Tuesday, 10 March 2015

उन्वान

उन्वान 76 रंग 
कृष्ण रंग जीवन का छंट जाय
राग द्वेष मनु ह्रदय से हट जाय
जीवन अट जाय प्रीत रंग संग
प्रेम गुलाल मीत संग बंट जाय 
शान्ति पुरोहित

महिला दिवस पर दो शब्द

महिला दिवस पर दो शब्द - अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मात्र एक औपचारिकता भर रह गया है। आज भी औरतो को आजादी से जीने की इजाज़त नही है। जिस दिन वो दुनिया में आती है उसी दिन से उसका समस्याओ से सामना होने लगता है। घर के लोगो को लड़की के लिए कुछ भी उसकी माँ द्वारा करना ठीक नही लगता।लड़के और लड़की के पालन पोषण से ही लिंग भेद उजागर होने लगता है। इसके साथ ही समाज के कुछ पुरुषो की उच्छखलता के कारण आज भी लड़कियो को योग्यता होते हुए भी शहर से बाहर पढ़ने नही भेज सकते। और अगर हिम्मत करके भेज भी दे तो माता-पिता की जान मुठ्ठी में होती है।महिलाओ की रक्षा के लिए सरकार और समाज को मिलकर कारगर कदम उठाने चाहिए तभी सही अर्थो में महिला दिवस मनाने का औचित्य है वरना औपचारिकता भर ही मानी जाएगी।
शान्ति पुरोहित

मुक्तक

मन मंदिर में बसे है मोहन 
गोपी वस्त्र चुराते है मोहन 
नाम तेरा जपते-जपते ही 
संसार से कूच करादे मोहन 
शान्ति पुरोहित

छंद मुक्त कविता

दुर्गा बन संघारक बनी
जन्मदायनि सृजनधर्मा 
ब्रह्मा बन सृष्टि रचना की 
विष्णु बन की पालन 
महेश बन कष्टो को काटा 
माँ तूँ अद्भुत प्राणी
शान्ति पुरोहित

मुक्तक

मुक्तक 

लगे ये अपनों की दुनिया 
टूटते सपनों की दुनिया 
कोई नही सगा किसी का
संगदिल लोगो की दुनिया
शान्ति पुरोहित

'बहू बनाम बेटी''

'बहू बनाम बेटी'' 
अचानक सहेली प्रभा की मौत की खबर सुन कमला तो जैसे अंदर तक हिल गयी | प्रभा की बहू का फोन आया और वो जाने की तैयारी में लग गयी | ट्रेन में बैठी- बैठी कमला उसी के बारे ही सोच रही है ' कुछ दिन पहले ही प्रभा का पत्र आया था कि बहू का मेरे प्रति व्यवहार बिलकुल भी ठीक नही है सम्मान की भावना तो दूर- दूर तक उसके मन में नही आती हैअति व्यसत्तता के चलते ज्यादा तो नही केवल एक बार ही प्रभा के घर जा सकी थी तब मुझे तो उसके व्यवहार में कोई कमी नही दिखी | आखिर चार घंटे के सफर बाद प्रभा के घर पहुंच गयी | बहू तो मुझसे लिपट कर दहाड़े मार कर रोने लगी विनय भी मुहँ लटकाए खड़ा था| आखिर कार एकांत पाकर बहू और विनय ने मुझसे बात की |माँ जाते -जाते एक पत्र और लिख गयी जिसके अनुसार उसे बहू ने मरने को उकसाया है हम दोनों बहुत परेशान है हमारा एक साल का नन्हा बच्चा भी है अगर नेहा को जेल होती है तो बच्चे का क्या होगा आंटी जी हमने तो हर तरह से माँ को खुश रखने की कोशिश की पर उन्हें हमारी हर बात गलत ही लगती थी |माँ तो अपनी सांस की बीमारी से मरी है कौन अपनी माँ को मरने को छोड़ेगा |बराबर डॉ देखने आता था | बहू को अभी तो जमानत पर छोड़ा गया है | मैंने बहू को बचाने को अपनी मोरल ड्यूटी समझा और मै बहू और विनय के साथ उसी वक्त पुलिस थाणे पहुंच कर अपना बयाँ दर्ज कराया और बहू को केस से मुक्त होने में अहम रोल अदा किया ऐसा करके मैंने अपनी बेटी समान बहू को मुश्किल में पड़ने से बचाया | उसी दिन से बहू ने मुझे अपनी माँ माना और मैंने सहेली की बहू को अपनी बेटी |
शान्ति पुरोहित

प्यार का रंग

प्यार का रंग 
अपने दोनों भाईयो की प्यारी बहना थी निशा। हर होली पर भाईयो के टीका लगा कर ही होली खेलने की शुरुआत करती थी। बरसो से यही चलता आ रहा था। पर इस बार ऐसा कुछ नही था। निशा की शादी पिछले साल हो गयी थी। शादी के कुछ माह बाद ही उसके पति की मौत हो गयी। तब से वो कमरे से बाहर ही नही निकली। पर आज होली के दिन दोनों भाई ने हिम्मत की और बहन को वापस घर लाये और टीका लगवाने की जिद करने लगे। आखिर भाईयो की आँख में आँसू देख कर वो अपने आप को ज्यादा वक़्त तक नही रोक सकी। भाईयो ने एक बार फिर से बहन के जीवन में प्यार का रंग लगाया।
शान्ति पुरोहित