Saturday, 23 March 2013

सुधा की व्यथा


  •  ‘’रामपुर’’छोटा सा है पर अंधविश्वास और कुरीतियों से सरोबार था,सदियों पुरानी कुप्रथाए आज भी प्रासंगिक है | जैसे –बाल-विवाह,स्त्री शिक्षा और विधवा –विवाह आदि|बाल –विवाह के फलस्वरूप दुस्परिनाम भुगतते रहने के बाद भी आज भी बड़ी तादाद मै गाँवो और शहरों मै बालविवाह होते रहते है|बाल विधवा को ही अभागी समझा जाता है या ईश्वरीय प्रकोप मान कर चलते है | 
गाँव के अस्पताल मै डॉ.की कमी के कारन बड़ी बीमारियों का इलाज शहर जाकर करवाना गाँव वालो के बस मै नहीं होता है |परिणाम स्वरूप बाल मरतु दर ज्यादा होती है फल स्वरूप बच्चियों को विधवा होने का दंश झेलना पड़ता है |
लेखिका 
विधवा का पुनः विवाह करना तो गाँव वाले अपने परिवार कि तोहीन समझते है |इसके विपरीत बड़ी बूढी महिलाये विधवा को कैसे जीना है’उनके लिए अनेको कड़े कानून कायदे निर्धारित करती है |कांटो भरा जीवन जीना पड़ता है खुली हवा मै साँस लेना तक दूभर होता था
‘रामपुर गाँव मे लडकियों को पढाने कि इच्छा रखना तो जैसे रेगिस्तान मे पानी की बूंद चाहने जैसा था |आगे जाकर घर का काम ही तो करना है फिर पढ़ कर कौन सा बैरिस्टर बनना है | ये कहा जाता था |
ऐसे गाँव कि रहने वाली थी मेरी कहानी की नायिका सुधा | भाई बहनों मै सब से छोटी होने के कारण हर चीज के लिये तरसना पड़ता था| इससे बड़े भाई  बहनों कि जरुरत पूरी नहीं होती थी | किसी भी मांग पर सुधा को ये सुनने को मिलता था कि ‘’पहले जो तुमसे बड़े है उनकी तो जरुरत पूरी हो फिर तुमारा नम्बर है|
और वो दिन कभी सुधा के जीवन मे नहीं आया,पिताजी गाँव के  ही जमींदार के खेत मे किसानी करते थे|परिवार कि बुनियादी जरुरतो को ही मुश्किल से पूरी कर पाते  थे ,तो बच्चो को स्कूल भेजना तो बहुत दूर कि बात थी |जैसे तैसे कर के परिवार का भरण पोषण कर रहे थे |
एक दिन घर मे कोहराम मच गया सुधा के पिता ने सुधा के छ साल के पति के किसी बीमारी से मरने कि खबर सुनाई |माँ को रोते बिलखते देख वो भी रोने लगी उसके साथ जो घटित हुआ उससे तो बेखबर थी कि उसके तो भाग ही फूट गये |
उसका जीवन तो शुरू होने से पहले ही ख़तम हो गया था | मासूम बच्ची को अब कांटो भरा जीवन जीना होगा ये सोच कर माँ का तो जैसे कलेजा मुह को आ रहा था |नियति के क्रूर हाथो ने उसके कलेजे के टुकड़े का सब कुछ ले लिया था |
अब सुधा के माँ बापू पर कटे पंछी कि भांति हो दुखी थे कैसे उम्र भर बेटी को संभाल सकेंगे ,दोबारा विवाह कर नहीं सकते|विधवा को हेय द्रष्टि से देखा जाता थ अपशकुनी माना जाता था| परिवार कि बड़ी औरतों दवारा निर्धारित किये गये नियमो के अनुसार ही हर विधवा को चलना था |
समय ने रफ़्तार पकड़ी अब सुधा चौदह साल कि हो गयी थी |वो कुछ काम करके अपना जीवन यापन करना चाहती थी बोझ बन कर नहीं रहना था उसे |सुधा गाँव के ही एक सेठ के घर मे काम करने लगी सेठानी को रसोई के काम मे मदद करने लगी और वो उनके घर मे ही रहने लगी थी |एक बार सेठानी कि ननद मुंबई से आई उसने सुधा को देखा तो भाभी से कहा ‘आप इज़ाज़त दो तो सुधा  सुधा को मुंबई ले जाऊ ,तुरंत ही उसके बापू को बुलाया थोड़ी देर बाद वो सुधा को भेजने को राजी हो गये सेठजी कि बहन थी तो सोचने कि तो कोई बात ही नहीं थी |
अब सुधा  नई मालकिन सेठानी कि ननद कविता थी |कविता ने सुधा को स्कूल मे दाखिला दिलाया और पढ़ाने के साथ साथ उसे मुंबई जैसे बड़े शहर मे रहने के तौर तरीके भी सिखाने लगी |वहा कि भागती हुई जिन्दगी मे लोग सवेरे जल्दी निकल जाते है और देर रात थके मांदे लोकल ट्रेनों मे सफ़र करते हुए घर पहुंचते है |कविता और उसके पति भी ऑफिस मे काम करते है |
सुधा के मुंबई आने के बाद कविता के घर बेटी का जनम हुआ सुधा ने सब कुछ संभाल लिया था |कुछ समय बाद बेटी कि जिम्मेदारी भी सुधा को सौप दी गयी थी |सुधा कविता कि बेटी को अपनी बेटी कि तरह पालने लगी |उसे मान मनुहार करके दूध पिलाना ,खाना खिलाना ,पार्क मे लेजाना आदि सब वो ही करती थी |जब नीलू स्कूल जाने लगी तो सुधा उसे स्कूल छोड़ने और लेने जाती थी |
समय ने फिर रफ़्तार पकड़ी कविता के साथ रहते हुए सुधा को पच्चीस साल होगये थे इस दौरान सुधा को कभी ये नहीं लगा कि कविता मालकिन और वो काम वाली बाई ह| कहते है न कि बेटिया कब बड़ी हो जाती है माँ बाप को पता ही न चलता है |नीलू कि शादी कि घर मे चर्चा होने लगी |कभी लड़के वाले कविता के घर आते कभी वो लड़का देखने जाते थे |अब सुधा बैचैन रहने लगी वो सोच मे पड़ गयी कि बिना नीलू के वो कैसे रह पायेगी |आख़िरकार नीलू का रिश्ता तय हुआ वो शादी के बाद अपने पति के घर चली गयी |
अब सुधा को खालीपन लगने लगा जैसे अब उसके पास करने को कोई भी काम नहीं है |कविता और उसका पति सुबह ही ऑफिस चले जाते थ |’क्या तुम नीलू के घर काम करोगी,पूछा कविता ने ?सुधा को जैसे अपने कानो पर विश्वास नहीं हुआ ‘क्या आप सच कह रही हो ?’हां ‘सच ही कह रही हु ‘उसके यहाँ से जाने के बाद तुम बीमार रहने लगी हो | तुमारा उसके प्रति प्यार देख कर लगता नहीं कि तुम उसके बिना जी पाओगी ‘तो मैंने ये निर्णय लिया है | जैसे प्यासे को पानी मिलगया हो उसने जल्दी से हां बोल दी थी |
कविता ने अपने दामाद और नीलू से बात कि दामाद को कहा ‘बेटा सुधा एक नेक और इमानदार इंसान है पच्चीस सालो से काम कर रही है नीलू को बेटी मानती है तुम कहो तो इसे तुमरे घर भेज दू | नीलू और दामाद कि हां हुई और अब सुधा नीलू के घर आगयी थी |नीलू का स्वभाव भी अपनी माँ कविता जैसा ही था सुधा नीलू के घर के काम को अच्छी तरह से सँभालने लगी |
नीलू कि बचपन से ही आदत थी वो अपनी किसी भी चीज को ठीक से नहीं रखती थी उसकी सुधा  अम्मा ही ही ये सब करती थी |यहाँ भी वो ऐसे ही करती थी अब यहाँ भी उसकी सुधा आगयी बिखरी हुई चीजों को करीने से रखने के लिए | उसके पति को नीलू कि ये लापरवाई कतई पसंद नहीं थी अक्सर वो नीलू पर इस बात के लिये नाराज होता था पर उसे कोई चिंता नहीं थी .उसे थो अपनी सुधा अम्मा पर तब से भरोसा था .जब उसने अम्मा कि ऊँगली पकड़ कर चलना सीखा था तो लाजमी है अविश्वास कि तो कोई बात ही नहीं थी |नीलू और उसका पति दोनों एक बड़ी कंपनी मे काम करते थे | कंपनी का मेनेजमेंट वो ही देखते थे बहुत वयस्त रहते थे पर दो दिन अपने मौज मस्ती के लिये निकाल ही लेते थे | और निकल जाते पिकनिक मनाने अपने |ऐसे ही वो दोनों अपने किसी रिश्तेदार के घर शादी मे गये थे ,वापस आकर जल्दी से नीलू ने अपने कीमती हीरे के गहने और कपडे ऐसे ही उतार कर पलंग पर रख दिये और खंडाला के लिये निकल गये| वहां पहुँचते ही नीलू को अपने गहनों कि याद आई पर उसने कहा चिंता कि कोई बात नहीं है ,सुधा अम्मा है न वो संभाल कर रख देगी .पर उसका पेटी बहुत नाराज हो रहा था था |उसका मानना था कि इतने कीमती गहने और रुपया देख कर तो किसी का भी मन डोल सकता है |पर नीलू निश्चिंत थी फिर भी उसका मन नहीं लग रहा था |बड़ी मुश्किल से वो रात काटी |वापस आकर नीलू ने सबसे पहले अपनी माँ को फ़ोन किया साडी बात बतायी कविता बोली ‘’अरे ‘’नीलू इतनी सी बात के लिये नाहक ही अपना प्रोग्राम छोड़ कर आई वो तेरी ‘सुधा अम्मा ‘’ है उसे तुमसे प्यार है ,गहनों से नहीं|’कोई ‘बात नहीं अब आगये हो तो सम्भाललो अपने गहने ;जय से ही फ़ोन कट हुआ सुधा ने एक बैग उसके हाथ पर रखा और कहा’’नीलू बेटा ये तुम्मारे गहने मेरे पास फ़ोन नंबर नहीं थे कैसे बताती पर मे रात भर सो नहीं सकी थी |सुधा ने फ़ोन पर कि गयी नीलू कि बाते सुन ली थी ,वो तो गहने देने ही कमरे मे आरही थी |नीलू ने अपने पति कि और देखा तिरछी नजर से और मन ही कहा देखो मैंने कहा था न कि सुधा अम्मा सब संभाल लेगी ,उसके पति कि नजरे नीची हो गयी |नीलू सुधा  के गले लग गयी और तीनो जन खाना खाने के बाद सोगये थे |
सुबह सुधा अम्मा के हाथ कि चाय नहीं मिलने पर वो उसके कमरे गयी तो देखा वो वंहा नहीं थी,सुधा को घर मे ना पाकर नीलू रोने लगी पर उसका पति घर के सामान को देख रहा था कि वो कुछ लेकर तो नहीं गयी इसी दौरान उसका लिका पत्र मिला नीलू पड़ने लगी ‘’नीलू मे जा रही हूँ ,तुम्हारे पति को मुझ पर भरोसा नहीं और बिना भरोसा मे कंही नहीं रहा सकती |और हां ‘’मै कविता मैडम ‘’के घर नहीं जा रही हूँ |
अब जिसे भी रखो संभाल के रखना जमाना खराब है और हाँ अपने गहनों को भी ......पढ़ कर नीलू रोने लगी अब तो उसके पति ने भी अपना सर पकड़ लिया और बोला ईमानदार सुधा अम्मा को हमने शक करके खो दिया है |नीलू सोच रही है कि माँ को क्या जवाब देगी| सुधा ने अब अपना बाकी का जीवन वापस अपने गाँव मे गुजारने के लिए सोचा है                                                                                                                                                
नीलू सोच रही है कि जिस सुधा माँ ने हमारे साथ सालो परिवार कि तरह काटे आज अपने स्वाभिमान कि रक्षा के लिये एक झटके मे सब कुछ छोड़ कर वापस अपनी दुनिया मे चली गयी है |    

शान्ति पुरोहित 

http://www.shuruaathindi.org/2013/03/blog-post_21.html

Thursday, 7 February 2013

प्रत्येक व्यक्ति के जीवन मे चार माताएँ होती है -१ जन्म दात्री जननी २ गो माता ३ भूमाता और ४ है जगन्माता परमेश्वरी | यहाँ हम गो माता कि महिमा पर विचार करेंगे | पूज्या गो माता कोई साधारण पशु नहीं है गो माता हमारी पूज्या और प्रातस्मरणीया है | श्री कृष्ण परब्रह्म भी पूज्या गो माता की अपनी पूज्या माता मानकर अपने हाथो से उनकी सेवा करते है,अपने प्राणों से भी प्यारी मानते है | गो रक्षण करने के लिये ही निराकार परब्रह्म श्री कृष्ण के रूप मे प्रकट होते है |गो माता साक्षात नारायण है इनमे और श्री नारायण मे कोई अंतर नहीं है |वही साक्षात पूज्या गो माता जो आज इस        मुनियों के देश ,धर्म प्राण भारत मे नित्य प्रति हजारो लाखो की संख्या मे गो माताएँ धडा धड काटी जा रही है। ये एक प्रकार से बड़ा भारी पाप किया जा रहा है गो हत्या से बड़ा कोई पाप नहीं है । हमारे पूज्य वेद भगवान ने पूज्या गो माता की बड़ी भारी स्तुति की है ।श्री वेद भगवान जिसकी स्तुति करते है वह पूज्या गाय क्या कोई साधारण पशु है। गो के शारीर मे समस्त देव गण निवास करते है और गो के पैरो मे समस्त तीर्थ निवास करते है गो माता की इतनी महिमा है कि यदि कोई गो के पैरो मे लगी हुई मिटटी का तिलक जो मनुष्य अपने मस्तक पर लगाता है वह उसी वक़्त तीर्थ जल मे स्नान करने का फल पाता है। शास्त्रों मे यहाँ तक वर्णित है कि जहाँ पर गोए रहती है वो भूमि तीर्थ भूमि कहलाती है गो शाला मे जो व्यक्ति भगवान की भक्ति करता है उसे दस गुना ज्यादा फल मिलता है ।यहाँ तक कहा गया है कि गोए और ब्राह्मण दोनों एक ही कुल के प्राणी है दोनों मे विशुद सत विधमान रहता है ।लेकिन जब से गोवध होने लगा है विश्व की प्रजा दुखी रहने लगी है क्योंकि गो माता दुखी होगी तो और सब को तो दुखी होना ही है ।भारत और अन्य देशो मे अब गोवध बहुतायत मे होने लगा है ।कलियुग मे गोवध को रोकने के लिये रामावतार मे अयोध्या वासियों को स्वयं भगवान राम ने गो सेवा की शिक्षा दी है और वो कहते है कि 'मे इस रामावतार मे 'गो सेवा 'नहीं कर सका ।उस वक़्त लोगो ने मुझे महाराज दसरथ जी का पुत्र समझ कर ये पुनीत कम नहीं करने दिया,इसलिए अब मे इसके लिये ही अगला कृष्ण अवतार धारण करूँगा और गो सेवा करूँगा और ये तो सर्व विदित है की भगवान कृष्ण ने अपने बचपन काल से ही गो सेवा करनी चालू करदी थी।गो पाप करने का कितना बड़ा फल मिलता है कि एक बार महाराज जनक का विमान यमराज की संयमनी पूरी के निकट से हो कर जा रहा था ।विमान अभी आगे बढ़ने को ही था कि नरक कि यंत्रनाओ को भोगते हजारो नारकियों के करुण स्वर जनक को सुनाई दिये -'राजन!,आप यहाँ से जाये ,आपके शरीर को स्पर्श कर आने वाली वायु से हमें शांति मिल रही है ।'इस करुण पुकार को सुन कर महाराज जनक ने अपने जीवन भर के पुण्य प्रदान कर समस्त नारकीय जीवो को मुक्त किया|अन्त.मे जब जनक ने धर्मराज से पूछा -'मैंने कौन -स ऐसा पाप किया था जो मुझे नरक द्वार तक लाया गया ?'तब यमराज ने कहा -राजन !तुम्हारा तो समस्त जीवन पुण्यो से भरा पड़ा है ,परन्तु -'एक बार तुमने चरती हुई गाय के कार्य मे विघ्न डाला था ,उसी पाप के कारण तुम्हे नरक का द्वार देखना| पड़ा इस प्रसंग से ये पता चलता है कि गो की सेवा ना करने वालों का इहलोक ही नहीं परलोक भी बिगड़ जाता है कितनी बड़ी महिमा है गो सेवा की | प्राचीन भारत गो संस्कृति पर आधारित था |गाय का दूध ,गाय का दही ,गाय का माखन लम्बी आयु और स्वस्थ जीवन के लिए अमृत है iइस प्रसंग को उठाने के पीछे मेरा मकसद यही है कि हम सब भारत के वासी अपनी परम पूज्या गो माता कि रक्षा करे गोसेवा जितनी भी हो सकती है हमेशा करे |और हमारी सरकार ऐसे कारगर और सख्त  उठाये जिस से गोवध कम हो सके | जय हो गो माता कि |

Monday, 31 December 2012

ख़ुशी के पल




 "ये तुम्हारी मम्मी को क्या होगया है ,आजकल रोज ही बाल्कनी मे खड़ी होकर किससे फोन पर बतियाती रहती है | कंही किसी के साथ इश्क का कोई चक्कर तो नहीं है |पता करो"…… सिमी को अपनी फ्रेंड के मुंह से ये सब सुन के बहुत बुरा लगा ,क्योकि अपनी मम्मी  को वो बहूत प्यार करती थी | माँ बेटी दो जनों का ही परिवार था ,तो जाहिर था उसके लिये माँ ही सब कुछ थी | उसने इस बात के लिए रीना से झगडा भी किया रीना गुस्सा होकर अपने घर चली गई , पर जाते जाते सिमी के दिमाग में शक नाम का कीड़ा भी डाल गई | 
         अब जाहिर है की पुरे दिन उसका ध्यान अपनी मम्मी  पर ही लगा रहा पर मालती अपने फोन को एक पल के लिए भी अकेला नहीं छोड़ ती थी| सिमी मौका देखने लगी की केसे उसे मम्मी का फोन मिले और वो उस व्यक्ति का पता लगाये , जिससे वो बाते करती है | सिमी का शक भी यकीन मे बदलने लगा था | एक दिन वो कॉलेज से जल्दी घर आगयी , उसने देखा की मालती किसी के साथ फोन पे हंस हंस के बाते करने मे मशगुल है | मम्मी को उसके आजाने का जरा भी भान नै हुआ ,ये देख के तो और भी दुखी हुई |कुछ जान सके, इसलिए वो वहा खड़ी होगयी जंहासे मम्मी की बाते सुन सके,और वो मम्मी को दिखे भी नहीं | तभी उसके कानो में आवाज आई ”नहीं राजीव अब ये सब करने की उम्र नहीं रही ,अब तो उम्र के उस पड़ाव पर हू जहाँ ये सोचना शोभा नहीं देता | में तो इस बात से ज्यादा दुखी हु की कही मेरी बेटी को भी किसी से प्यार न हो जाये , में कहा कर पाउगी दोबारा ये सब ” ये कहकर वो जोर से हस पड़ी |सिम्मी के कानो में जेसे किसीने उबलता हुआ गरम तेल डाल दिया हो ,वो गुस्से से तम तमाती हुई अपने कमरे में चली गई ,इधर मालती बात ख़तम करके आई तो पता चला की बेटी कालेज से  गई हैतो वो सीधे उसके कमरे में गई और बोली ”तुम कब आई सिम्मी ” ये सुन गुस्से से जोर से बोली ”जब आप अपने दोस्त के साथ फोन पर बाते कर रहीथी ,और मुंह फेर के सो गई | मालती को एहसास हो गया था की सिम्मी को उसका राजीव के साथ बात करना बरदास्त नहीं हुआ | उसी वक्त राजीव को फोन किया और कहा ”आज के बाद मुझे फोन मत कर ना ”उधर राजीव पूछता रहगया की क्या हुआ ….तब तक उसने फोन कट कर दिया |उस दिन के बाद माँ -बेटी में कोई संवाद नहीं हुआ ,जेसे अजनबी हो , 
                तभी सिम्मी अपने साथ एक इसाई लड़के  को लाई और मालती से कहती है की ”मम्मी में जॉन से प्यार करती हु और शादी कर ना चाहती हु ”मालती सुन कर हतप्रभ हो गई ,जेसे उसे सांप सूंघगया हो | कुछ पल के बाद अपने आप को सहज कर के बेटी को समझा ने के लिए जेसे ही मुह खोला की सिम्मी बीच में ही बोल पड़ी उस लड़के के सामने ही अपनी माँ को कहा” आप शादी का सोचो उससे पहले में शादी कर लू ”,और वो जॉन के साथ दुसरे कमरे में चली गई |
          अब मालती की जान उसकी बेटी में अटकी पड़ी थी की उस की बेटी के साथ कुछ एसा वेसा न हो जाये ,मालती को राजीव पर गुस्सा आरहा था की उसने क्यों राजीव के साथ बातो का सिलसिला शुरु की या,रात को वो सिम्मी के कमरे में गई ,सिम्मी सो रही थी ,जेसे ही उसने अपना हाथ प्यार से उसके सर पर रखा सिम्मी ने उसका हाथ झटक कर दूर कर दिया और बोली ”मुझ से दूर रहो आप और मेरी शादी की तैयारी करो ” मालती रो पड़ी | 
             दुसरे दिन रोज की तरह नास्ता नहीं बना ,तो सिम्मी चिल्लाने लगी अब नास्ता भी नहीं मिलेगा क्या ,गुस्से से वो मालती के कमरे में गई लेकिन वहा का दृश्या देख कर आवक रह गई और भाग कर माँ के पास चली गई | मम्मी ने नींद की गोलिया खाली थी | अब उसे समझ नही  आ रहा था की वो क्या करे ,कुछ सोच कर उसने मम्मी का फोन उठाया और राजीव को फोन किया और कहा की ” मम्मी ने नींद की गोलिया खाली है कुछ कीजिये जल्दी से प्लीज ”कुछ देर बाद राजीव एम्बुलेंस को साथ ले कर आया , और मालती को अस्पताल पहुँचाया | 
          डॉ. ने सात घंटे के बाद आकर बोला की अब वो खतरे से बाहर है |सिमी और राजीव ने राहत की साँस ली , रीना ने ओपचारिकता के नाते राजीव का धन्यवाद किया,और वो मम्मी के पास चली गई और झगड़ा करने लगी की ”आपको अगर कुछ हो जाता तो मेरा क्या होता ” माँ बेटी एक दुसरे के गले लग कर रोयी तबी डॉ. आया बोला की ”इनको अभी आराम करने दो ”और मालती सो गई |
       अब सिमी ने राजीवे से कहा की ”अंकल बुरा मत मानना पर मेरे पापा की जगह कोई नहीं ले सकता ” तब राजीव बोला ”तुमे पता है की तुम्हारे पापा कोन है| सिमी बोली नहीं मम्मी को इस बात से तकलीफ होती थी ,इस लिए कभी पूछा नहीं ,राजीव बोला ”सच बात तो ये है की तुम्हारे पापा कोई है ही नहीं ,तुम्हारी मम्मी का बलात्कार हुआ था और तुम्हारा जन्म हुआ | घर के लोगो ने मम्मी से तुमे कोख में मारने के लिए बोला पर उसने कहा इसमें इस बच्चे का क्या कसूर है में इसे नहीं मार सकती ,और तुम्हारी मम्मी ने सबके विरोध के बावजूद तुम्हे जन्म दिया ,इतना बड़ा किया और एक बेहतर जीवन दिया ,और जब मैंने उसे थोडा सहारा देना चाहा तो तुम उसे गलत समझ ने लगी | अपनी माँ को समझो तुम्हारे प्रति उसकी वात्सल्यता की भावना समझो |
        कुछ देर चुप रहने के बाद सिमी राजीव से बोली ”आप मेरे पापा बनोगे राजीव की आँखों मै ये सुन के आंसू आ गये | सुबह जब मालती की आँख खुली तो उसने राजीव और सिमी को एकसाथ अपने पास बेठे देखा और गुस्से से बोली राजीव तुम यहाँ क्यों आये हो तुरंत चले जावो तभी सिमी ने माँ को चुप रहने का इशारा किया और बोली ”मम्मी मुझे मेरे  पापा मिल गये  और वो राजीव है मालती ने सिमी को गले  से लगा लिया अब मालती राजीव और सिमी खुश थे|


                                                                                                   शांति पुरोहित

Wednesday, 5 December 2012

माँ ...


आज नवरात्रि की पूजा समाप्त कर रमा कुछ देर माता दुर्गा की तस्वीर के आगे बैठे बैठे सोच रही थी कि इस जहान में माँ की महिमा कितनी बड़ी है ,यह नयी क्या कोई किसी को बताने वाली बात है। तस्वीर में बैठी माँ की पूजा और हाड-मांस की बनी जो पुत्र को नौ महीने पेट में रख कितना कष्ट सहन करती है ,उसका इतना निरादर क्यूँ ? सभी को ज्ञान है तीनो लोकों में माता के सामान कोई गुरु नहीं है।
रमा को सोच कर ही हैरानी हो रही है कि या आज की नई पीढ़ी माँ-बाप को बोझ क्यूँ समझ रही है।और ना ही उचित सम्मान ही करती है । वह एक ठंडी सी साँस लेकर अपने गत के बारे में सोचने लगी ......
रमा के पिता समाज के एक जाने माने और प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। उस ज़माने में लड़कियों को पढाने का कोई चलन नहीं था।बस अक्षर ज्ञान बहुत था।घर के काम सीखना ही जरुरी था। उसकी दादी तो इसके घोर विरुद्ध थी।उनके विचार से लड़कियां अगर घर का काम सीखे तो काम आता है यूँ ही कागज़ काले करने का क्या फायदा। पर उसके पिता का मानना था के अगर कोई लड़की पढेगी तो ना केवल उसका जीवन बल्कि वह आने वाली पीढ़ी को भी सुधार सकती है।
लेकिन रमा आठवीं कक्षा तक ही पढ़ पाई।दादी की जिद पर रमा की शादी कर दी गई।रमा ससुराल के माहौल में जल्दी ही रम गयी।ससुराल में रमा को वह सब नहीं मिला जो मायके में उसे मायके में मिला था।ससुराल में खेती का ही काम था । उसके पति एक कम्पनी में काम करते थे।
समय का फेर या रमा की किस्मत कहिये ,पानी -वर्षा के आभाव में खेती का काम भी धीरे-धीरे बंद हो गया।अब वह पति के साथ शहर आ गयी।इस दौरान वह दो बच्चों की माँ बन चुकी थी।पति की तनख्वाह ही थी गुज़ारे को। रमा सोचती के अगर वह भी कुछ पढ़ी होती तो वह भी घर चलाने में अपना योगदान दे सकती थी।वह अपनी जरूरतों को कम करते हुए अपने बच्चों का और घर बहुत अच्छी तरह चला रही थी।उसने अपनी कीमत तो कभी समझी ही नहीं ना ही कभी बच्चों को समझाई।
यह तो होता ही है अगर कोई खुद अपनी कद्र नहीं करता तो कोई और भी उसकी कद्र नहीं करता। हर इन्सान को अपने आप से प्यार तो करना ही चाहिए।
फिर बच्चे बड़े हो गए। उनकी शिक्षा भी पूरी हो गयी।बेटी ससुराल चली गयी। बेटे को अच्छी सरकारी नौकरी मिल गयी।अब रमा कुछ राहत की सांस ले रही थी और खुश भी हो रही थी।सोच रही थी के बहू के आजाने पर वह आराम करेगी और खूब सेवा करवाएगी उससे।लेकिन यह एक टूट जाने वाला सपना ही साबित हुआ।
बहू तो नयी पीढ़ी के कुछ आत्म केन्द्रित लोगों में से एक थी।यानि कि नयी पीढ़ी में भी संस्कार वान होते हैं।पर उसकी बहू कोमल ऐसी नही थी।सास-ससुर के लिए कोई सम्मान नहीं था।
रमा ने सोचा था की बहु को वह बेटी से भी ज्यादा प्यार देगी।पर कोमल को रमा के लिए कोई आदर मान नहीं था। उसे बस अपने पति से ही लगाव था। अब यह तो सोचने वाली बात है पति इतना प्यारा और उसको जन्म देने वाली माँ का ऐसा निरादर ...!
बेटा भी धीरे-धीरे बहू के रंग में ढलता गया।
फिर एक दिन उसके पति भी साथ छोड़ चिर निद्रा में सो गए।अब वह बहुत अकेली पड़ गई। कहाँ तो वह सोच रही थी के एक दिन बेटा तीर्थ यात्रा करवाएगा।कहाँ वह अभी भी इस उम्र में भी रसोई को नहीं छोड़ पा रही अपनी आराम परस्त बहू के आगे। हिन्दू संस्कृति में माँ बनना और उस पर बेटे का जन्म होना बहुत सौभाग्य माना जाता है किसी भी स्त्री के लिए।यही सोच कर वह बहू के तीखे बानों को और बेटे की बेरुखी को सहन करती जाती थी।बेटी कभी मायके आती तो अपनी व्यथा उसे सुना कर अपना मन हल्का कर देती।उसे खाने बनाने और खाने का बहुत शौक था ...बनती तो अब भी थी पर खाने के मामले में बहु के ऊपर निर्भर थी। मन मार रह जाती। बहू की दलील थी के ज्यादा खाएगी तो उस उम्र में हजम भी नहीं होगा और पेट भी खराब होगा।
बेटी जब आती तो कुछ छुपा कर दे जाती तो वह खा पाती।
बाहर जाने का मन भी होता तो उसे इजाजत ही मांगनी पड़ती और वह भी कभी मिलती तो कभी नहीं मिलती।जब नहीं जा पाती तो बेबस सी अपने कमरे में पड़ी रहती और सोचती के कलयुग में ये बच्चे अनजाने में अपराध कर रहे हैं।प्रभु इनको माफ़ करें।
यही एक भारतीय नारी के साथ -साथ एक ममतामयी माँ की निशानी है।जो पुत्र अपनी पैंसठ वर्षीय माँ की परवाह नहीं करता उसकी सलामती और तरक्की के लिए व्रत रख रही है।
सोचते- सोचते रमा के आंसू बह निकले।तभी ख्याल आया बेटा बहु तो बाज़ार गए हैं आते ही खाने को मांगेंगे तो क्या दूंगी। जल्दी से हाथ जोड़ , रसोई की तरफ चल पड़ी।
दुर्गा माँ अब भी मुस्कुरा रही थी आशीर्वचन की मुद्रा में ,पर ये आशीर्वचन किसके किये था पता नहीं .....
शांति पुरोहित ...