो दिन तक वो नहीं आयादो दिन तक कुछ भी पेट में नहीं जाने से कमला बेहोश हो गयीआभा ने उसे देखा तो  यहाँ ले आयी |
ज्यादा कहने पर कमला के पति को खोज कर अपनी पत्नी को आश्रम से घर ले जाने के लिए बोलाउसने कहा दो दिन से घर से बाहर पराये लोगो के साथ रही औरत की मेरे घर में कोई जगह नहीं है|
दस साल बाद कमला का पति लुटा-पिटा सा उसके पास आया चलो कमला घर चलो|, कमला ने कहा ” वो कमला अपने पति के दोगले व्यवहार के कारण मर गयी है| तुम्हारे सामने कमला है वो जिन्दा लाश है जो किसी की भी पत्नी नहीं हो सकती,तुम जा सकते हो|
शान्ति पुरोहित 

''बचपन क्यूँ नहीं रहा बचपन जैसा ''

बदलते परिवेश ने बच्चो के बचपन को अपने जाल में जकड़ लिया है| जब तक टीवी, मोबाईल और मायावी इंटरनेट नहीं था, तब तक ही बचपन था| तब उस जमाने में बच्चे खेल-कूद में अपना समय बिताते थे| जिससे उनका शारीरिक विकास तो होता ही था, आपस में मिल-जुल कर रहने की प्रवृति भी पुष्ट होती थी| तब खो-खो , कबड्डी, कंचा और भी अन्य लाभकारी खेल हुआ करते थे | लेकिन आज जमाना बदल गया है| आज तो चार वर्ष का बच्चा बिना मोबाईल के नही रह सकता| काफी हद तक इसमें माता-पिता का योगदान है| आजकल माता पिता दोनों कमाने बाहर जाते है| अति व्यस्तता के कारण बच्चे को मोबाईल देकर अपना पीछा छुडाना चाहते है| बच्चा पुरे दिन घर में अकेला या नौकरों के साथ रहता है और मोबाईल या कम्प्यूटर से चिपका रहता है| उसे कोई पूछने वाला नहीं होता है कि वह क्या देख रहा है, क्या कर रहा है| पुरे दिन नेट पर चैट से व् अन्य अवांछित साईट पर गतिविधि करते रहते है| ऐसे में कहाँ बचा रहता है उनका निश्छल और निर्दोष बचपन?
परिणामत: बच्चो का भविष्य भी चौपट हो जाता है बचपन तो खत्म होता ही है| क्यूँकि इन सब गतिविधियों में लिप्त रहकर बच्चे अल्पायु में ही व्यस्क हो जाते है| बच्चे देश का भविष्य होते है| आज के बच्चे ही कल देश के कर्णधार होते है| अभिभावकों को चाहिए कि वो काम के साथ-साथ समय निकाल कर बच्चो पर पूर्ण निगरानी रखे उन्हें अपना वक्त और प्यार देकर सही मार्ग पर चलने को प्रेरित करे| तो बच्चो का बचपन फिर से आ सकता है आजकल बच्चे जो भी मांग करते है अभिभावक बिना सोचे समझे तुरंत पूरी कर देते है ऐसे हालत में बच्चा जिद्दी हो जाता है और हर जायज-नाजायज मांग रखता रहता है| बच्चो के बचपन को बरकरार रखने के लिए अभिभावक को फिर से सोचना होगा जिससे कि उनका बच्चा बचपन में बच्चा ही रहे ना कि व्यस्क बने |
शान्ति पुरोहित

दुखो से छुटकारा

आखिर आज मीरा ने दुखो से छुटकारा पा ही लिया| जीवन और मृत्यु के बीच की कड़ी टूट गयी | चिर शांति मिल गयी | अंतिम यात्रा में हजारो लोगो के साथ बहू बेटा भी चल रहे थे बेटा-बहु के रोज -रोज के आपस के झगड़े ने मीरा का सब खत्म कर दिया | बेटे ने पत्नी से तंग आकर आत्महत्या कर ली थी | तब से अब तक बहू और बड़ा बेटा बहू और बेटियों ने मीरा को पैसो के लिए परेशान करने में कोई कसर नही छोड़ी थी |
पिता ने व्यापर में कमाये धन को मीरा के बुढापे के सहारे के लिए बैंक में रख छोड़ा पैसा ही मीरा का जी का झंझाल बना | माँ की देखभाल के लिए किसी के पास समय कभी रहा नही | वृद्ध माँ दो -दो बहू के रहते खुद का खाना हाथो से बनाकर खाती थी | बेटा, बहू के आगे मेमना जो बना रहता था |
जैसी करनी वैसी भरनी । माँ ने अपने बचे हुए धन को अपने वकील की मदद से एक वृद्ध आश्रम बनाने में लगा दिया था | जिससे उस जैसे सताए वृद्ध वहां अंतिम दिनों में चैन की जिंन्दगी जी सके | माँ के मरने के तीसरे ही दिन लालची परिवार ने जब धन पाने के लालच में माँ का सामान सम्भाला तो पता चला धन तो माँ खर्च कर चुकी है |
शान्ति पुरोहित

साहस

गाँव में स्कूल नही था । कारण गाँव में जो बस आती थी वो दूसरे दिन ही वापस जा पाती थी । कोई भी अध्यापक गाँव में रहना नही चाहता था। सरपंच ने अपने स्तर पर बहुत कोशिश की शहर जाकर कलेक्टर और शिक्षा मंत्री से गुहार लगाई ।पर कुछ नही हुआ। कहते है ना ” जहाँ चाह वहाँ राह ” गाँव के ही रहने वाले कुछ अध्यापक जो सेवा निवृत होकर आ गए थे उन्होंने गाँव के बच्चों को पढ़ाने का बीड़ा उठाया । भवन नही होने की स्थिति में गाँव के ही एक टूटे फूटे अहाते में ही बच्चों को पढ़ाया जाने लगा । शहर के स्कूल में एडमिशन और गाँव में पढ़ाई। इससे ये फायदा हुआ कि बच्चों का कीमती समय आने- जाने की परेशानी से बच जाता था। अगले वर्ष मेरिट लिस्ट में आने वाले बच्चों के नाम में गाँव के चार विद्यार्थियो का नाम था।
शान्ति पुरोहित

जूठन

जूठन
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^
मासूम बच्चे को गोद में लेकर करीब दस वर्षीय लडकी मेरे दरवाजे पर रोटी मांगने आयी तो उत्सुकतावश मैने उससे पूछा कि वो इतने छोटे बच्चे को लेकर क्यूँ मांगने निकली है क्या उसके माँ- बाप काम पर गये है ? तपाक से वो लडकी बोली ” पिता मजदूरी करता था | दुर्घटना में कुछ दिन पहले ही मारा गया है| माँ, किसी दुसरे आदमी के साथ भाग गयी | रह गये हम दोनों अनाथ, इतनी छोटी बच्ची ने अपने छोटे भाई के भरण-पोषण की जिम्मेदारी अपने नन्हे कन्धो पर ले ली | ये देखकर मेरा तो कलेजा ही मुहं को आने लगा |पीठ पीछे भाई को बाँध कर उसके नन्हे हाथ लोगो के सामने फैलने लगे | कोई दे देता, कोई मुहं बिचका कर आगे बढ़ जाता |जैसे -तैसे करके अपना और भाई का पेट भरती थी |कभी -कभी तो भाई का ही पेट भरने जीतनी रोटी मिलती तब खुद भूखे पेट ही सो जाती थी |आज खबर अच्छी मिली है उसने बताया ”गाँव के मुखिया की मौत हुई है पन्द्रह दिन तो भर पेट खाना मिलेगा |वो सुबह से ही मुखिया के दरवाजे पर आस के साथ बैठ गयी कि जल्दी से कोई खाना जूठा छोड़े ….
शान्ति पुरोहित

"बचपन "

"बचपन " 
"बचपन" को याद कर के अपना वर्तमान नही बिगाड़ना चाहती । बहुत ही मुश्किल भरा बचपन था मेरा। सात बच्चों को पालना पिताजी के लिए बड़ी मुसीबत भरा काम था। उस पर आय सीमित। पिताजी बेकरी में हेल्पर का काम करते थे। माँ आस-पास के घरो में खाना बनाती थी। फिर भी दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ नही होता था।कई बार माँ को भूखे पेट सोना पड़ता था। पढ़ने में रूचि और तीव्र इच्छा होने के बावजूद पांचवी तक पढ़ने के आगे विराम लगा दिया पिताजी ने असमर्थता जता कर स्कूल जाना बंद करा दिया था। दूसरे भाई बहन तो स्कूल का मुहं तक नही देख पाये। मुझे पढ़ना था तो गाँव के प्रधान से मदद माँग कर पढ़ी। मेरा उद्देश्य था कि पढ़ -लिख कर गाँव के बच्चों के लिए निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था करना। आज गाँव में सरकारी स्कूल में प्रधानाध्यापिका के रूप में कार्यरत हूँ। और स्कूल के अलावा घर में निशुल्क पढ़ाती हूँ। स्कूल में असहाय बच्चों की मदद करना मेरी प्रथम जिम्मेदारी है
शान्ति पुरोहित