Tuesday, 24 December 2013

सबक

                      सबक                                                                               नीरा के दिन की शुरुआत ही रजत के मैसेज से होती थी | ढेरों मैसेज और मिस्ड काल नीरा के मोबाइल मे आये हुए रहते थे | पर आज नीरा ने उठने के साथ मोबाइल चेक किया तो एक भी मैसेज या मिस्ड काल नहीं था ! नीरा का माथा ठनका ! खुद को संभाल कर ,बुरे ख्याल जो दिल मे आरहे थे ,उनको एक झटके के साथ दिमाग से निकाला और रजत को फोन लगाया | कई बार फोन करने पर भी रजत का फोन ना उठाना, शक यकीन मे बदलने लगा | दिल जैसे गहरे कुँए मे डूबने लगा ,डर गयी नीरा ,तभी इस बार रजत ने फोन उठाया तो सही, पर बर्फ सी ठंडी आवाज मे बोला ‘’नीरा मुझे आज बिलकुल टाइम नहीं है,नहीं मिल सकता तुमसे|,हाँ ,मेरे दोस्तों के साथ मेरी शर्त लगी थी तुम्हे अपने प्यार के जाल मे फंसाना,और !देखो मै शर्त जीत गया| ,इतना बोलकर झट से फोन कट कर दिया |
               नीरा रजत के मुहँ से ये सब सुनकर सन्न रह गयी | वो रजत से प्यार करने लगी थी |नीरा सोच रही है| आज मेरा पहला प्यार टूट गया,रिश्ता जो मेरे और रजत के बीच था,आज वो पूरी तरह से टूट गया है | सुना था पहला प्यार टूटता है |पर ये सब लोगो द्वारा बनाई धारणा है| अगर पहला प्यार टूट जाता हैतो कोई क्यों दूसरा प्यार करेगा? प्यार होता तो टूटता ही नहीं| टूटता है तो मैंने क्यों किया ? और फिर सबका कोई न कोई पहला प्यार तो रहता ही है|
                    मैंने B.TEC. करने के लिए देहली युनिवर्सिटी मे एडमिशन लिया और पहले ही दिन से लग गयी अपने लक्ष्य का पीछा करने| पर मैंने देखा कॉलेज मे कोई बहुत कम विद्यार्थी ही थे ,जो पढने मे रूचि लेते थे |बाकी सब तो टाइम पास करने आते थे केन्टीन मे बैठ कर चाय के साथ देश मे  घटित ताजा घटनाओ पर चर्चा करते थे| जब विद्यार्थी क्लास में नहीं आते तो लेक्चरार भी कोलेज मे कम ही आते थे |
                      पहले साल तो मैने कालेज मे किसी से दोस्ती नही की,पर दुसरे साल के आरंभ मे  जूही ने दोस्ती का हाथ बढाया,तो मै मना नहीं कर सकी| जूही के साथ अक्सर मुलाकात हो जाती थी | रजत जूही का दोस्त था,एक दिन जूही और मै पुस्तकालय में बैठे थे | तभी रजत आया ‘’हेल्लो नीरा,’हेल्लो,मैंने कहा| ‘’मै रजत,मेरा थर्ड इयर चल रहा है|, रजत ने कहा |उस दिन के बाद रजत के साथ मेरा मिलना-झुलना बढ़ता गया | रजत से मै, प्यार करने लगी,धीरे-धीरे मै उसके प्यार में पागल हो गयी, उससे शादी करना चाहती थी| ‘रजत अब शादी के लिए ने माता-पिता को बोलो, अब मै अपने रिश्ते को नाम देना चाहती हूँ|,मैंने कई बार रजत को कहा|
                     रजत मेरे इस प्रस्ताव को कोई अच्छा सा बहाना बना कर टाल देता था| इसी दौरान मेरा बी.टेक.पूरा हो गया,रजत पिछले दो साल से मेरे साथ घूमना-फिरना,होटल में जाना शौपिंग आदि करता रहा| मुझे उसने पूरा भरोसा दिलाया अपने साथ शादी करने का, मैंने कभी एक पल के लिए भी नहीं सोचा,रजत मुझे इस तरह धोखा देगा| उसने केवल शर्त जितने के लिए मेरे दिल के साथ खेल खेला | मैंने भी रोना-धोना छोड़ कर उसे सबक सिखाना चाहा| उसी दिन मै ‘’राज्य महिला आयोग’’के ऑफिस जाकर रजत के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाई|’’महिला आयोग’’ की सदस्य उषा शर्मा,पुलिस को लेकर रजत के घर पहुँच गयी| रजत को गिरफ्तार किया |मै उसे गिरफ्तार होकर जाते देखती रही| उसके चेहरे पर अपने किये का पछतावा था| कहीं-न-कहीं उसने सोचा होगा कि लडकिया अबला,कमजोर होती है मेरा कुछ नही बिगाड़ सकती है|पर उसने नारी शक्ति को पहचानने में भूल करी है|

शांति पुरोहित 

Friday, 22 November 2013

विदाई

                                                                       
                                                                                                   प्रिया, अपने भाई की बड़ी दीदी थी | वो भी मात्र पंद्रह साल की बस !  परिस्थिति ने प्रिया को बड़ा बना दिया | उसका बचपन अपने भाई की देख-भाल और घर की सारी जिम्मेदारी उठाने मे कहीं खो गया | दिव्या प्रिया की माँ, असमय इस दुनिया से सबको छोड़ कर चली गयी |
                     दिव्या बहुत ही नेक -दिल इंसान थी | दुसरो का भला करने की उसमे गजब की आदत थी | जैसे -दिव्या का जन्म परोपकार के लिए ही हुआ हो | अतिश्योक्ति ना होगी अगर कहूँ, कि परदुख कातरता उसमे कूट -कूट कर भरी हुई थी | पड़ोस मे या परिवार मे किसी को दिव्या की जरूरत हो वो तुरंत उनके पास अपना सब काम छोडकर पहुँच जाती | किसी की शादी हो या कोई बीमार हो उनकी सेवा करना उनके काम आना यही जैसे उसके जीने का लक्ष्य था |सिर्फ तन से ही नहीं वो धन भी खर्च करती थी | कई गरीब लडकियों की शादी मे उसने पैसा लगाया है |
               दिव्या अपनी गृहस्थी मे पति ,सास और दो बच्चो के साथ बहुत ही खुश थी | रेलवे मे काउंटर बाबू की नौकरी करती थी |पति किशोर कॉलेज लेक्चरार थे | दस बजे अपने ऑ|फिस जाने से पहले किशोर और दोनों बच्चो को भेजने की तैयारी मे लगी रहती | रोज सुबह घर मे उनकी जरूरत की चीजो के लिए दिव्या को इधर से उधर भागना पड़ता है, पर वो उफ़ तक नहीं करती है | उसे तो जैसे ये सब करने मे आनंद की अनुभूति होती है | और क्यों ना हो, एक औरत की ख़ुशी अपने परिवार को खुश देखने मे ही है |
                 सुबह की पहली किरण के साथ ही दिव्या बिस्तर छोड़ काम मे जुट जाती थी | 'मम्मी मेरा बैग तैयार है न |' प्रिया बाथरूम से ही चिल्लाती है | ' मम्मी मेरा लंच -बॉक्स रेडी हुआ की नहीं |, पंकज ने जुते की लेस बांधते हुए कहा |'
                 'हाँ ,हाँ सब तैयार है बस तुम आकर नाश्ता करलो तो तुम्हारे पापा ,को भी नाश्ता दे दू | दिव्या ने कहा |, सब को भेजने से पहले ही मांजी को चाय देनी होती है | सबकी जरुरत पूरी करते -करते वो खुद भी तैयार हो जाती थी | गजब की फुर्ती थी दिव्या मे उसकी सास रोज ही कहती है |
                    धीरे -धीरे समय बीत रहा था ,बच्चो का स्कूल ख़त्म होकर अब कॉलेज शुरू होने वाला था | बच्चे अगले साल कौनसी कॉलेज जायेंगे ,घर मे रोज यही बाते चल रही है | एक दिन सुबह दिव्या के सीने मे असहनीय दर्द होने लगा | किशोर घर पर ही थे जल्दी से गाडी निकाली और दिव्या को शहर की सबसे बड़ी हार्ट होस्पिटल मे ले गया | डॉ, ने तुरंत ही एडमिट करके इलाज शुरू किया | करीब एक महिना तक इलाज चला | आज दिव्या को डिस्चार्ज किया जाना था बच्चे खुश थे उनकी मम्मी इतने दिनों के बाद ठीक होकर घर आ रही है | किशोर की माँ ने बहु को खूब आशीर्वाद दिया और ठीक होकर वापस घर और बच्चे को सँभालने को कहा |
                         होना तो कुछ और ही था घर आने के चार दिन बाद ही दिव्या बच्चो को रोता छोड़ कर इस दुनिया से चली गयी | किशोर बच्चो के सामने रो भी नहीं सकता| बच्चे दादी से बार -बार पूछ रहे है कि हमने एसा क्या पाप किया कि हमारी माँ हमे अकेला छोड़ कर चली गयी | बच्चो का रुदन किसी से भी नहीं देखा जा रहा था | दिव्या को लाल जोड़ा पहनाया गया  , लाल बिंदी और किशोर से मांग भरवाकर सुहागिन के वेश मे अंतिम सस्कार के लिए ले जाया गया |
                        समय बीतता गया बच्चे अब बड़े हो गये घर मे कोई औरत हो इसलिए बेटे की शादी पहले की गयी | प्रिया की शादी भी तय हो गयी है एक माह बाद प्रिया की शादी होनी है घर मे अभी से तैयारिया शुरू हो गयी | आज प्रिया की मेहँदी है | कल हल्दी और महिला संगीत रखा है | सब काम हो रहे है बच्चो को अपनी माँ आज कुछ ज्यादा ही याद आ रही है | प्रिया उदास अपने काम मे लगी है | महमानों की भारी भीड़ मे प्रिय अकेला महसूस कर रही है |अपनी माँ को ढूंड रही है | माँ के वयवहार के कारण बहुत लोग शादी मे प्रिया को आशीर्वाद देने के लिए आये है | मेंहमानों का तो जैसे ताँता लग गया | सब अपनी और से गिफ्ट भी लेकर आये है|किशोर को प्रिया को देने के लिए कुछ भी लाना नहीं पडा सब सामान की व्यवस्था मिलने वाले लोगो ने कर दी थी  अब प्रिया को लग रहा है कि मेरी मम्मी कितनी महान थी | जब दिव्या गयी तब प्रिया बहुत छोटी थी कुछ समझ पाने की हालत मे नहीं थी | सब लोग उनको जैसे आज सच्ची श्रदांजली देने आये है मुझ बिन माँ की बेटी को अपना प्यार और आशीर्वाद देने की जैसे होड़ मच गयी है |
                         आखिर प्रिया की विदाई का टाइम भी आ गया|सब ने प्रिया की विदाई को जैसे विदाई महोत्सव बना दिया | एक -एक कर सब गले मिल रहे थे | अंत मे प्रिया की दादी ने उसकी सास को कहा कि 'ये बिन माँ की बच्ची है इसे आप बहुत प्यार से रखना |, दुल्हे राजा और उनके परिवार के लोग प्रिया को डोली मे बिठाकर अपने घर ले गये | पापा और दादी को अकेला छोड़ कर आज प्रिया अपने ससुराल चली गयी सब की आँखे नम है |

Wednesday, 20 November 2013

ख्वाहिश दिल की

फैशन डिज़ायनर रूपा का अपने बुटिक मे आते ही काम मे व्यस्त हो जाना, अपने स्टाफ को काम समझाना,ये उनका डेली का रूटीन था |फैशन डिजा
 '' मिस डिसूजा , मिस रूबी का आर्डर रेडी हुआ की नहीं ? डिसूजा कुछ जवाब देती, उससे पहले ही रमेंद्र से पूछ बैठी '' आस्था मेंम ,की ड्रेस के लिए कल जो डिजायन आपको दिया था ,वो ड्रेस रेडी हुई की नहीं ?
    अरे ! जल्दी -जल्दी सबके आर्डर तैयार करो ! दीपावली का त्यौहार है सबको समय पर अपना आर्डर चाहिए होता है |पर आज रूपा का मन कहीं और है वो ऑफिस मे आराम कुर्सी मे बैठ गयी | त्योहारी सीजन के चलते सास लेने भर की भी फुर्सत नहीं है | थकान सी हो रही थी | उठकर ऑफिस की खिड़की खोली तो हल्की सुनहरी धुप  ऑफिस मे प्रवेश कर गयी | दिसंबर माह मे धुप सुहानी लगती है | धुप मे बैठना रूपा को बचपन से ही अच्छा लगता था |
            रूपा धुप का आनंद लेने लगी | दिमाग को एकांत मिलते ही मन गुजरे वक्त की खटी -मीठी यादो मे गोते लगाने लगा | 'इकलौती संतान थी ,पापा मुझे डॉ. बनाना चाहते थे वो खुद भी डॉ. थे | वो अपना क्लिनिक मुझे सौप कर खुद लोगो की फ्री सेवा करना चाहते थे | मेरी रूचि फैशन डिजायनर बनने मे थी | अपना खुदका बुटिक खोलना चाहती थी | मम्मी हमेशा मेरा ही साथ देती थी | पापा को समझाती 'आप क्यों अपनी मर्जी बच्ची पर थोप रहे हो ,उसे जो करना है करने दो ? पापा को मम्मी की बातो से कोई फर्क नहीं पड़ता था वो अपनी जिद पर अड़े थे और मै अपनी ....
            आखिर मेरा सीनियर का रिजल्ट आने के बाद मम्मी ने पापा को समझा-बुझा कर मेरा एडमिशन फैशन डिजाइनर के कोर्स के लिए करवा दिया था | मै बहुत खुश थी | अभी मेरा डिप्लोमा पूरा हुए एक माह ही बीता था कि पापा -मुम्मी ने मेरा रिश्ता एक इंजिनियर लड़के निलेश से पक्का कर दिया था | बहुत कोशिश की ,अभी शादी ना हो ,मै पहले अपना बुटिक खोलना चाहती थी | पापा ने मेरी एक न सुनी और कुछ समय बाद शादी हो गयी | मेरी इच्छा मेरे मन के किसी कोने मे दब कर रह गयी |
           ससुराल मे पति निलेश के पापा- मम्मी एक बहन और दादी थे | नई बहु से सबको बहुत सी अपेक्षाए होती है यहाँ भी थी |सब की इच्छा पूरा करने मे अपना सपना याद ही नई रहा | निलेश की जॉब अभी लगी ही थी तो वो मुझे बहुत कम समय दे पाते थे |अक्सर टूर पर जाना होता था | समय अपनी गति से चलता रहा | एक साल बीत गया | आखिर आज निलेश के जन्मदिन के अवसर पर अपनी बात कहने का मौका मिला '' मुझे बुटिक खोलना है प्लीज मेरी मदद कीजिये न आप , मैंने बहुत ही प्यार से कहा |
          अरे ! इसमें प्लीज बोलने की क्या जरुरत है ?
          तुममें योग्यता है ,काम करना चाहती हो मै कल ही लोकेशन देख कर बताता हूँ |
तम्हारा साथ देना मेरा फर्ज है ,मै आज बहुत खुश थी | पर जैसे ही सासु माँ को पता चला उन्होंने तुरंत आदेश दे दिया '' पहले हम घर मे अपने पोते -पोती को देखना चाहते है बुटिक बाद मे खोलना |, माजी का आदेश था तो निलेश भी चुप रह गया | मै एक बार फिर मन मसोस के रह गयी |
            दिन ,महीने ,साल निकलते रहे ,इसी दौरान मै एक बेटी और एक बेटे की माँ बन गयी थी | अब तो मेरा एक ही काम रह गया था बच्चो ,निलेश और ससुराल वालो की सेवा करना | इन सब के बीच मेरी कला अपना दम तोड़ रही थी | कभी नहीं सोचा था कि मेरी पढाई और मेरे हुनर का ये हाल होगा | निराशा मेरे अन्दर घर कर  गयी |
             समय बीतता रहा अब मेरी बेटी नीता कॉलेज जाने लगी और बेटा निर्भय भी अगले साल कॉलेज  जाने लगेगा | अगले सप्ताह नीता के कॉलेज मे वार्षिक उत्सव होने वाला था नीता ने फैन्सी ड्रेस प्रतियोगिता मे भाग लिया था| उसने टेलर से जो ड्रेस बनवाई वो उसे बिलकुल भी पसंद नहीं आयी | नीता उदास हो गयी | आज फिर किसी अन्य टेलर के पास गयी | बेटी की उदासी मुझसे देखी नहीं गयी | तभी मुझे अपनी कला का ख्याल आया मैंने आज अपनी कला का उपयोग करके बड़े ही मनोयोग से बेटी के लिए ड्रेस तैयार करली |
             शाम को जब नीता उदास चेहरा लेकर घर वापस आयी | ''कुछ काम नहीं बना क्या ? मैंने पूछा | नहीं माँ , तभी उसके हाथ मे वो ड्रेस रखी मैंने | नीता ख़ुशी से उछल पड़ी ''वाह माँ , आपने कहाँ से बनवाई ड्रेस ?,
            बहुत अच्छी है मुझे एसी ही ड्रेस चाहिए थी |, तभी मेरी सासु माँ ने उसे कहा 'तेरी माँ रूपा ने ही बनाई है | आज हमे अपनी गलती का एह्सास हो रहा है | ' किस गलती का दादी , नीता ने कहा | रूपा बह इतनी टेलेंटेड है पर हमने इसे घर के कामो मे लगा कर रखा,  इसकी कला का कभी सम्मान नहीं किया |, सासु माँ ने कहा |
              तो नीता बोली '' अब भी मम्मी अपना बुटिक खोल सकती है, अब तो हम भी अपना काम खुद कर सकते  है | शाम को निलेश आया सासु माँ और नीता ने उन्हें सब बताया | नीता ने पापा से कहा ,मम्मी इतनी योग्य थी ,अपना बुटिक खोलना चाहती थी ,तो आपने मम्मी को सपोर्ट क्यों नहीं किया ?,एक पति को तो अपनी पत्नी की योग्यता की कद्र करनी चाहिए थी | निलेश को सच मे अपनी ग़लती का एहसास हुआ और  निलेश ने अगले ही दिन अति व्यस्त बाजार मे एक दुकान देखली और जोरो से तैयारिया चलने लगी | प्रतियोगिता मे नीता का पहला स्थान आया | नीता भी मेरी मदद करने मे लग गयी |
   आखिर पांच माह के बाद आज मेरे बुटिक का उद्घाटन था | जो मैंने अपनी सासु माँ और ससुरजी के हाथो कराया | बहुत सारे कपड़े लोगो ने खरीदे साथ ही इतने आर्डर आये मे एक साल तक के लिए एक साथ व्यस्त हो गयी | आज तो मेरे बनाये कपड़े देश के अन्य भागो मे भी जाने लगे है | ये सब मेरी बेटी और सासु माँ के कारण ही हुआ है | मेम चाय , मिस डिसूजा की आवाज से मेरा चिंतन ख़त्म हुआ | जब जागो तभी सवेरा वाली बात मुझ पर फिट बैठी है | आज मेरा वर्षो पहले देखा सपना या यू सोच लीजिये कि मेरे जीने का मकसद अब मुझे मिला है |
 
शांति पुरोहित



माँ के लिए.........

                                                                                                                                                                                               
Cover Photo                                                                                                                                                                                                                                       शोर्य को स्कूल और पति संजय के ऑफिस जाने के बाद संगीता, लोन मे बैठ कर चाय के साथ अख़बार पढ़ती थी,ये उसकी रोज की आदत थी | अन्दर का पेज जैसे ही खोला एक समाचार पर नजर पड़ी ,पूरी खबर पढने लगी जो इस प्रकार थी| सेठ दीनानाथ की दूकान का वफादार मुनीम, बीस हजार रुपया ले कर फरार हो गया |
            ये कैसे हो सकता है?, इतना ईमानदार था ,मुनीम रामसिंह ,फिर उसने ऐसा क्यों किया ?, संगीता हैरान रह गयी ये खबर पढकर ! दीनानाथ जी संगीता के पडौसी होने के नाते उनका एक दुसरे के घर आना -जाना होता रहता था | फिर उनकी पत्नी संगीता की सहेली भी थी |
            उस दिन दीनानाथ जी के घर उनके पौत्र चिन्मय की जन्म दिन की पार्टी का अवसर था | रिश्तेदारों के आलावा, शहर की जानी -मानी हस्तिया पार्टी मे शिरकत करने वाली थी | सेठ दिनानाथ जी शहर के रसूखदर आदमी थे | उनका तैयार वस्त्रो का बहुत बड़ा शो रूम था | परिवार मे दो बेटे और एक प्यारी सी बेटी दिव्या थी |
                  बेटी ने M.B.B.S.किया और अपने साथ ही पढने वाले डॉ. विक्रम से उसकी शादी कर दी | और वो अपने ससुराल चली गयी | छोटा बेटा कमलेश पढने के लिए विदेश गया, वहीं पर काम करने लगा, वहीँ की गौरी लड़की के साथ ब्याह कर लिया | दीनानाथ जी और उनकी पत्नी ने बेटे की जिद के आगे समझोता कर लिया | बड़ा बेटा विमलेश, ही परिवार सहित इनके पास रहता था | यहाँ का सारा काम -धंधा ,ये दोनों बाप -बेटे मिलकर सम्भालते थे |
               आज तो सुबह से ही हवेली के सभी नौकर हवेली को सजाने मे लगे हुए थे | दीनानाथ जी के पर -दादा के ज़माने की बहुत बड़ी हवेली थी | रख -रखाव के लिए नौकरों की फौज लगी रहती है |
                    शाम के सुहाने वक्त मे पार्टी शुरू हो चुकीं है | दीनानाथ जी आगन्तुको के स्वागत के लिए दरवाजे पर खड़े,उनका अभिवादन स्वीकार कर रहे है | पास ही खड़े उनके बेटे विमलेश की गोद मे चिन्मय को तोहफा भी दे रहे थे | पार्टी मे खाने -पीने के साथ नाच -गाने का भी प्रोग्रेम था| पार्टी अरेंज करने मे पैसा पानी की तरह लगाया था | सभी लोग पार्टी का आनंद ले रहे थे, वहीँ सेठ का एक नौकर रामसिंह, ये सब देख कर दुखी हो रहा था | उसका सोचना था कि,दिखावे के लिए ये बड़े लोग इतना पैसा खर्च कर सकते है,और एक जरूरत मंद इंसान को पैसा उधार भी नहीं दे सकते है?,
               पिछले दस दिनों से रामसिंह सेठ से अपनी माँ के इलाज़ के लिए बीस हजार रुपया उधार मांग रहा था ,पर सेठ के कान मे जैसे ये बात गयी ही नहीं हो | पैसा पास मे नहीं है, तो क्या माँ को बिना इलाज मर जाने तो नहीं दे सकता ? एक के बाद एक विचार रामसिंह के दिमाग मे आ- जा रहे है | आखिर उसने मन ही मन कुछ निश्चय किया ,और मौका पाकर सेठ की दुकान की तरफ अपने कदम बढ़ा दिए | दुकान के गल्ले मे से रुपया निकाला और घर चला गया |
              दुसरे ही दिन अपनी माँ को इलाज के लिए शहर ले गया | डॉक्टर के प्रयास और रामसिंह की सेवा से माँ जल्दी ही अच्छी होने लगी | एक दिन माँ ने पूछा 'मेरे इलाज के लिए इतने पैसे कहाँ से लाया बेटा ?' माँ सेठ से पेशगी लाया हूँ | पर सच्चाई तो कुछ और ही थी , जिसे सिर्फ वो ही जानता था |
              दुसरे दिन सेठ ने दूकान के गल्ले मे देखा तो पैसे कम मिले |,और आज रामसिंह भी अभी तक नहीं आया | सेठ को समझते देर नहीं लगी कि रामसिंह ही रुपया लेकर फरार हुआ है | सेठ ने पुलिस थाने मे रिपोर्ट लिखवानी चाही पर सेठानी ने रामसिंह की माली -हालत और परेशानी का सोच कर पुलिस थाने मे रिपोर्ट लिखवाने से मना किया |  सेठ ने इस घटना को फिलहाल भूल जाने मे ही अपना भला समझा | कहीं ना कहीं सेठ अपने को ही इस घटना का जिम्मेदार समझ रहा था | काश ! मुझे  रामसिंह की मदद कर देनी चाहिए थी |
              रामसिंह की मेहनत रंग लाई, माँ अब ठीक हो गयी तो रामसिंह अपने खेत को ओने -पोंने भाव मे बेच कर , बीस हजार रुपयों के साथ सेठ के सामने हाजिर हो गया | विनम्र  भाव से बोला ' मैं गुनाह गार हूँ मैंने आपका विस्वास तोडा है | जो सजा देंगे भुगतने को तैयार हूँ | माँ को बचाने के लिए मुझे ये सब करना पडा | मेरी नौकरी ,मेरी बदनामी से ज्यादा मुझे अपनी माँ की जान ज्यादा प्यारी थी | जिसे बचाने के लिए मुझे ये सब करने पर विवश होना पडा | और सेठ को पैसा लौटा कर माफ़ी मांगने लगा | सेठ को पहले तो गुस्सा आया पर खुद को भी जिम्मेदार मानते हुए आगे से फिर कभी ऐसा मत करना बोलकर उसे माफ़ कर दिया |साथ ही ये भी सन्तोष था कि इतने रुपयों मे से केवल बीस हजार रुपया ही ले कर भागा है | पर रामसिंह ने विश्वास तोडा ये सेठ के लिए सोचने वाली बात थी | और उसकी माँ के प्रति एसी भावना देख कर मन ही मन बहुत खुश हुआ | रामसिंह अपनी माँ के सामने किसी भी चीज को तुच्छ समझता है | तो मालिक के फायदे लिए भी कुछ भी कर सकता है | और उसे वापस काम पर रख लिया |
 शांति पुरोहित 

सरकारी अफसर

 आज ऑफिस की छुट्टी है| सिरिष ड्राइंग रूम मे कपिल के साथ बैठा है | कपिल की नन्ही -नन्ही शरारते देख रहा है | कुछ देर की मस्ती के बाद कपिल थक कर सो जाता है सिरिष उसे उठाकर पलंग पर सुला देता है | खुद भी तकिये का सहारा लेकर लेट जाता है,अपने गत जीवन के चिंतन मे खो जाता है |
                  रीमा पिछले बीस -पच्चीस दिनों से हॉस्पिटल के आई .सी .यू .वार्ड मे बीमारी से लड़ रही थी | उसकी किडनी मे इन्फेक्सन हुआ था | डॉ के अनुसार ठीक होने के बहुत कम चांस है | किडनी फ़ैल भी हो सकती है | सिरिष अपने पांच माह के दूधमुहे बच्चे को लेकर रात -दिन पत्नी की सेवा मे इसी आशा के साथ लगा है कि वो जल्दी ठीक होकर हमारे बच्चे को संभालेगी |
                  सिरिष का परिवार अमेरिका मे रहता है,सिरिष को अपने देश भारत मे रहना अच्छा  लगता था ,वो अपनी पढाई ख़त्म होते ही भारत आ गया यहाँ आकर रीमा से शादी कर ली | उस दिन सिरिष आई .सी .यु .के बाहर बैठा था होस्पिटल मे शांत वातावरण था सिरिष विचार मग्न| भविष्य मे आने वाली समस्याओ के बारे मे सोच कर परेशान हो रहा है कि कब ठीक होकर रीमा बच्चे को फिर से सम्भालेगी ? ओर  कुछ सोचता, उससे पहले आई.सी.यु.से नर्स दौडती हुई बाहर आई ,डॉ सात नंबर पेशेंट की तबियत बिगड़ गयी,उसे सास लेने मे तखलीफ़ हो रही है |, सिरिष किसी अनिष्ट की आशंका से घबरा गया उसे तो पता ही था सात नंबर पेशेंट रीमा ही है | डॉ ने भाग कर रीमा को चेक किया ,उसकी सास उखड़ रही थी | रीमा के शरीर के सभी पार्ट्स ने लगभग काम करना बंद कर दिया | डॉ के अथक प्रयास के बाद भी रीमा बच नहीं सकी उसके जीवन की डोर टूट गयी |
                    सॉरी सर ,रीमा इज नो मोर , डॉ ने कहा | सिरिष की आँखों मे आंसू आ गये ,कपिल को भी जैसे आभास हो गया उसकी माँ उसे अकेला छोड़ गयी ,वो भी पापा के साथ जोर -जोर से रोने लगा था | कपिल के रोने से सिरिष चुप हुआ | डॉ. ने कहा 'होस्पिटल की ओपचारिकता पूरी करके आप घर जा सकते हो | कुछ भी सोचने -समझने की ताकत नहीं बची थी | अपनी ओर अपने नन्हे बच्चे के जीवन मे आने वाली तमाम परेशानियों को भुला कर,सिरिष रीमा की डेड बॉडी को घर ले जाने के लिए होस्पिटल की ओपचारिकता पूरी करने लगा | रीमा को अंतिम विदाई देने के लिए परिवार आ चुका था |
                   रीमा को अंतिम विदाई देने के बाद सिरिष इतने लोगो के बीच भी खुद को अकेला महसूस कर रहा था | रीमा के जाने के तीसरे ही दिन सिरिश मुन्सिपलटी बोर्ड के ऑफिस मे रीमा का  मृत्यु  -प्रमाण पत्र लेने पहुँच गया | गोद मे कपिल को लिए वो सम्बन्धित अफसर से बोला 'सर मेरी पत्नी का मृत्यु -प्रमाण पत्र बना दीजिये |, पर वो अफसर कुछ नहीं बोला | सिरिष ने कई बार कहा पर वो जान -बूझ कर फ़ाइल् के पन्ने पलटता रहा |कपिल भी रोने लगा तो सिरिश ऑफिस की सीढियों मे बैठ गया | तभी वो अफसर उसके पास गया और बोला प्रमाण पत्र बनवाने के पांच सौ रुपया दे दो, कल आकर मृत्यु प्रमाण -पत्र ले जाना |, सिरिष को बहुत गुस्सा आया मेरी सत्ताईस साल की जवान बीवी मर गयी इसे रुपयों की पड़ी है | अपने गुस्से को काबू करके उसने रुपया दे दिया | उसे समझ आ गया ऑफिस मे सी.सी.टीवी कैमरा लगा था इसलिए वहां पैसा नहीं लिया| रिश्वत लेने के मामले मे सावधान जो है |
                दुसरे दिन सिरिष ऑफिस गया तो सीट पर दूसरा  अफसर  बैठा था | सिरिष ने उनसे मृत्यु -प्रमाण पत्र माँगा, उसने दो मिनिट मे बना कर दे दिया | अरे ! 'ये क्या आपने बिना रिश्वत लिए ही बना दिया ?, सिरिष ने कहा | कल उस अफसर ने पांच सौ रूपया लिया है मुझसे | 'मै कभी किसी से एक पैसा नहीं लेता हूँ | आपका कोई भी काम हो आप आना मै करूँगा आपका काम|, दुसरे अफसर  ने कहा |सिरिष ने उस रिश्वत खोर  अफसर  को सबक सिखाने का मन बना लिया और  उन इमानदार ऑफिसर के साथ मिलकर उस रिश्वत खोर  अफसर को रंगे हाथो पकड़वाया | किसी ने सच ही कहा है कि एक व्यक्ति की गलती के कारण  पूरा विभाग बदनाम हो जाता है
शांति पुरोहित 

Saturday, 26 October 2013

ममता एक माँ की

                                                                                                                                                                                                               क्या ममता ने इसलिए दूसरी शादी की थी ?
कि जिन लोगो के लिए उसने अपना सारा जीवन लगा दिया वो ही लोग उसे इस तरह ठेस पहुँचायेगे ,और वो भी तब जब घर मे इतना अहम् और ख़ुशी का माहोल हो, और बहुत सारे लोग मौजूद हो| और कोई नहीं उसका पति एसी दिल तोड़ने वाली बात करेगा ऐसा होगा कभी नहीं सोचा था |लोग ये तो जानते है की स्त्री सहनशील होती है ,पर ये शायद नहीं जानते कि सहन करने की भी एक सीमा तो होती ही है | स्त्री कोई भी हो छोटी -मोटी बात की तो परवाह नहीं करती पर बात अगर उसके स्वाभिमान की होती है तो चुप नहीं रहती और स्वाभिमान की रक्षा के लिए कुछ भी कर सकती है |
                      मेरी कहानी की नायिका ममता एक ऐसे पिता की बेटी है जो मजदूरी करके अपनी बेटी को को शिक्षा दिलवा रहा है | और उसकी हर ख्वाहिश को पूरी करने की पुरजोर कोशिश करता था | पिता को मजदूरी करते इस बात का एहसास हो गया कि बिना शिक्षा इंसान को जीवन मे बहुत सारी कठिनाइयो का सामना करना पड़ता है | और अभाव मे जीना रोज एक मौत मरना जैसे है |उस वक्त ममता का आखिरी साल था फीस भरने की तारीख नजदीक आ रही थी पैसो का इंतजाम नहीं हो रहा तो ममता के पिता रामसिंह ने तब अपने  खेत को गिरवी रखा और ममता के कोलेज की फीस भरी | उस वक्त लाखो के खेत को हजारो मे गिरवी रखना पड़ा था | समय बीतता गया चार साल बाद ममता की पढाई पूरी हुई अब ममता बी .ऐ.बी.एड थी |
                        ममता ने अभी नौकरी करने का सोचा ही था की मम्मी -पापा ने अपना फैसला सुना दिया कि अब हम तुम्हारी शादी करना चाहते है और लड़का भी देख लिया है तुम भी चाहो तो देख सकती हो | लड़के के माता -पिता दोनों नौकरी करते थे और लड़का तुषार जिसने अभी -अभी इंजीनियरिग की पढाई पूरी की और एक बड़ी कम्पनी मे नौकरी लग गया था | बहुत ही नेक और संपन परिवार था | ममता ने कहा ''माता पिता अपने बच्चो के लिए अच्छा ही करते है मुझे मंजूर है जो लड़का आपने मेरे लिए देखा अच्छा ही होगा | और ममता की शादी तुषार संग हो गयी |
                     ममता का ससुराल मे सास ने बहुत स्वागत किया और सर आँखों पर बिठाया शादी के चार दिन बाद जब ममता सास के लिए चाय लेकर गयी तो सास ने ढेरो आशीष के साथ एक लिफाफा ममता के हाथ पर रखा और कहा ''ये तुम दोनों के लिए सिंगापुर जाने की टिकिट है कल निकलना है जाओ तैयारी करो | ममता को बहुत ख़ुशी हो रही थी कि सास उसे कितना प्यार करती है किते अच्छे से संभालती है सास का शुक्रिया कर के ममता जाने की तयारी मे लग गयी थी | ममता ने अपने व्यवहार से सबका दिल जित लिया समय तो चलता रही रहता है |
दो साल बाद
ममता ने घर मे बच्चे के आने की खबर सुनाई सब बहुत खुश हए पर सास लीला तो बहुत ही खुश हुई क्योंकि वो तो कब से ही इस बड़ी ख़ुशी का इंतजार कर रही थी | उसने ममता को गले लगा कर माँ बनने की और बेटे नितिन को बाप बनने की बधाई दी अब तो सास लीला ममता का खूब ख्याल रखने लगी ममता को पंलग से नीचे पैर ही नहीं रखने देती थी | लीला बेसब्री से बच्चे का इंतजार करने लगी थी | सब अच्छे से चल रहा था कि एक दिन तुषार ने माँ को कहा कि'' कल मुझे ऑफिस टूर से दिल्ली जाना है सोच रहा हूँ ममता को ले जाऊ काम ख़त्म करके थोडा हम दोनों घूम लेंगे,ममता की सास ने कहा जाओ पर समय पर खाना,नाश्ता और सोने का ध्यान रखना ,ज्यादा चलना मत बहुत सारी हिदायतों के साथ जाने की इज़ाज़त दे दी |
                      अभी कुछ रास्ता ही तय किया था कि तुषार की कार दुर्घटनाग्रस्त हो गयी जिसमे तुषार की मौत हो गयी और ममता घायल हुई | डॉ. को ममता का अर्जेंट ओपरेशन करना पड़ा क्योंकि ममता के गर्भाशय मे चोट लगने के कारण संक्रमण हो गया था | और गर्भाशय को तुरंत निकालना पड़ा | अब इसे समय का फेर ही कहेंगे की कितनी खुश थी ममता और अब पलक झपकते  ही उसका सुखी संसार उजड़ गया था | लीला बहुत दुखी हुई उस पर तो जैसे दुखो का पहाड़ ही टूट पड़ा, पर फिर भी उसने अपने आपको संभाला और ममता की देख भाल करने लगी | होश आने पर ममता ने अपने आपको अस्पताल मे पाया तो कुछ ही देर बाद उसको समझ आ गया कि उसका सब कुछ लुट गया वो रोने लगी सास ने ममता को सम्भाला |
                           अहिस्ता -अहिस्ता समय का मरहम हर घाव को भरता है जीने के लिए इंसान को अपने मन को कुछ तो तसल्ली देनी ही पड़ती है अब ममता वापस अपने पिता के घर आ गयी और शिक्षिका की नौकरी कर ली |
तीन साल बाद
अब ममता ने स्कूल मे बच्चो के साथ अपना मन लगा लिया था| और बच्चे भी अपनी ममता मैडम से बहुत प्यार करने लगे थे | स्कूल मे ममता के बिना बच्चो का मन ही नहीं लगता था | स्कूल के प्रिंसिपल भी खुश थे कि बच्चे पढाई मे रूचि ले रहे है सब अच्छे से चल रहा था कि एक दिन पडौस मे रहने वाले रामकिशन की पत्नी का अचानक दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया | अब चार बच्चो को सम्भालना रामकिशन जी के बस की बात नहीं थी | उन्होंने दूसरी शादी करने का फैसला किया |कितनी ही जगह रिश्ते की बात की पर उनकी शर्त के कारण कोई भी औरत ने हां नहीं की शर्त ये थी कि रामकिशन जी दुसरी शादी से बच्चा नहीं पैदा करेंगे |
                 ममता के तो अब ग्रभाशय ही नहीं था तो बच्चा होने वाला ही नहीं था ये बात ममता के पिता को पता चली तो उन्होंने ये बात घर मे सब के सामने रखी तो सब ने कहा ममता  रामकिशन से बहुत छोटी है और वो चार बच्चो का पिता था | ममता का मन भी अब दूसरी शादी करने का बिल्कुल भी नहीं था |वो सोचने लगी कि ये दूसरी शादी किसलिए ? पिता के घर मे बेटी का रहना आज भी बोझ समझा जाता है,या इसलिए कि रामकिशन जी के चार बच्चो को सम्भाल सकू |और बिना पैदा किये सीधा चार बच्चो की माँ बनू तो क्या बुरा है कुछ तय नहीं कर सकी थी | अगर ममता अपने पिता के घर मे रहकर जीवन काटे तो इसमें क्या बुराई थी |अब तो वो उसने स्कूल मे नौकरी भी कर ली थी |पर उसके माता -पिता का ये सोचना था कि बेटी का अपना एक ठिकाना होना चाहिये| ये कैसी सोच थी समाज वालो की उसे समझ नहीं आ रहा था, कि क्यों एक विधवा अकेले अपना जीवन नहीं बिता सकती ? और फिर ठिकाने के लिए क्या ये चार बच्चो का बाप ही मिला था | रामकिशन फिर ममता के हां- ना की परवाह किसे थी | सिर्फ हाँ बोलना था |और शादी हो गयी |
                           अब तीस साल की ममता चार बच्चो की माँ बन गयी | जीवन का रुख ही बदल गया |जो किस्मत मे था हुआ उसने भी चुप -चाप स्वीकार किया और लगी नई गृहस्थी सम्भालने शादी होने के बाद कभी उसके माता -पिता ने ये नहीं पूछा की पति और बच्चो के साथ उसका रिश्ता कैसा है |बस वो तो खुश थे कि उनकी बेटी के ठिकाना हो गया है |दिन, महीने , साल बित्तते गये पर चार बच्चो को संभालना वो भी सौतेले बड़ा कठिन काम था | सौतेली माँ के प्रति बच्चो के मन मे ये बात भर दी जाती है ,कि वो सौतेले बच्चो को प्यार नहीं कर सकती बल्कि मारती है|पर लोग ये नहीं समझते कि माँ तो माँ होती है चाहे वो सौतेली हो या खुद, की माँ के दिल मे बच्चो के लिए केवल और केवल प्यार रहता है| वात्सल्य और ममत्व का भाव रहता है माँ ही उनको आगे बढ़ने मे उनके लिए दिशा निर्धारित करने मे उनकी मदद करती है |
                     यहाँ रामकिशन के बच्चो के दिल मे भी सौतेली माँ के खिलाफ जहर भर दिया गया था| बच्चे ममता के पास भी नहीं फटकते थे| पर ममता ने धीरे -धीरे उन्हें प्यार से उनकी सोच बदल दी अब वो अपनी ममता माँ की हर बात मानने लगे अपनी माँ को अब याद नहीं करते और ममता माँ के पास ही रहते थे समय बीतता रहा अब बच्चे बड़े हो गये पढ़ -लिख लिए | बड़े बेटे नितिन की तो नौकरी भी लग गयी |नितिन की शादी का मौका था |बेटे की शादी के लिए ममता ने बहुत सारी तैयारी की पर उसने जो चाहा वो तो नहीं हुआ रामकिशन ने शादी के मांगलिक काम अपने छोटे भाई -भाभी को करने को कहा क्योंकि उनकी नजरो मे वो अब भी विधवा थी |इतने साल उनके साथ उनकी पत्नी बने रहने के बाद भी ममता के उपर से विधवा का ठप्पा नहीं हटा ये उनकी ओछी सोच थी |तो क्या रामकिशन उसे अपने बच्चो की आया समझता था ये उसकी समझ से परे था?|
                          ममता कुछ नहीं बोली चुप -चाप सहन कर लिया शादी हुई बहु भी समझदार थी और सास भी समझदार तो दोनों मे खूब पटने लगी | माँ बेटी का रिश्ता हो गया दोनों मे |बहु ने सास को आते ही कह दिया कि अब आप आराम करो बाकि सब मे सम्भालती हूँ |आप तो मुझे आदेश करो अब आप और पापा अपने लिए जिओ | बहु का प्रेम देख ममता रोने लगी | दो साल बाद ममता की बहु ने बच्चा आने की खबर सुनाई सब खुश थे | सातवा माह था बहु की गोद भराई की रश्म थी आज जैसे ही ममता ने सगुन लेकर बहु के पास जाने को कदम बढाया तभी बहु के मायके वालो मे से किसी ने कहा की आपकी कभी गोद भरी नहीं तो आप रहने दो ममता ये सहन ना कर सकी और कमरे मे जाकर रोने लगी रामकिशन ये सब देख सुन रहे थे पर शादी के वक्त भी कहाँ साथ दिया जो अब देंगे | पर ममता की बहु ने भी कह दिया कि ''मेरी गोद अगर मेरी सास नहीं भर सकती तो मुझे ये सब करना ही नहीं है, मै ऐसे ही ठीक हूँ | नितिन ने भी कहा कि कौन कहता है ममता माँ माँ नहीं है वो तो चार बच्चो की माँ है ये ना होती तो हम आज किसी बुरी सगत मे पड गये होते | ममता माँ ये सब सुन कर खुश हुई| चलो अब गोद भराई शुरू करो हम और हमारे बच्चे को आपके आशीर्वाद की जरुरत है और ममता ने सोचा कि कैसे कहू इनको सौतेले ये बच्चे तो खुद के बच्चो से भी ज्यादा प्यार करते है मुझे और ममता ने अपने पति की और देखा जैसे कह रही हो कि आप से तो आपके बच्चे अच्छे है कितना सम्मान किया है |
                     शांति पुरोहित
                                  

फिर हुई मुलाकात

                                                                                                                                                                      'क्या वक्त आया है,रिटायर जिला-शिक्षा अधिकारी को अब टीचर नहीं पहचानता है | मैडम शर्मा ने ये मैडम माथुर को नहीं कहा,पर मन ही मन सोच रही है |'जब वो कैमेस्ट्री की टीचर माथुर के पास अपनी पोती रश्मि को टयूसन पढ़ाने की बात करने को गयी |'
                               'क्या आप अपने तीन ग्रुप मे एक और, लड़की को नहीं पढ़ा सकती,ये तो बड़ी हैरानी की बात है|...आपसे इस जवाब की अपेक्षा कतई नहीं थी |'मैडम शर्मा ने कहा |
                                 'अब आपसे क्या कहूँ मैडम ,टाइम होता तो आपको निराश नहीं करती | स्कूल से आने के बाद घर की,बच्चो की जिम्मेदारी,पूरी करने के बाद ये तीन ग्रुप को मुश्किल से पढ़ा पाती हूँ | और, एक लड़की की जिम्मेदारी नहीं ले सकती |'मैडम माथुर ने अपनी सफाई दे दी और चुप होगयी |
                                     'आपका कहना अपनी जगह पर बिलकुल सही है,पर मै भी, अपनी विवशता के कारण आपके पास आई| मेरी अब वृद्धा अवस्था है |.....रोग ने जकड़ लिया है | कुछ समय पहले दिल का दौरा पढ़ा तो डॉ. ने आराम करने को बोल दिया | नहीं तो मै आपको तकलीफ देने नहीं आती |' खैर,जाने दो टाइम-टाइम की बात है,मेरी जगह अभी आपका कोई परिचित होता तो ,टाइम का बहाना बना कर टाल देती आप ?
                                   थैंक्स टॉक टू मी,और वर्दधा अपनी पोती का हाथ पकड कर धीरे-धीरे कमरे से बाहर आ गयी |
                                    लम्बा-गोरा,पतला शरीर ,चौड़ा ललाट,चेहरे पर गजब का तेज,मैडम शर्मा अपनी पोती के साथ आकर गाड़ी मे बैठ कर चली गयी |
                                      घर आकर थकान के कारण पलंग पर तकिये के सहारे लेट गयी | विचारो की श्रंखला शुरू हो गयी |अपने ज़माने की मशहूर कैमेस्ट्री की टीचर,मिस शाह ने बी. एस. सी. किया ऍम.एस. सी.किया | पिता की आर्थिक हालत ठीक नहीं होने से जल्दी ही सरकारी टीचर की नौकरी करनी पड़ी | सपना तो कॉलेज लेक्चरर बनने का था | पर अगर कोई किसी चीज को पाने की ठान ले तो पाकर रहता है | मिस शाह ने कड़ी मेहनत करके ''लोक सेवा आयोग'' से फर्स्ट ग्रेड परीक्षा पास करी और स्कूल लेक्चरर बन गयी |
                            स्कूल मे एक-एक लड़की को कैमेस्ट्री समझाती और सवालों का हल करती थी | दिन भर वो अपने घर मे भी लडकियों को पढने को बुलाती थी | जो लडकिया पढने मे कमजोर होती उन पर तो विशेष ध्यान देती | लडकिया भी निसंकोच मैडम के घर पढने के लिए जाती थी | किसी से कोई पैसा नहीं लेती | विधा-दान करना ठीक समझती,बजाय विधा को बेचने |
                              उन्ही दिनों उसके लिए लड़के की तलाश भी होने लगी | वो अभी शादी नहीं करना चाहती थी ,पर माता-पिता के आग्रह को टाल भी नहीं सकती थी | और वन-विभाग के फारेस्ट-अधिकारी मिस्टर शर्मा के साथ उसकी शादी हो गयी |अब वो मिस शाह से मिसेज शर्मा बन गयी |
                               जहाँ भी जिस भी स्कूल मे उसकी पोस्टिंग हुई,वहां लडकियों की सबसे अच्छी टीचर बन कर रही | बड़ी कुशलता के साथ पढ़ाती थी | अपनी मेहनत के कारण उसने खूब नाम कमाया |अब वो सीनियर स्कूल की प्रिंसिपल है | हर साल उसके स्कूल की लडकियों ने राज्य मे पोजीशन हासिल करी| साथ ही स्कूल की अन्य गतिविधियों मे भी लडकियों ने अपना और स्कूल का नाम रौशन किया | अंत मे मैडम शर्मा प्रमोशन लेते-लेते जिला-शिक्षा अधिकारी की पोस्ट से रिटायर हुई |
                          अब ढलती उम्र मे अपने परिवार के साथ सुख-चैन का जीवन अपने अपनों के साथ बसर कर रही है | एक पुत्र- और एक पुत्री,पति बस यही उनका परिवार;पुत्री अपने ससुराल और पुत्र अपने परिवार के साथ ही रहता है | एक पौत्र-पौत्री है जो इनकी आँखों के तारे,इनके जीने का सुखद अहसास भी है | पुत्र अकाउंटेंट है| पुत्र-वधु कुशल गृहणी के साथ एक अच्छी बहु,पत्नी और माँ है |
                         पौत्री रश्मि अपनी दादी से ही पढना चाहती थी | अपनी तकलीफ के कारण अभी नहीं पढ़ा सकती इसलिए उसकी स्कूल की टीचर के पास बात करने गयी | पर सब बेकार ! रश्मि ने कहा 'आप कब तक ठीक होगी?' 'क्या बताऊ , बेटा डॉ . ने और, एक महिना आराम करने को कहा है | तब तक तुम रुक जाओ फिर मै सारा कोर्स करवा दूंगी |' मिसेज शर्मा ने कहा | ' पलंग पर लेटी है मिसेज शर्मा, और सोच रही है कि मैंने पहले ही कहा था बेटे से कि अब रिटायर होने के बाद कौन पहचानेगा मुझे ! विचारो की श्रंखला उसे अतीत की यादो मे ले गयी |
                                पापा के पास कितने सारे लड़के-लडकिया दिन भर आते रहते थे | कभी किसी को नहीं निराश नहीं किया सबको गणित सीखने मे उनकी भरपुर मदद करते थे | गणित पर उनका बहुत कंट्रोल था | बहुत सारे पढने वाले बच्चो को गणित मे निपुण किया था | बिना कोई पैसा लिए |
                              माँ बहुत नेक दिल और धरम-परायण थी | पति से उनको कभी कोई शिकायत नहीं रही ,जो कुछ पति ने लाकर दिया,उसी मे संतोष के साथ अपना गुजरा किया | ये सब सोचते-सोचते कब उसकी आँख लग गयी पता ही नहीं चला | उठी तब तक शाम हो गयी थी |
                               मिसेज शर्मा मिसेज माथुर की माँ की कॉलेज टाइम की दोस्त थी ,जब मिसेज शर्मा उनके घर से निकल रही थी,तो उन्होंने बात करनी चाही ,पर तब तक मिसेज शर्मा निकल गयी थी | 'बेटा मिसेज शर्मा जो तुम्हारी गुरु भी है, आज इनके आने से तुम्हे गुरु सेवा करने का मौका मिला | तुम बहुत भाग्यशाली हो |' 'वो अपनी पोती के लिए टयूसन की बात करने आई,मैंने तो पहचाना नहीं और मना भी कर दिया |'कहा मैडम माथुर ने | और अब मुझे उनके घर जाकर माफ़ी मंगनी होगी |' 'माफ़ी तो तुझे माँगनी पड़ेगी,जब तुम उनकी स्टूडेंट थी ,तो कितनी मेहनत की,कि तुम्हे अच्छी पोजीशन मिले ! अब जब तुम्हे अपना फर्ज अदा करने का अवसर मिला तो तुमने उन्हें पहचाना तक नहीं |'
                              मैडम माथुर शाम होने का बेसब्री से इन्तजार करने लगी | ठीक छ बजे वो मैडम शर्मा के घर पहुँच गयी | डोर बेल बजने पर नौकर ने दरवाजा खोला 'कहिये किससे मिलना है|'मैडम से , वो उसे मैडम के कमरे मे ले गया | मैडम माथुर अपनी गुरु के पैरो मे गिर कर माफ़ी मांगने लगी | अरे ! आप , माफ़ी क्यों मांग रही है,आपने पढाने से इंकार करके कोई गुनाह नहीं किया ,मै समझ सकती हूँ वक्त की कमी के कारण ऐसा किया है आपने ,मुझे बिलकुल बुरा नहीं लगा | बल्कि अच्छा लगा कि आपने पता चलते ही अपनी गलती मान कर माफ़ी मांगने मेरे पास आयी,
                             'आपने मेरी कितनी मदद करी कि,मै कैमेस्ट्री मे विशेष योग्यता हासिल कर सकू,आज मै जो कुछ हूँ,आपके कारण हूँ | 'आप अपनी रश्मि को अपनी इस शिष्या के पास पढने को जरुर भेजना | तभी मै समझूंगी कि,आपने मुझे माफ़ कर दिया है | जो पहले कहा उसे भूल समझ कर माफ़ करना | 'इसमें माफ़ी मांगने जैसी कोई बात नहीं है | पर एक बात आपसे कहना चाहती हूँ |' 'जी , कहिये , मै चाहती हूँ कि आप हर साल कम-से-कम दस लडकियों को निशुल्क पढाये | जो पैसा भर नहीं सकती | मैंने पता लगाया है कि आपके पास जितनी लड़कियां आती है ,उनमे से कुछेक को छोड़ कर बाकी सब माध्यम परिवारों से है | आप खुद
सोचिये,कितनी मुश्किल से उनके माँ-बाप पैसो का इंतजाम करते होंगे |'
                       'ठीक है मैडम, अगले साल से दस लडकियाँ बिना पैसो के पढाऊगी ,और ये आपको मेरी गुरु दक्षिणा होगी | आप अपनी पौत्री को कल से जरुर भेजना, और हां आप से मै पैसा नहीं लुंगी |
                       ''अब ये सब छोड़ो चाय-नाश्ता करो,जब से आयी हो माफ़ी मांग रही हो | तुम अपनी गुरु के घर पहली बार आयी हो ,मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है | 'तुम्हे याद है,तुम मेरी सबसे चहेती छात्रा थी | पर तुम्हे कैमेस्ट्री मे रूचि कम थी,मेरे कहने से ही तुमने लिया था,और खूब मेहनत करके विशेष योग्यता भी हासिल करी |' तब तक रश्मि के पापा -मम्मी भी आ गये थे | सब ने मिलकर चाय-नाश्ता किया , थोड़ी देर मैडम शर्मा ने मैडम माथुर से बाते की,इतने सालो बाद मिलकर दोनों बहुत खुश थी | बहुत ही खुशनुमा माहौल से दोनों की मुलाकात खत्म हुई |
              शांति पुरोहित
                             

ये कैसी श्रद्धा

               ये कैसी श्रद्धा                                                                                                                                                                       प्रकाश के पिताजी ने अपने जीवन मे ये प्रत्यक्ष अनुभव किया है, कि जब हम पशु-पक्षी को रोज दाना डालते है ,रोटी खिलाते है तो ; वे रोज हमारा उस वक्त इंतजार करते है | गाय की पीठ पर रोज दस मिनिट हाथ फिराने से मनुष्य के शरीर मे रक्त संचार कम- ज्यादा नहीं रहता है | गाय को रोज नियमित समय पर रोटी खिलाने से अकाल मौत टल जाती है |
                     प्रकाश के पिता इस काम को नियमित रूप से करते, चाहे कितना ही जरुरी काम क्यों ना हो | यही संस्कार उन्होंने अपने बेटे प्रकाश को दिए | जब प्रकाश पांच साल का तब से पिता जी के साथ पशु-पक्षियों को दाना डालने,उनको रोटी खिलाने जाने लगा था |
                     प्रकाश के पिताजी का मानना था कि इनकी सेवा के साथ-साथ अपने आस-पास कोई दुखी है, तो उनकी सेवा करना इंसान का प्रथम कर्तव्य होना चाहिये |
                     प्रकाश अपने पिता के दिए इन्ही संस्कारो के साथ बड़ा हुआ है | प्रकाश बैंक मे प्रबंधक के पद पर काम करता है ;पर उसने गाय,कुत्ते ,बिल्ली और पक्षियों की सेवा करना नहीं छोड़ा है|
                      प्रकाश की पत्नी स्कूल मे टीचर है ;पर अपने पति के इस नेक काम मे वो भी साथ देती है | पर उसके मन मे हमेशा एक सवाल आता है, कि इंसान को पशु पक्षियों की सेवा से ज्यादा गरीब और लाचार इंसानों की सेवा करनी चाहिए  पर प्रकाश का कहना है ''भगवान ने इंसान को हाथ-पैर दिए है वो कमा कर खा सकता है \| प्रकाश ने इस काम के लिए एक काम वाली बाई  रखी है जो सुबह-शाम रोटियाँ बनाती है | सौ रोटी सुबह और उतनी ही शाम को चाहिए थी | प्रकाश और शीला दोनों शाम को ये सारी रोटिय अपने हाथो से जानवरों को खिला कर आते है |      
                                                                                        ये उनका का रोज का काम था| वैसे तो प्रकाश खुद आर्थिक रूप से सक्षम था| पैसे की उसके पास मे कोई कमी नहीं, पर कोई अपनी इच्छा से सेवा के लिए कुछ
देना चाहता तो ;वो मना नहीं करता था |
                       
                   आज बारिश बहुत तेज हो रही थी ;ऐसा लग रहा है जैसे सारा शहर पानी मे डूबा हुआ है | प्रकाश की पत्नी शीला सोच रही है कि आज काम वाली बाई आएगी कि नहीं | और आएगी भी तो कैसे ! बारिश तो थमने का नाम ही नहीं ले रही थी | सब अपने घरो मे बैठे बारिश के थमने का इंतजार कर रहे थे |
                    प्रकाश और शीला भी बारिश के थमने का इंतजार कर रहे है | प्रकश का मन आज दुखी हो रहा है क्योंकि आज गाय,कुत्ते बिल्ली और सारे पक्षी भूखे बैठे उसका इंतजार कर रहे होंगे | कभी ऐसा नहीं हुआ  पर प्रक्रति के आगे आज वो मजबूर है |
                             शीला ने देखा कि इतनी बारिश मे कामवाली बाई आई है | पर प्रकाश ने आज रोटी बनवाने से इंकार कर दिया, कहा की ''आज रहने दो  मत बनाना बारिश मे कैसे जा सकूंगा |''
                             शीला ने देखा कामवाली बाई कुछ परेशान लग रही है | आज तो रोटी बनाने के काम से आजादी मिली है, फिर भी दुखी क्यों है? ''क्यों क्या हुआ ? पूछा शीला ने | तब कामवाली बाई ने कहा ''साब ने तो रोटी बनाने को मना कर दिया तो मुझे लगता है की आज मेरे बच्चे क्या खायेंगे शायद भूखा ही सोना पड़ेगा? '' शीला ने कामवाली बाई को कहा हुआ था की तुम अपने बच्चो के लिए भी रोटी बना कर ले जाया करो |प्रकाश को शीला ने इस बारे मे बताया नहीं था |
                                   कामवाली बाई, का पति बीमारी से जुज रहा था | और ये घरो मे काम कर के थोडा बहुत कमा लेती है तो शीला ने सोचा रोटी यहाँ से ले जायेगी तो इसको काफी मदद होगी | शीला ने कामवाली बाई को पचास रूपया दिया और कहा ''अपने बच्चो के लिए कुछ ले जाना | कामवाली बाई ने शीला को ढेरों आशीष दिया |और कहा कि आपके कारण मेरे बच्चे आज भी खाना खाकर सोयेगे | आपके दिल मे हम गरीबो के लिए कितनी दया है आपको ऊपर वाला खुश रखे और वो अपने घर चली गयी |  
शांति पुरोहित     

पछतावा

पछतावा
पति कि असामयिक मौत के बाद देवयानी के जीने का एक मात्र सहारा उसकी बेटी ही थी;जो अभी एक साल की थी | अपने ही पति कि मौत का इल्जाम देवयानी के सर पर लगा कर सास -ससुर ने तो उससे रिश्ता ही तोड़ लिया | उसे ''भाग्यहीन, कह कर घर से निकल जाने को कह दिया |
                               देवयानी के सामने अपनी नन्ही बेटी नीलू के भरण पोषण का सवाल खड़ा था | मेहनत मजदूरी करने के आलावा देवयानी के सामने और कोई रास्ता ही नहीं बचा था | पढ़ी-लिखी जो नहीं थी | माँ-बेटी दोनों एक दूसरे का सहारा थी | नीलू पढ़ -लिख कर कुछ बन जाये,देवयानी ने इसे अपने जीने का उद्देश्य बना लिया | भविष्य में कुछ भी अनचाहा घट जाये तो उससे निपटने के लिए खुद को सक्षम होना ही चाहिये |
                              दिन,महीने, साल बीतते गये,नीलू ने सीनियर दूसरी पोजीशन के साथ उतीर्ण करी | नीलू ''इंटरनेशनल लॉ '' करना चाहती थी;इसके लिए नीलू ने ''प्रवेश परीक्षा'' भी उतीर्ण कर ली थी | ''पुणे इंटरनेशनल लॉ '' कॉलेज मे उसका चयन हो गया | माँ-बेटी दोनों खुश थी | नीलू कॉलेज जाने के लिए सुबह सात बजे निकलती और घर पहुंचते-पहुँचते उसे रात हो जाती |
                                देवयानी रोज गुस्सा करती,''सुबह सात बजे से रात की आठ बजे तक कौनसा कॉलेज खुला रहता है?,आधुनिक विचारो वाली बेटी, माँ को ये कह कर, चुप करा देती की माँ ,'तुम तो मुंबई आकर भी देहाती ही रही;कुछ भी तो नहीं बदली|,आहत हुई देवयानी सिर्फ इतना ही कहती ''मैंने तुमसे ज्यादा दुनिया देखी है |'
                                'माँ गाँव मे दस साल रहना, और मुंबई मे एक साल तक रहना बरोबर है |,कहा नीलू ने | 'तुम तो यहाँ भी वो ही तेहती कपडे पहनती हो;वो ही देहाती बोली बोलती हो| सच कहूँ ,तो मुझे मेरे दोस्तों को घर लाने मे शर्म आती है | ये सब सुन कर देवयानी को दुःख होता;पर क्या करे ! बेटी कुछ ज्यादा ही समझदार हो गयी,मुंबई मे जो पढने लगी है | मुंबई कि हवा ने नीलू को पूरा ही बदल दिया था |
                                 अब नीलू कि पढाई का आखिरी साल बचा था | रिश्ते भी आने शुरू हो गये थे ;पर नीलू इंकार कर दिया | देवयानी ने सोचा अगला साल पढने का आखिरी साल है तब हां बोल देगी | समय बीतता रहा |एक दिन नीलू जल्दी घर आगयी,चेहरा सूजा हुआ,आँखे रोई हुई थी | ''क्या हुआ बेटा कुछ हुआ क्या कॉलेज ,नहीं कुछ नहीं हुआ |,नीलू अपने कमरे मे और देवयानी अपने कमरे मे चली गयी |पर देवयानी का पूरा ध्यान बेटी पर लगा रहा |
                              नीलू को सुबह उठने के साथ वोमेटिग हुई | फिर फ्रेश हो कर माँ के साथ चाय पीने बैठी | देवयानी ने कहा ''यहाँ मुंबई शहर मे हर किसी से गलती हो जाती है तुमसे भी हुई है कल मेरे साथ अस्पताल चलना ,तुम्हे छुटकारा मिल जायेगा और देरी हो गयी तो जन्म दे देना | मै हर पल तुम्हारे साथ हूँ | जो हुआ उसको ले कर घबराना नहीं,मै अपना बच्चा,यानि तुम्हे नहीं खोना चाहती हूँ |
                                नीलू ने कहा ''माँ देहाती तुम नहीं मै हूँ | तुम तो कितनी समझदार हो ! नीलू माँ के गले लग कर बहुत देर तक रोई | अब तक जो कुछ माँ को कहा नीलू को पछतावा होने लगा | मै ,न तो देहाती हूँ ;ना समझदार हूँ ;मै तो बस एक माँ हूँ जोअपने बच्चे के चलने मात्र से जान जाती है की उसे क्या परेशानी है | नीलू माँ से लिपट कर रोने लगी थी |

                           


उतराखंड त्रासदी - धार्मिक अनुष्ठान तथा मानवीय संवेदनाये

           उतराखंड त्रासदी -धार्मिक अनुष्ठान तथा मानवीय संवेदनाये                                                                                                                                                          आज इकीसवी सदी का इंसान वापस आध्यात्मिकता की और जा रहा है| अपने भाग्य को और अच्छा बनाने के लिए मानव ,विभिन प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान करता है;और वो भी तीर्थ स्थान मे जाकर करता है| धारणा ये है कि,जो इन्सान तीर्थ स्थान पर जाकर धार्मिक अनुष्ठान करता है उसका भाग्य जयादा अच्छा रहता है|
                   भाग्य दो प्रकार के होते है|
                              १ - सौभाग्य
                              २ -दुर्भाग्य
          सौभाग्य- दुर्भाग्य का पता तो तभी चलता है,जब भाग्य अपना परिणाम दिखाता है| अभी इसी जून माह मे जो लोग अपने घर से चार धाम यात्रा -बद्रीनाथ,केदारनाथ,गंगोत्री और यमुनोत्री के लिए निकले,तो उस समय उन्हें अपने भाग्य पर गर्व हो रहा था| और जो किसी कारण वश नहीं जा सके वो लोग अपनी किस्मत को कोस रहे थे|
                        पर वहां पर जो त्रासदी हुई;उसके कारण तो भाग्य की परिभाषा ही बदल गयी| जो गये वो अपने आप को दुर्भाग्य शाली समझ रहे थे| जो नहीं गये सौभाग्य शाली मान कर खुश हो रहे थे|
                          देश के प्रति सजग मिडिया ने जब केदारनाथ मे हुई त्रासदी के समाचार और फोटो दिखाए तो आँखों से आंसू रोके नहीं रुक रहे थे| बस जैसे घर मे बैठ कर आंसुओ का सैलाब आ गया हो| कितने छोटे-छोटे बच्चे अनाथ हो गये; और कितनी माताओं के सामने उनके जिगर के टुकड़े उनके मासूम बच्चे पानी की तेज धार मे बह गये|
                         इतने छोटे बच्चो को तीर्थ मे ले जाने का क्या अर्थ है| तीर्थ मे तो वानप्रस्थ अवस्था मे आये लोगो को ही जाना चाहिए| जिन्होंने अपनी गृहस्थी की समस्त जिम्मेदारिया पूर्ण कर ली हो|
                         जो लोग त्रासदी के कहर से किसी तरह अपनी जान बचा कर आये है| वो आज भी पूरी नींद सो नहीं पा रहे है| उनकी आँखों के सामने वो ही खौफनाक मंजर घुम रहा है| आज भी बहती हुई लाशे दिखाई दे रही है|
                      सेना के जवानो ने बहुत मदद की है| उनकी जितनी तारीफ की जाये कम है| पर लोग इतने है कि किसको बचाये,किसको छोड़े| सेना के जवान औरतो,बच्चो और बुजुर्गो को निकाल कर सुरक्षित स्थान पर पहुंचा रहे है| अगर आदमी लोग वहां से बच कर नहीं आये तो,बच कर आने वाली औरतो,बच्चो की जिन्दगी अपने आदमियो के बिना बदतर हो जाएगी|
                      पर सोचने वाली बात है, कि इतनी बड़ी आपदा मे भी लोग सियासत करना नहीं छोड़ते है| -राजनेता -मिडिया वाले -बचे हुए दुकानदार और कुछ आर्मी वाले| इन सबके बारे मे जो बाते सुनी- सुनकर बहुत दुःख हुआ| कैसी अमानवीयता है, इन लोगो मे कि लाशो के ढेर पर भी अपनी रोटिया सेंक रहे है|
                    जब सोनिया गाँधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उतराखंड का हवाई दौरा किया तो सवाल उठा युवराज को विदेश मे ही रहने दो उनको यहाँ की तखलीफ़ से क्या मतलब है| मुझे ये समझ नहीं आ रहा है कि इतनी बड़ी आपदा के वक़्त भी लोगो का ध्यान इन बातो की और कैसे जाता है|
                     गुजरात के मुख्या मंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा 'गुजरात मे तखलीफ़ आयी तो मैंने एक दिन मे हजारो लोगो को बचया था| तो यहाँ वो किसके आमन्त्रण का इंतजार कर रहे है| उन्होंने त्रासदी से पीड़ित लोगो को बचाने के बजाय केदारनाथ के मंदिर को बनवाने का प्रस्ताव उतराखंड के मुख्या मंत्री के समक्ष रखा|
                अगर मिडिया वाले सजग नहीं होते तो हम कभी इतना सब कुछ नहीं देख पाते| वो बहुत कुछ दिखाते है| पर वो भी दो मिनिट की न्यूज़ दिखाते है विज्ञापन ज्यादा दिखाते थे| शायद न्यूज़ एजेंसिया भी इस वक़्त इस बारे सोचना भूल गये हो| पर लोगो को इससे मानसिक थकान और गुस्सा ज्यादा आता था|
                कोई एक भी ऐसा न्यूज़ चैनल नहीं है जो ये समझे की जो घर मे बैठ कर आँखे फाड़-फाड़ कर अपने अपनों की खबर पाने के लिए टीवी के सामने बैठे है| निरंतर उनकी आँखों से आंसू बह रहे है| पर नहीं कोई नहीं समझता उनकी पीड़ा|
                जो तीर्थ यात्री उस भयंकर त्रासदी से बच कर आये और उन्होंने बताया कि ऐसे समय भी कुछ लालची लोगो ने अपना लालच बरकरार रखा एक पानी की बोतल १०० रुपया मे और एक ५ रुपया वाला बिस्किट का पैकेट ५० रुपया मे देते हए उनकी रूह बिलकुल भी नहीं कांपी? सुनकर आत्मा सिहर जाती है कि क्या मानवीय संवेदनाये बिलकुल नहीं बची| मौत के ऐसे भयानक तांडव मे फंसे लोगो के साथ ऐसे कैसे कर सकते है| क्या उनमे मानवोचित भावनाए नहीं है| या वो जड़ थे| लोग क्यों इतना पाप करते है?
                   नेपालियों मे तो जैसे मानवीय संवेदना मर ही गयी| यात्रा मे फंसी परेशान औरतो को जंगलो मे ले जाकर उनकी इज्ज़त पर ही डाका डाल दिया| उनको ऐसे वक़्त मे भी भगवान का डर नहीं लगा| तो कभी ना कभी तो भगवान अपना प्रकोप दिखाते ही है| केदार नाथ का मंदिर वैज्ञानिक कारणों से बचा है पर लोगो ने इसमें भी अन्धश्र्धा फैलाई पर गौरी कुंड के गौरी मंदिर का महत्व कम तो नहीं है फिर वो क्यों नहीं बचा पूरा का पूरा पानी मे बह गया
                    एक छोटी सी बच्ची से जब मिडिया वालो ने बात की, तो उसने बताया कि ''मै और मेरा भाई परिजनों से आगे निकल गये थे| रस्ते मे देखा एक पांच साल का बच्चा पानी-पानी करता मर गया| वहां पर और भी बहुत सारे बुजुर्ग लोग फंसे हुए पानी-पानी कर रहे थे| पास ही कुछ सेवादार बैठे बतिया रहे  थे| बालिका ने छह किलोमीटर दूर झरने से पानी लाकर उन सब की जान बचाई| और समर्थ लोग बैठे रहे| '
                     दुकान वालो ने लागत से ज्यादा पैसा लेकर ऐसे समय मे पीड़ित लोगो को लुटा| क्या भगवान ऐसे लोगो को कभी माफ़ करेंगे ? शायद कभी नहीं| आने वाले दिनों मे क्या होने वाला है? पता नहीं| पर इन सब से सीखने वाला सबक येही है कि जियो तो ऐसे जियो कि अपने अपनों की वेदना को संवेदना बना कर हर सम्भव उनकी मदद को तत्पर रहो| बाकि सब तो उपर वाले के हाथ है|
    शांति पुरोहित 

बाते बाल मन की ..



                      बाते बाल मन  की                                                                                                                                                           सरिता का सब कुछ खत्म हो चूका था,पूरी दुनिया जैसे उसके लिए वीरान  हो गयी थी | अब वो कुछ तय नहीं कर पा रही थी, कि उसका पति राम लाल तीन बच्चो को उसके भरोसे छोड़ कर गया है, वो कैसे उनको संभालेगी | वो पढ़ी -लिखी भी नहीं है | बस सरिता रोज रोती जरुर है |एक महीने पहले उसके पति रामलाल की लंबी बीमारी के बाद मौत हो गयी थी |
                     सरिता के पति, ने जो कुछ कमाया था, उसमे से सरिता जो बचत करके रखती थी,वो सब पति की बीमारी मे खर्च हो गये थे | वैसे भी राम लाल एक प्राइवेट कंपनी मे सहायक कर्मचारी ही था, बहुत कम वेतन मिलता था,इतने कम वेतन मे घर चलाना राम लाल के लिए एक चुनौती से कम नहीं था | पर राम लाल ने इस चुनौती से निपटने के लिये रिश्वत लेने का रास्ता अपना लिया | वो काम के लिए ऑफिस मे                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             आने वाले हर व्यक्ति से कुछ पैसे लेकर अपने बॉस से मिलवा देता था | ईमानदारी से कब किसका पेट भरा है, मंत्री से संतरी तक सब रिश्वत लेते है | तो वो किसलिए ईमानदारी दिखाए और क्यों दिखाए ?
                       पर सरिता को पति का रिश्वत लेना बिलकुल भी ठीक नहीं लगता था | सरिता अपने पति से रोज ही कहा करती थी, कि ईमानदारी की कमाई इंसान के जीवन मे खुशिया बिखेरती है और बेईमानी से कमाया गया धन इंसान को कभी चैन से जीने नहीं देता है | जिस रास्ते आता है उसी तरह जाने का भी रास्ता निकाल ही लेता है पर सरिता के पति ने सरिता की बात को कभी तव्वजो नहीं दी| पर आखिर वही हुआ रामलाल को कैंसर जैसी जान लेवा बिमारी हुई और उसके इलाज मे कमाया हुआ सारा पैसा खर्च हो गया |
                      सरिता के तीन बच्चे थे बड़ी बेटी,बड़ी क्या सिर्फ दस साल की थी निशा,और उससे छोटे दो भाई थे | जब भी होली आती सरिता के दोनों बेटे मिठाई के लिए रोते पर बेटी कभी नहीं रोती, और दीवाली आती तो नये कपडे और फटाको के लिए रोते | बच्चो को रोते देख सरिता भी रोने लगती,पर रोने से कब किस समस्या का हल हुआ है कुछ करना ही पड़ता है | सरिता ने आस-पास के घरो मे चार घंटे सुबह और चार घंटे शाम को सफाई का काम शुरू किया | गरीब के बच्चो के बचपन कहाँ होता है | जब माता -पिता मजदूरी करने जाते है और उनके बड़े बच्चे घर पर रह कर छोटे बच्चो को सम्भाले है | गरीब, के बच्चे पढना चाहे तो भी धन की कमी उन्हें कहाँ पढने देती है | निशा अपने पडौसियो के बच्चो को स्कूल जाते देखती थी, तो मन करता है वो भी पढने जाये पर कैसे ! दो छोटे भाइयो को कौन संभालेगा | निशा रोज स्कूल के पास जाकर खड़ी हो जाती थी,और ध्यान से बच्चो को पढ़ते हुए देखती थी | एक बार स्कूल के एक अध्यापक ने उसे कहा ''बेटा तुम स्कूल मे आकर पढ़ सकती हो,निशा ने कहा 'नहीं आ सकती  मेरी माँ कमाने जाती है, और मै घर मे रह कर भाई को संभालती हूँ | बच्ची की बाते सुन कर उन्होंने कुछ तय किया और दुसरे दिन जब निशा स्कूल के बाहर आयी तो उस अध्यापक ने उसे किताबे,कापी और पेन्सिल दी और कहा कि अब जाओ घर पर इनसे पढना,और कुछ समझ ना आये तो मुझसे पूछना | निशा बहुत खुश हुई थी |
                               अब निशा भाई को सभालने के साथ पढने भी लगी | पर भाइयो को हर होली,दीवाली पर मिठाई के लिए रोते देख कर उसने कुछ तय किया | और एक दिन जब सरिता काम करके घर आई तो देखा निशा घर पर न, तो माँ को फिक्र तो होगी ही ना | निशा एक मिठाई वाले की दुकान पर गयी और कहा ''मुझे कुछ काम दे दो?, मालिक ने कहा ''कितनी छोटी हो ? क्या काम करोगी ? पर उसने कहा 'कोई तो काम होगा जो मै कर सकूं ? मालिक ने कहा तुम्हे काम देकर मुझे जेल नहीं जाना है | बाल मजदूरी कराने वाले को जेल जाना पड़ता है| पर फिर कहा ठीक है, एक काम है तुम डिब्बो मे मिठाई भरने का काम करना लेकिन गोडावन मे बैठ कर के करना है |
                        निशा जब सब तय करके घर गयी तो माँ को अपना इंतजार करते पाया | माँ को बताया की तीस रूपया रोज का मिलेगा,सिर्फ दो घंटे डिब्बो मे मिठाई भरनी है | सुन कर माँ को लगा कि मेरी मासूम निशा जैसे सच मे बड़ी बहन बन गयी है सरिता की आँखों मे आंसू आ गये  थे |
                             साल भर काम किया अब दीवाली नजदीक आ रही थी | निशा का मिठाई भरने का काम बहुत बढ़ गया था | बहुत मन लगा कर काम किया ,और उसने सोचा था कि इस बार दीवाली पर ना भाई रोयेंगे और ना माँ रोयेंगी | मालिक एक डिब्बा मिठाई तो दे ही देगा | पर उस दिन दीवाली को जब निशा को मालिक ने सिर्फ काम करने के पैसे ही दिए मिठाई का एक डिब्बा नहीं दिया | निशा सोच मे पड़ गयी कि क्या करे | आखिर उसने सोचा पापा ने ठीक ही कहा था कि ईमानदारी से पेट नहीं भरता | निशा के बाल मन मे ये बात बचपन से ही उसके पापा ने भर दी थी जो कि गलत थी|और निशा एक मिठाई का डिब्बा मालिक की नजरो से बचा कर अपने घर ले आई थी |
                           सरिता ने पूछा तो कहा ''मालिक ने दिया है | भाई और माँ दोनों खुश थे| निशा यही तो चाहती थी| पर उसको माँ से झूठ बोलने का अफ़सोस भी हो रहा था | एक दिन सरिता बाहर से घर पर आई तो उसे निशा के बोलने की आवाज आ रही थी, पर उसने देखा उसके दोनों बेटे तो बाहर खेल रहे थे | फिर किसके साथ है निशा ? सरिता ने चुपके से घर के अन्दर झाँक कर देखा तो पता चला कि निशा भगवान के आगे हाथ जोड़ कर रो रही है और कह रही है कि ''मुझे माफ़ करना माँ, मैंने आपसे झूठ बोला मालिक ने नहीं दी मै चुरा कर लाई थी, मिठाई | मै, अपने भाइयो को और माँ को दुखी नहीं देख सकती थी | ये सब सुन कर सरिता ने अपनी मासूम बेटी को गले से लगाया और रोने लगी| पर उसे ख़ुशी भी हो रही थी, कि मेरी बेटी अपने पापा पर नहीं गयी है उसने अगर झूठ बोला तो उसका पश्चाताप भी कर रही है|
                                 शांति पुरोहित
                     

परिवर्तन

परिवर्तन                           शांति पुरोहित की कहानी
   प्रतीक का आज छ सालो बाद दुबई से अपने देश भारत आने का हुआ था | वहां जाकर तो जैसे वो बदल ही गया था | जब प्रतीक दुबई गया तब तो पूरा देहाती था,और अब लौटा है तो पूरा विदेशी बन कर | प्रतीक ने फाइनेंस मे ऍम.बी.ए.किया था | वहां जाकर उसे एक प्राइवेट कंपनी मे जॉब मिल गयी,पर वो मेहनत भी बहुत करता था तब जाकर उसने इतने पैसे कमाए है |
                                उसने वहां जाकर अपने घर पर जो पैसा भेजा उन पैसो से उसके पापा ने एक छोटी सी स्कूल खोल ली थी,जिसमे उसकी माँ और बहन पढ़ाती और पापा वस्थापक थे | अब उसके माँ -पापा और बहन सुख से अपना जीवन बसर कर रहे थे, और खुश थे | प्रतीकएयर बस मे बैठा सोच रहा है, कि उसका दुबई जाना कितने मुश्किल हालत मे हुआ था| कम्पनी से ऑफर लैटर एक माह पहले ही आ गया था पर वो जाने का तय ही नहीं कर पा रहा था,यहाँ तक प्रतीक ने एजेंट से अपना पासपोर्ट, वीसा और सब कागजी कार्यवाही पूरी करवा ली थी | बस हाँ भरने की देरी थी | दरअसल विदेश जाने मे प्रतीक को डर लग रहा था |
                                प्रतीक एयरपोर्ट पर उतर चूका था वहां से उसके गाँव पहुँचने का छ घंटे का रास्ता था | उसे गाड़ी मे बैठते ही सब पुरानी बाते याद आने लगी | प्रतीक जब जाने का तय नहीं कर पाया तो उसकी छोटी बहन ने कहा था कि''भाई तुम्हारे एक के जाने से तुम्हारी और हम तीनो की जिंदगी संवर जायेगी, बस पांच साल मेहनत कर लो, फिर हम सब साथ -साथ रहेंगे यहीं पर | और तब उसे अपनी बहन की बात सही लगी और प्रतीक का जाना तय हो गया |
                               उस वक़्त प्रतीक एयरपोर्ट की केन्टीन मे बैठा नाश्ता कर रहा था, पास ही की टेबल पर एक जानी पहचानी सूरत दिखाई दी,उसे लगा कि इसे कहीं देखा है,तभी उसे याद आया कि अरे ! ये तो हमारे ही गाँव का गुंडा है,जिसे सब सेठी भाई कहते है प्रतीक एक मिनिट के लिये उससे डर गया कि कंही ये उसे ही ना लुट ले | तभी उसे याद आया कि दुबई जाने की एक रात पहले गाँव मे हल्ला मचा था कि सेठी गुंडा गाँव के ही रामू चाचा की बेटी सरिता को भगा कर ले गया | रामू चाचा की गिनती धनाड्य लोगो मे होती थी | रामू चाचा के घर की सारे गहने भी गुम थे और सरिता भी गायब थी | उस वक्त प्रतीक इतना व्यस्त था वो सरिता के लिये कुछ नहीं कर पाया | लेकिन विदेश से उसने अपने पापा से कई बार पूछा कि सरिता का कुछ पता चला क्या ? और  वो सेठी कभी गाँव वापस आया क्या ?
                              प्रतीक को अब तक पक्का याद आ गया कि ये, वो ही गुंडा है | वो सोचने लगा कि इसने गहने ले कर सरिता को कंही बेच दिया होगा या छोड़ दिया होगा | सेठी से बात करने की हिम्मत जुटा कर वो उसके पास गया और कहा''आपका नाम सेठी,भाई है ना?,सेठी ने प्रतीक के सामने देखा | तभी उसके साथ बैठे दो व्यक्तियों ने कहा ''भैया , आपको कोई गल्तफहमी हो रही है ये सेठी नहीं असीम भाई है |, अब उस गुंडे से सच तो बुलवाना था,गाँव की बेटी के बारे मे पता जो लगाना था तो प्रतीक ने कहा''मै दो मिनिट आपसे अकेले मे बात कर सकता हूँ ? थोड़ी ना -नुकर के बाद वो बोला ''ठीक है चलो, वो दोनों एक टेबल के पास जाकर बैठ गये |
                         ''आप हमारे गाँव के सेठी भाई ही हो ना, जो सरिता को भगा कर ले गया और साथ मे घर के सारे गहने भी ले भागा ? वो सकपकाया कुछ नहीं बोला तो प्रतीक ने पुलिस का डर दिखाया अब'' मरता क्या ना करता, उसने कहा ''हां मै ही हूँ सेठी,प्रतीक ने झट से पूछा ''सरिता कहाँ है,उसने फिर कोई जवाब नहीं दिया मुझे लगता है आपने उसे  कंही बेच दिया होगा,प्रतीक ने कहा | ''नहीं आप चलो मेरे साथ|, वैसे तो प्रतीक को घर जाने की जल्दी थी पर गाँव की बेटी के बारे मे जानना भी जरुरी था तो चल दिया उसके साथ |
                              वो दोनों अब एक बस्ती मे एक घर के सामने थे,सेठी ने प्रतीक को कहा ''चलिए, प्रतीक ने घर के अन्दर देखा सरिता पलंग पर लेटी हुई थी,सरिता ने प्रतीक को नहीं पहचाना पर उसने पूछा 'तुम ठीक हो ना?, इस सेठी ने तुम्हे परेशांन तो नहीं किया ना ?, नहीं भैया बिलकुल नहीं,बल्कि इन्होंने ही मुझे संभाला है,मे दो साल से बीमार हूँ ,मेरा एक दो साल का बेटा भी है उसे भी ये ही सँभालते है | हम दोनों अपनी मर्जी से भागे थे | ये तो इनका नाम पहले से ही बदनाम था तो लोगो का शक इन पर जाना ही था | हम दोनों मे प्यार था और इन्होंने मुझे कहा था कि अगर मै इनसे शादी करती हूँ तो ये सारे बुरे काम छोड़ कर एक आम आदमी की तरह जियेगेt तो मैंने इनसे शादी करने का फैसला किया और हां भैया ,वो गहने भी इन्होंने नहीं चुराए मैंने ही साथ लिये थे, की कहीं खाने को नहीं मिलेगा तो ये गहने काम आयेगे | आज भी गहने मेरे पास पड़े है| इन्होंने हाथ भी नहीं लगाया कभी गहनों को ||
                    भैया इन्होंने सारे बुरे काम छोड़ भी दिए हम खुश है प्रतीक को ये सब सरिता के मुहं से सुन कर बहुत ख़ुशी हुई | वो सोचने लगा कि एक  स्त्री का प्यार पाकर इन्सान इतना बदल सकता है | अब उसने सरिता से पूछा कि तुम लोग कभी गाँव गये ''सरिता ने कहा नहीं भैया डर के मारे नहीं गये,प्रतीक ने कहा मेरे साथ चलो ,सरिता ने ना कहा पर प्रतीक जिद पकड़ कर बैठ गया तो जाना पड़ा |
                           अब सरिता और सेठी को गाँव मे देख कर गाँव वाले और सरिता के माँ -पापा प्रतीक पर  बहुत नाराज हुए पर जब प्रतीक ने सब कुछ बताया तो सब ने उन्हें माफ़ कर दिया |अब सरिता की माँ ने सेठी से कहा अब आप हमारे दामाद हो | सरिता को थोड़े दिन हमें सँभालने दो, आप अपने काम पर ध्यान दो जो सरिता की बीमारी के कारण बंद पड़ा है |
                  प्रतीक को ये देख कर ख़ुशी हो रही है, कि सरिता के माँ -पापा को आज कितने सालो बाद सुख मिला है | प्रतीक को अच्छा लग रहा था कि उसने गाँव मे आते ही अच्छा काम किया | ये सब जान कर उसके माँ -पापा और बहन भी खुश थे|
                     
                            शांति पुरोहित 

विदेश मे शादी के मायने

                   विदेश मे शादी के मायने                                                                                                                                                             आज सुबह ही दिव्या का फोन आया था , उसने अपनी सारी तखलीफ को भुला कर, अपनी जैसी मुसीबत मे फंसी हजारो  भारतीय लडकियों का विदेश मे जीवन बर्बाद ना हो ,उसके लिए वहां के स्थानीय लोगो के साथ मिलकर एक N. G. O. खोला है | आज रमा बहुत खुश है , बेटी ने वो काम कर के दिखाया है,जिसकी उसने तो कभी कल्पना ही न की थी |
      रमा अपनी छोटी सी ग्रहस्थी मे बहुत खुश थी | पति विकास और एक प्यारी सी बिटिया दिव्या ही उसका परिवार था  रमा का| विकास के साथ प्रेम-विवाह हुआ था , ससुराल वालो ने बेटे -बहु को अपनाने से इंकार कर दिया था | कारण, वो ही सदियों पुरानी 'जाति -धर्म' की मानसिकता थी | रमा ब्राह्मण परिवार से थी, और विकास जैन धर्म को मानने वाला था |
      कॉलेज मे साथ पढ़ते थे, दोनों मे पहले दोस्ती हुई फिर प्रेम के बीज का अंकुरण हुआ,पल्वित हुआ और रमा और विकास ने घर वालो की रजामंदी के बिना ही शादी कर ली थी | दोनों को अपनी नहीं गृहस्थी बसाने मे ज्यादा परेशानी नहीं हुई, विकास एक बड़ी कंपनी मे मैनेजेर के पद पर कार्य करता था | पगार अच्छी थी | कभी किसी चीज की कोई कमी नहीं हुई थी |
        समय अपनी गति से चलता रहा | पता ही नहीं चला कब तीन साल निकल गये,इसी दौरान रमा एक प्यारी सी बच्ची की माँ बन गयी थी | रमा का पूरा ध्यान अपनी बेटी दिव्या की देख -भाल मे लगा रहता था | विकास ने घर के काम -काज के लिए दो-दो नौकर रख लिए थे | घर के काम से रमा बिलकुल ही फ्री थी | विकास और रमा बहुत खुश थे | पर कुदरत ने रमा की ख़ुशी का वक़्त बहुत कम तय कर के रखा था | अचानक ही रमा की खुशियों को न जाने किसकी नजर लगी , उसका सब कुछ बर्बाद हो गया |
        विकास का कार दुर्घटना मे प्राणान्त हो गया | पल भर मे रमा का जीवन छिन्न -भिन्न  हो गया | पति के इस तरह बीच राह मे छोड़ कर जाने से रमा पत्थर सी निष्प्राण हो गयी | सामाजिक लोकाचार के बाद सब रिश्तेदार वापस चले गये ,तब रमा को अपनी बेटी दिव्या का ख्याल आया, की वो अकेली नन्ही सी जान के साथ कैसे जियेगी | रमा के पास कोई नौकरी भी नहीं थी | ससुराल मे तो उसे कोई अपनाएगा नहीं फिर भी उसने वहीं जाने का निर्णय किया |
        ' इस घर के दरवाजे तुम्हारे लिए पहले से ही बंद है,फिर क्यों आई हो अपना मनहूस साया लेकर यहाँ, चली जाओ वापस |,पहले हमारे बेटे को हमसे दूर किया और अब इस दुनिया से ही दूर हो गया | अब यहाँ क्या करने आयी हो | सास ने जली -कटी सुनाकर अपना दरवाजा बंद कर लिया | दुखी रमा ने वापस अपने घर जाना ही उचित समझा |
        रमा ने कुछ दिनों के लिए मम्मी -पापा के घर जाने का निश्चय किया | मम्मी के गले लगकर रमा बहुत रोई | मम्मी ने कहा ' रमा ये तुम्हारा ही घर है ,जब तक मन करे यही रहो, और मै तो कहती हूँ ,अब वहाँ अकेली रह कर क्या करोगी, हमारे पास ही रहो |, माँ के प्यार भरे स्पर्श से रमा के आर्त -मन को कुछ तो राहत मिली | भाभी तो रूखेपन से बस मुस्कराई भर थी, और रसोई मे चाय बनाने चली गयी | रमा को समझते देर ना लगी कि भाभी को मेरा यहाँ आना अच्छा नहीं लगा है |
        अभी कुछ दिन ही हुए रमा को यहाँ आये कि भाभी का हर छोटी -मोटी बात पर रमा को टोकना ,नीचा दिखाना चालू हो गया | रमा अनदेखा करती रही | पर आज तो रमा ने जो सुना,उसके बाद उसने मम्मी के घर से जाने का निश्चय कर लिया | भाभी भाई से कह रही थी कि ' आप अपनी बहन को यहाँ से जाने के लिए बोल दो ,ये जब से अपनी फूटी किस्मत लेकर यहाँ आई है ,मुझे अपनी चिंता होने लगी है | मुझे डर है कि कहीं आपको कुछ हो ना जाये |, इसके रहने ,खाने का खर्च हम वहन कर लेंगे ,आप तो इसको यहाँ से चलता करो |,
              भाई ने कहा 'कुछ दिन ही तो हुए है कितने बड़े दुःख से गुजरी है ,कुछ दिन बाद खुद ही चली जाएगी|,ये सब सुनकर रमा हैरान रह गयी ,जाने के लिए मम्मी को भी तो राजी करना होगा | सुबह चाय पीते हुए रमा ने मम्मी से कहा ' मम्मी अब मै अपने घर जाना चाहती हूँ , यहाँ इस उम्र मे आप पर बोझ बन कर नहीं रहना चाहती |, मम्मी ने कहा क्यों ?  वहां कोई भी तो नहीं,किसके सहारे रहोगी |, 'नहीं मम्मी जाने दो ,और इससे पहले भाई उसे जाने का बोले, वो किसी तरह मम्मी को समझाकर अपने घर आ गयी |
          शाम को भाई ने रमा को घर मे नहीं देखा तो पत्नी से पूछा 'रमा कहाँ है ? 'चली गयी अपने घर अपने को कुछ कहना ही ना पडा ,चलो बला टली |, पत्नी ने खुश होते हुए कहा | बहु -बेटे की बाते सुनकर रमा की मम्मी के रमा के जाने का कारण समझ मे आ गया था | रमा अपने घर मे विकास की यादो के सहारे जीने की कोशिश करने लगी | विकास की कम्पनी ने रमा को सहानुभूति वश कम्पनी मे काम दे दिया था ,जिससे रमा का जीवन सुचारू रूप से चलने लगा
          अब रमा का सारा ध्यान अपनी बेटी दिव्या पर था, जो उसका एक मात्र जीने का सहारा भी थी | समय अपनी गति से चलता रहा | दिव्या अब बड़ी हो गयी, पढने मे वो कुशाग्र बुधि की थी | उसने ऍम ,बी .ए . किया | कॉलेज मे दिव्या का प्लेसमेंट मे एक बड़ी कंपनी मे जॉब का ऑफर आ गया था | पर रमा उसकी शादी करना चाहती थी | माँ -बेटी मे इस मामले मे बहुत बार बहस होती थी | दिव्या माँ को अकेला छोड़ कर शादी नहीं करना चाहती थी | रमा कहती ' दिव्या तेरे हाथ पीले करके तुझे अपने घर विदा करदू तो मे चैन से जी लुंगी अपना बाकि का जीवन |,
        रमा ने आखिर दिव्या के ना चाहने पर भी उसके लिए रिश्ते देखने शुरू किये | बहुत रिश्ते देखे ,पर कुछ रमा को पसंद नहीं आते ,तो कुछ को दिव्या नहीं पसंद आती थी |समय बीतता जा रहा था | रमा की चिंता बढती जा रही थी | दिव्या २७ वा साल पूरा करने वाली है | कोई भी रिश्तेदार रमा की मदद भी नहीं कर रहा था | सबका ये सोचना था कि माँ -बेटी की किस्मत अच्छी नहीं है ,कहीं हमारी खुशियों को भी ग्रहण ना लग जाये | रमा करे तो क्या करे! अब रमा के दिन -रात इसी चिंता मे बीतने लगे थे | दिव्या माँ के गले लगकर हमेशा बोलती थी कि 'मेरी शादी की चिंता छोड़ दो,मै आपके बुढ़ापे का सहारा बनुगी |,
            दिव्या के कॉलेज जाने के बाद रमा उदास बैठी थी, तभी फोन की घंटी बजी | रमा ने फोन उठाया ,हल्लो , सामने से कमला ताई की आवाज आई 'मै कमला अमेरिका से बोल रही हूँ ,
  आज हमारी याद कैसे आई , रमा ने बोला |
  दिव्या के रिश्ते के लिए मेरे देवर का बेटा संदीप कैसा रहेगा ,
  'वो जिसका परिवार अम्रतसर मे रहता है , रमा ने कहा |
  'हाँ ,वही, कमला ताई ने कहा |
 ' तुम चाहो तो अम्रतसर चले जाओ , हाँ ठीक है ,देखते है , रमा ने फोन कट किया |
        रमा के दिल मे विचार चल रहा था कि इतनी दूर सात समन्दर पार दिव्या का ब्याह करना ठीक रहेगा ?,
        दिव्या से बात की तो वो बोली ' विदेश मे रहने  वाले लडको पर मुझे तो भरोसा नहीं है , आपके पहचान वाले है, तो ठीक है | रमा को बात ठीक लगी, अम्रतसर जाकर संदीप के माता -पिता से मिली ,सब ठीक लगा ,दिव्या की संदीप के साथ शादी की बात पक्की हो गयी | दो माह बाद शादी हो गयी | रमा के कोई रिश्तेदार नहीं होने के कारण ,अम्रतसर जाकर एक सादे समारोह मे शादी कर दी | आखिरकार शादी के बीस दिन बाद दिव्या के अमेरिका जाने का समय आ गया |रमा ने नम आँखों से बेटी को विदाई दी | संदीप और कमला ताई को बेटी को प्यार से रखने की बात कह कर रमा अपने घर आ गयी |
     प्लेन की कुछ घंटो की यात्रा के बाद दिव्या 'अमेरिका के न्यूयॉर्क, शहर मे थी | संदीप का आलिशान घर और और उसका अपने प्रति इतना प्रेम देख कर ,दिव्या अपनी किस्मत पर बहुत खुश हो रही थी | संदीप रोज ऑफिस से जल्दी आ जाता, और दिव्या को बाहर घुमाने ले जाता था | करीब बीस दिनों तक संदीप उसे पार्टी,होटल आदि ले जाता रहा| शाम का खाना तो प्राय बाहर ही खा कर आते थे | दिव्या बहुत खुश थी |
          दिव्या की ख़ुशी ज्यादा दिन तक ना रही,आज संदीप ने दिव्या को साथ ले जाने से इंकार किया | दिव्या ने कारण जानना चाहा ,तो उसे गुस्सा आ गया दिव्या को डांटने लगा | फिर भी दिव्या ने जानना चाहा, तो सुनो संदीप ने कहा ' मैंने यहाँ की एक विदेशी लड़की से घर वालो को बिना बताये शादी कर ली है,हमारे एक बच्चा भी है, तुमसे शादी की तो सिर्फ माँ -पापा को खुश रखने के लिए | और हाँ ,तुम अपने घर दिल्ली जाने का तो सोचना भी मत , तुम्हारा पासपोर्ट मेरे पास ही रहेगा, मै नहीं चाहता मेरे घरवालो को इस बात की भनक भी लगे | तुम्हे यहाँ सब कुछ मिलेगा तुम्हे किसी भी बात की कमी नहीं रहेगी , इतना कहकर वो अपनी पहली पत्नी के घर चला गया | दिव्या को ये सब सुनकर ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके शारीर से रक्त का एक -एक कतरा निकाल लिया हो और वो निष्प्राण हो गयी | उसे अपनी दुनिया उजडती हुई साफ दिखाई दे रही थी |
        हैरान,परेशांन दिव्या ने कुछ देर बाद अपने अंदर इस मुसीबत से लड़ने की हिम्मत पैदा की, दिव्या एक बहुत ही समझदार और संस्कारी लड़की थी | पति के इस कृत्य मे चुप रहकर अन्याय सह कर उसे बढ़ावा देने वालो मे से नहीं थी | अब उसे अपना आत्म सम्मान बचाना था | उसने पहला कदम बढ़ाया, संदीप से बात करने का कोई फायदा नहीं था | उसने पुलिस  -स्टेशन जाकर, संदीप पर धोखे से शादी करने के लिए ऍफ़ .आई .र . लिखवा दी | संदीप को गिरफ्तार कर लिया गया | संदीप ने सोचा नहीं कि दिव्या उसके साथ ऐसा कुछ करेगी |
          पुलिस ने दिव्या का पासपोर्ट भी संदीप से लेकर दिव्या को दे दिया ,और कहा 'आप इंडिया जाना चाहो तो हम सरकारी खर्च पर भेज सकते है |, दिव्या ने कहा 'नहीं जाना अभी तो मुझे बहुत काम करने है | संदीप को सबक सिखाना है |
          दिव्या ने कुछ स्थानीय लोगो के साथ मिलकर एक N.G.O.खोला , जिसके अंतर्गत तमाम भारतीय लडकियों की मदद की जा सके, जो उसकी तरह मुसीबत मे फंस जाये | पुलिस ने भी अपना पूरा सहयोग देने का वादा किया | इससे भारतीय लडकियों का जीवन बर्बाद होने से बच जायेगा |
        संदीप की विदेशी पत्नी को उसके बारे मे ये सब पता चला तो उसने उसे छोड दिया | संदीप को एक साल की सजा हुई | एक साल की सजा काट कर जब संदीप वापस आया , तो दिव्या उसके घर से जाने लगी ,उसने अपना अलग घर ले लिया था, वो एक कम्पनी मे मार्केटिंग मैनेजर की हेसियत से काम करती थी | संदीप ने उसे रोका और कहा ' दिव्या मुझे छोडकर मत जाओ, अब मै कहाँ जाऊंगा ? जूलिया तो मुझे पहले ही छोडकर चली गयी है | अब कभी तुम्हे धोखा नहीं दूंगा |, पर दिव्या ने उसके साथ रहने से साफ इंकार कर दिया और चली गयी | इस तरह संदीप को दोनों औरतो ने छोड़ दिया , दोनों ने अपने आत्म सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा की | किसी ने सच ही कहा है, जैसी करनी वैसी भरनी |
               शांति पुरोहित 

           
       

Saturday, 5 October 2013

                         अन्याय एक लघु कथा                       सुश्री शांति पुरोहित की कहानी                                                                                                                                                ''मम्मी आप क्यों उस आदमी के लिए इतना कठोर व्रत रख रही हो, वो तो कभी आपको भूले से भी याद नहीं करते है| हम दोनों को उनके रहते,लावारिस जीवन जीने को मजबुर होना पड़ा|' रवि ने अपनी माँ शारदा से थोडा झुंझलाहट के साथ कहा| आज आरती ने करवा चौथ का व्रत अपने पति की लंबी उम्र के लिए रखा है|
                                   शारदा अपने सास-ससुर जी और पति विष्णु के साथ रहती थी| सास- ससुर आरती को बेटी से बढकर प्यार करते थे| सुबह से शाम तक आरती उनका बहुत अच्छे से ख्याल रखती थी| अभी आरती की शादी को कुछ महीने ही हुए थे| एक दिन विष्णु बाहर बगीचे मे टहल रहा था| उसका फ़ोन कमरे मे बज रहा था| शारदा ने फोन उठा लिया| सामने से किसी महिला की आवाज आई '' मेरी आवाज सुनकर उसने फोन कट कर दिया|' शारदा ने इस बात को कभी गभीरता से नहीं लिया|
                         समय बीतता रहा| शादी के एक साल बाद शारदा एक बच्चे की माँ बनी| बहुत खुश थी अपनी दुनिया मे; तभी एक दिन विष्णु के एक फैसले ने उसके हँसते-खेलते जीवन में आग लगा दी| 'शारदा मैंने तुमसे और माँ-पापा से एक बात छुपाई है| मेरी नीलू से एक साल पहले, शादी हो चूकी है| हम दोनों एक दुसरे से प्यार करते थे| वो दुबई मे रहती है| कुछ दिन बाद मे उसके साथ रहने के लिए जा रहा हूँ| तुम अपना फैसला लेने के लिए स्वतंत्र हो; हमारे बेटे के साथ यहाँ रहकर, मेरे माँ-पापा के साथ रहकर भी अपना जीवन गुजार सकती हो|' विष्णु की एक-एक बात उसे जहर से भी ज्यादा कडवी लग रही थी|
                                शारदा ने रोते हुए कहा '' मेरे साथ ऐसा अन्याय करते हुए एक बार भी आपने नहीं सोचा कि आप मुझे बिना कोई कुसूर के इतनी बड़ी सजा दे रहे हो| पर कोई बात नहीं जब सोच लिया है तो जाओ, मेरे बारे मे तुम क्या सोचोगे,तुम्हे तो अपने जन्म देने वाले माँ-पापा की भी कोई परवाह नहीं है| जब उनको तुम्हारे इस फैसले का पता चलेगा तो वो भी मेरी तरह टूट जायेगे| इसलिए तुम उनको बिना कुछ कहे यहाँ से चले जाओ;उनको मे संभाल लुंगी|' शारदा ने रोना उचित नहीं समझा और फिर वो सास-ससुर को इस बात की भनक भी नहीं पड़ने देना चाहती थी| तब से लेकर आज तक वो सास-ससुरजी का सहारा बनी बैठी है,जो खुद भी एक बेसहारा है| रवि ने छोटी उम्र से ही बड़े की तरह अपनी माँ को संभाला है|
                        शांति पुरोहित 

Tuesday, 2 July 2013

सीख

सीख                                                सुश्री शांति पुरोहित की कहानी
         आज मीनू की शादी को सात माह होने को आये है| रोहित के साथ वो इतनी खुश थी कि उसे अपने मायके वालो की याद ही नहीं आई | माँ के बार-बार बुलाने पर भी वो नहीं गयी | लेकिन आज उसने मायके जाने का तय किया,उसने कम से कम दो सप्ताह तक अपने मायके रुकने का सोचा है |
                             पर उसे रोहित को अकेला छोड़ कर जाना भी अच्छा नहीं लग रहा था पर जाना तो था, रोहित उसे ट्रेन मे बैठा कर आ गया था| अब इधर ट्रेन की रफ़्तार तेज हुई और मीनू के दिमाग मे विचारो की उमड़ -घुमड तेज हो गयी,सोच रही है,जैसे ही रोहित ऑफिस से घर आता था वो दोनों अपने कमरे मे
  चले जाते थे और ढेरो प्यार भरी बाते करते थे,ये उनके रोज का काम था |
                            एक बार मीनू की सासुजी ने कहा की ''हम रोहित के साथ खाना खाने के लिये उसका इंतजार करते रहते है और जब वो आ भी जाता है तो भी खाने के लिये एक घंटे बाद कमरे से बाहर आता है | हमें तो भूख लग जाती है तुम कल से हमें पहले खिला दिया करो | फिर तुम लोग आराम से जब चाहो खा लिया करो|, नीलू ने  भी सासुजी को निसंकोच कहा कि ''जिसे जल्दी खाना हो वो अपने हाथो से लेकर खा ले | अब ऐसा तो होगा ही ना,जब रोहित थका हुआ घर आता है तो थोड़ी देर मेरे साथ बैठ कर बाते करता है तो उसकी थकान दूर हो जाती है,तो अब आपसे ये भी सहन नहीं होता है|,
                           मीनू की सासु' करुणा ,ने मीनू को कुछ भी नहीं कहा,पर उसका मन मीनू की बातो से बहुत आहत हुआ | रात को खाना -खाने के वक़्त माँ को वहाँ नहीं देख कर रोहित माँ को बुलाने उनके कमरे मे गया |''माँ ,चलो खाना खाते है |, नहीं,तुम लोग खालो,मुझे नहीं खाना और फिर उनके और मीनू के बीच जो बात हुई वो अपने बेटे से कहा | और उसकी माँ रोने लगी थी | रोहित ने मीनू को डांटा,तो मीनू भी रोने लगी |
                        अब ये तो स्वभाविक ही है कि आदमी औरत को रोता हुआ देख कर भावुक हो जाता है | रोहित भी हुआ,उसने रोती हुई अपनी पत्नी को चुप कराया |और आगे से कभी ना डांटने का वादा किया और साथ ही अपनी माँ को मीनू के सामने ही कहा कि आप अपने- आप खाना लेकर खा लिया करो मीनू को मत रुलाया करो | उस दिन के बाद जैसे उसके और रोहित के बीच का प्यार और भी मजबूत हो गया था | उसकी सासु करुणा ने भी उसे कुछ भी कहना छोड़ दिया था |
                         आज जब वो मायके जा रही थी तो सोच रही है कि उसकी और उसके भाई की शादी साथ ही हुई थी तो उन दोनों के बीच मे ऐसा ही होगा,जैसा उसके और रोहित के बीच मे है | नही ऐसा नहीं हो सकता भाभी तो छोटे से गाँव की लड़की है,उसे कहाँ ये सब आता होगा | मेरे माँ-पापा को भी ठीक से संभालती होगी की नहीं पर जो भी हो अब ये तो वहां जा कर ही पता चलेगा |
                          ये सब सोचते हुए उसे वक़्त का पता ही नहीं चला उसका स्टेशन आगया और वो अपने घर पहुँच गयी |घर मे पैर रखते ही उसे ऐसा लगा जैसे किसी को भी उसके आने का इंतजार नहीं था | उसने देखा उसकी माँ और भाभी झूले पर बैठी बातो मे मगन थी |उन्हें तो पता ही नहीं चला कि मै अन्दर आ गयी हूँ | जब नौकर ने जोर से कहा कि मीनू दीदी आगयी ........तब उनको पता चला कि मै आ गयी फिर माँ और भाभी ने मुझे गले से लगाया | उनका ऐसा वयव्हार देख कर मीनू को थोडा बुरा जरुर लगा पर फिर सोचा ठीक है भूल जाती हूँ,फिर भी उसने सोचा कि एसी कौनसी बात हो सकती है कि ये दोनों मुझे ही भूल गयी है |
                         देखने मे भाभी तो पूरी देहातिन ही लग रही थी,सर का पल्लू तो जैसे नीचे सरकने का नाम ही नहीं ले रहा था| पर मीनू तो ससुराल मे सूट पहन कर घुमती है,उस पर कभी -कभी दुपट्टा भी नहीं ओढती थी |एक बार सासुजी ने कहा भी था कि ससुरजी की तो थोड़ी मर्यादा रखो,मीनू ने तुरंत कहा ''मै पुरे दिन दुपट्टा ओढ़ कर नहीं घूम सकती मुझे अच्छा नहीं लगता है
                                                                                                                                                                                            
भाभी ने मीनू को पानी पिलाया फिर थोड़ी देर तीनो ने बाते की | फिर भाभी ने खाना बनाया | वो तीनो खाना-खाने बैठे  भाभी ने मेरे आने के कारण खाने मे बहुत सारे मीठे और नमकीन पकवान बनाये | खाना बहुत अच्छा था माँ ने खाने की तारीफ की थी | तभी उसकी भाभी ने कहा ''मै तो आज भी सासुजी जी नया -नया खाना बनाना सीखती हूँ | मीनू हैरान रह गयी कि कोई बहु सास से कैसे कह सकती है कि उसे अच्छा   खाना बनाना नहीं आता है,उसे याद आया एक दिन वो सब्जी मे नमक डालना ही भूल गयी ,जब सासुजी ने नमक के लिये कहा,तो उसने कह दिया कि कल से खाना बनाने वाली को बुला लेना| एक तो बनाऊ ऊपर से गलतिया निकालो ऐसे कैसे बर्दाश्त करे वो |
                               खैर, दोपहर को माँ ने भाभी को कहा ''सुबह से काम कर रही हो थक गयी होगी जाओ अब थोडा आराम करलो|, भाभी ने कहा ''नहीं,ननद के साथ बैठ कर थोड़ी देर गप्पे लगाउंगी उन्हें यूँ अकेला छोड़ कर कैसे सो जाऊ |,मीनू को फिर अचरज हुआ उसे याद आया कि उसकी ननद आई थी तब वो उनसे सिर्फ तीन बार ही मिली थी | आने के टाइम,खाने के टाइम और जाने के टाइम | ननद के साथ बैठ कर बाते करने के बारे मे तो उसने कभी सोचा ही नहीं था | अब तो मीनू को भाभी की बातो से अपने मे गलतिया दिखने लगी थी |
                             एक बार मीनू और भाभी बाहर घुमने गये तो भाभी ने वहां से माँ को फोन करके पूछा कि आपने और बाबूजी ने खाना खा लिया क्या ? मीनू ने मन ही मन मे कहा कि ये भी कोई पूछने की बात है खाना खा ही लिया होगा | उसने तो यहाँ आकर अपनी सासुजी को एक बार भी फोन नहीं किया था,हाँ एक बार रोहित से बात करते वक़्त कहा था ''जरा माँ को फोन देना , आप ठीक हो ना माँ ,खाना बनाने वाली बरोबर आती है ना ,उसे ये पूछना अजीब लग रहा था पर भाभी को देख कर पूछा,पर ये क्या ! सासुजी की रोने की आवाज आई फिर उन्होंने कहा की यहाँ जैसा भी है ठीक है पर तुमने फोन करके पूछा ये अच्छा लगा |उस वक्त उनकी बात सुनकर मीनू की आँखों मे कब आंसू आगये पता ही नहीं चला उसे, सासुजी मे अपनी माँ नजर आने लगी थी |
                       भाभी के साथ घुमने और शौपिंग करने मे समय कैसे बीत गया पता पता ही नहीं चला अब मीनू के वापस ससुराल जाने का समय आ गया है |मीनू की ट्रेन सुबह पांच बजे की थी,भाभी चार बजे ही उठाने आगयी |रास्ते के लिये खाना,नाश्ता बना कर पैक किया और मेरे पैर छुए,तभी मीनू ने कहा ''भाभी मै आप से बहुत कुछ सीख कर जारही हूँ | भाई को मेरा नमस्ते  कहना उठे तब,''तभी भाई आये अरे ! इसे क्यों कह रही हो दीदी मुझे ही कहो ना '' मीनू को बहुत आश्चर्य हुआ कहा''आप तो देरी से उठते हो ना ,'हाँ पर तुम्हारी भाभी ने रात को ही बोल दिया था कि सुबह दीदी को छोड़ने जाना है |
                                                                                       मीनू को याद आया उसकी ननद गयी तब ना वो उठी ना रोहित ससुरजी छोड़ने गये थे | पुरे रास्ते मीनू ये सोचते हुए गयी कि इस देहाती लड़की ने उसे परिवार मे कैसे जिया जाता है सीखा दिया है घर पहुँच कर सास -ससुर के पैर छुए और पहले की गयी गलतियों की माफ़ी मांगी सास -ससुर ने भी उसे बेटी की  तरह ही माफ़ कर दिया और मीनू और उसके सास -ससुर ख़ुशी से रो पड़े |                                                        
           शांति पुरोहित