Friday, 22 November 2013

विदाई

                                                                       
                                                                                                   प्रिया, अपने भाई की बड़ी दीदी थी | वो भी मात्र पंद्रह साल की बस !  परिस्थिति ने प्रिया को बड़ा बना दिया | उसका बचपन अपने भाई की देख-भाल और घर की सारी जिम्मेदारी उठाने मे कहीं खो गया | दिव्या प्रिया की माँ, असमय इस दुनिया से सबको छोड़ कर चली गयी |
                     दिव्या बहुत ही नेक -दिल इंसान थी | दुसरो का भला करने की उसमे गजब की आदत थी | जैसे -दिव्या का जन्म परोपकार के लिए ही हुआ हो | अतिश्योक्ति ना होगी अगर कहूँ, कि परदुख कातरता उसमे कूट -कूट कर भरी हुई थी | पड़ोस मे या परिवार मे किसी को दिव्या की जरूरत हो वो तुरंत उनके पास अपना सब काम छोडकर पहुँच जाती | किसी की शादी हो या कोई बीमार हो उनकी सेवा करना उनके काम आना यही जैसे उसके जीने का लक्ष्य था |सिर्फ तन से ही नहीं वो धन भी खर्च करती थी | कई गरीब लडकियों की शादी मे उसने पैसा लगाया है |
               दिव्या अपनी गृहस्थी मे पति ,सास और दो बच्चो के साथ बहुत ही खुश थी | रेलवे मे काउंटर बाबू की नौकरी करती थी |पति किशोर कॉलेज लेक्चरार थे | दस बजे अपने ऑ|फिस जाने से पहले किशोर और दोनों बच्चो को भेजने की तैयारी मे लगी रहती | रोज सुबह घर मे उनकी जरूरत की चीजो के लिए दिव्या को इधर से उधर भागना पड़ता है, पर वो उफ़ तक नहीं करती है | उसे तो जैसे ये सब करने मे आनंद की अनुभूति होती है | और क्यों ना हो, एक औरत की ख़ुशी अपने परिवार को खुश देखने मे ही है |
                 सुबह की पहली किरण के साथ ही दिव्या बिस्तर छोड़ काम मे जुट जाती थी | 'मम्मी मेरा बैग तैयार है न |' प्रिया बाथरूम से ही चिल्लाती है | ' मम्मी मेरा लंच -बॉक्स रेडी हुआ की नहीं |, पंकज ने जुते की लेस बांधते हुए कहा |'
                 'हाँ ,हाँ सब तैयार है बस तुम आकर नाश्ता करलो तो तुम्हारे पापा ,को भी नाश्ता दे दू | दिव्या ने कहा |, सब को भेजने से पहले ही मांजी को चाय देनी होती है | सबकी जरुरत पूरी करते -करते वो खुद भी तैयार हो जाती थी | गजब की फुर्ती थी दिव्या मे उसकी सास रोज ही कहती है |
                    धीरे -धीरे समय बीत रहा था ,बच्चो का स्कूल ख़त्म होकर अब कॉलेज शुरू होने वाला था | बच्चे अगले साल कौनसी कॉलेज जायेंगे ,घर मे रोज यही बाते चल रही है | एक दिन सुबह दिव्या के सीने मे असहनीय दर्द होने लगा | किशोर घर पर ही थे जल्दी से गाडी निकाली और दिव्या को शहर की सबसे बड़ी हार्ट होस्पिटल मे ले गया | डॉ, ने तुरंत ही एडमिट करके इलाज शुरू किया | करीब एक महिना तक इलाज चला | आज दिव्या को डिस्चार्ज किया जाना था बच्चे खुश थे उनकी मम्मी इतने दिनों के बाद ठीक होकर घर आ रही है | किशोर की माँ ने बहु को खूब आशीर्वाद दिया और ठीक होकर वापस घर और बच्चे को सँभालने को कहा |
                         होना तो कुछ और ही था घर आने के चार दिन बाद ही दिव्या बच्चो को रोता छोड़ कर इस दुनिया से चली गयी | किशोर बच्चो के सामने रो भी नहीं सकता| बच्चे दादी से बार -बार पूछ रहे है कि हमने एसा क्या पाप किया कि हमारी माँ हमे अकेला छोड़ कर चली गयी | बच्चो का रुदन किसी से भी नहीं देखा जा रहा था | दिव्या को लाल जोड़ा पहनाया गया  , लाल बिंदी और किशोर से मांग भरवाकर सुहागिन के वेश मे अंतिम सस्कार के लिए ले जाया गया |
                        समय बीतता गया बच्चे अब बड़े हो गये घर मे कोई औरत हो इसलिए बेटे की शादी पहले की गयी | प्रिया की शादी भी तय हो गयी है एक माह बाद प्रिया की शादी होनी है घर मे अभी से तैयारिया शुरू हो गयी | आज प्रिया की मेहँदी है | कल हल्दी और महिला संगीत रखा है | सब काम हो रहे है बच्चो को अपनी माँ आज कुछ ज्यादा ही याद आ रही है | प्रिया उदास अपने काम मे लगी है | महमानों की भारी भीड़ मे प्रिय अकेला महसूस कर रही है |अपनी माँ को ढूंड रही है | माँ के वयवहार के कारण बहुत लोग शादी मे प्रिया को आशीर्वाद देने के लिए आये है | मेंहमानों का तो जैसे ताँता लग गया | सब अपनी और से गिफ्ट भी लेकर आये है|किशोर को प्रिया को देने के लिए कुछ भी लाना नहीं पडा सब सामान की व्यवस्था मिलने वाले लोगो ने कर दी थी  अब प्रिया को लग रहा है कि मेरी मम्मी कितनी महान थी | जब दिव्या गयी तब प्रिया बहुत छोटी थी कुछ समझ पाने की हालत मे नहीं थी | सब लोग उनको जैसे आज सच्ची श्रदांजली देने आये है मुझ बिन माँ की बेटी को अपना प्यार और आशीर्वाद देने की जैसे होड़ मच गयी है |
                         आखिर प्रिया की विदाई का टाइम भी आ गया|सब ने प्रिया की विदाई को जैसे विदाई महोत्सव बना दिया | एक -एक कर सब गले मिल रहे थे | अंत मे प्रिया की दादी ने उसकी सास को कहा कि 'ये बिन माँ की बच्ची है इसे आप बहुत प्यार से रखना |, दुल्हे राजा और उनके परिवार के लोग प्रिया को डोली मे बिठाकर अपने घर ले गये | पापा और दादी को अकेला छोड़ कर आज प्रिया अपने ससुराल चली गयी सब की आँखे नम है |

Wednesday, 20 November 2013

ख्वाहिश दिल की

फैशन डिज़ायनर रूपा का अपने बुटिक मे आते ही काम मे व्यस्त हो जाना, अपने स्टाफ को काम समझाना,ये उनका डेली का रूटीन था |फैशन डिजा
 '' मिस डिसूजा , मिस रूबी का आर्डर रेडी हुआ की नहीं ? डिसूजा कुछ जवाब देती, उससे पहले ही रमेंद्र से पूछ बैठी '' आस्था मेंम ,की ड्रेस के लिए कल जो डिजायन आपको दिया था ,वो ड्रेस रेडी हुई की नहीं ?
    अरे ! जल्दी -जल्दी सबके आर्डर तैयार करो ! दीपावली का त्यौहार है सबको समय पर अपना आर्डर चाहिए होता है |पर आज रूपा का मन कहीं और है वो ऑफिस मे आराम कुर्सी मे बैठ गयी | त्योहारी सीजन के चलते सास लेने भर की भी फुर्सत नहीं है | थकान सी हो रही थी | उठकर ऑफिस की खिड़की खोली तो हल्की सुनहरी धुप  ऑफिस मे प्रवेश कर गयी | दिसंबर माह मे धुप सुहानी लगती है | धुप मे बैठना रूपा को बचपन से ही अच्छा लगता था |
            रूपा धुप का आनंद लेने लगी | दिमाग को एकांत मिलते ही मन गुजरे वक्त की खटी -मीठी यादो मे गोते लगाने लगा | 'इकलौती संतान थी ,पापा मुझे डॉ. बनाना चाहते थे वो खुद भी डॉ. थे | वो अपना क्लिनिक मुझे सौप कर खुद लोगो की फ्री सेवा करना चाहते थे | मेरी रूचि फैशन डिजायनर बनने मे थी | अपना खुदका बुटिक खोलना चाहती थी | मम्मी हमेशा मेरा ही साथ देती थी | पापा को समझाती 'आप क्यों अपनी मर्जी बच्ची पर थोप रहे हो ,उसे जो करना है करने दो ? पापा को मम्मी की बातो से कोई फर्क नहीं पड़ता था वो अपनी जिद पर अड़े थे और मै अपनी ....
            आखिर मेरा सीनियर का रिजल्ट आने के बाद मम्मी ने पापा को समझा-बुझा कर मेरा एडमिशन फैशन डिजाइनर के कोर्स के लिए करवा दिया था | मै बहुत खुश थी | अभी मेरा डिप्लोमा पूरा हुए एक माह ही बीता था कि पापा -मुम्मी ने मेरा रिश्ता एक इंजिनियर लड़के निलेश से पक्का कर दिया था | बहुत कोशिश की ,अभी शादी ना हो ,मै पहले अपना बुटिक खोलना चाहती थी | पापा ने मेरी एक न सुनी और कुछ समय बाद शादी हो गयी | मेरी इच्छा मेरे मन के किसी कोने मे दब कर रह गयी |
           ससुराल मे पति निलेश के पापा- मम्मी एक बहन और दादी थे | नई बहु से सबको बहुत सी अपेक्षाए होती है यहाँ भी थी |सब की इच्छा पूरा करने मे अपना सपना याद ही नई रहा | निलेश की जॉब अभी लगी ही थी तो वो मुझे बहुत कम समय दे पाते थे |अक्सर टूर पर जाना होता था | समय अपनी गति से चलता रहा | एक साल बीत गया | आखिर आज निलेश के जन्मदिन के अवसर पर अपनी बात कहने का मौका मिला '' मुझे बुटिक खोलना है प्लीज मेरी मदद कीजिये न आप , मैंने बहुत ही प्यार से कहा |
          अरे ! इसमें प्लीज बोलने की क्या जरुरत है ?
          तुममें योग्यता है ,काम करना चाहती हो मै कल ही लोकेशन देख कर बताता हूँ |
तम्हारा साथ देना मेरा फर्ज है ,मै आज बहुत खुश थी | पर जैसे ही सासु माँ को पता चला उन्होंने तुरंत आदेश दे दिया '' पहले हम घर मे अपने पोते -पोती को देखना चाहते है बुटिक बाद मे खोलना |, माजी का आदेश था तो निलेश भी चुप रह गया | मै एक बार फिर मन मसोस के रह गयी |
            दिन ,महीने ,साल निकलते रहे ,इसी दौरान मै एक बेटी और एक बेटे की माँ बन गयी थी | अब तो मेरा एक ही काम रह गया था बच्चो ,निलेश और ससुराल वालो की सेवा करना | इन सब के बीच मेरी कला अपना दम तोड़ रही थी | कभी नहीं सोचा था कि मेरी पढाई और मेरे हुनर का ये हाल होगा | निराशा मेरे अन्दर घर कर  गयी |
             समय बीतता रहा अब मेरी बेटी नीता कॉलेज जाने लगी और बेटा निर्भय भी अगले साल कॉलेज  जाने लगेगा | अगले सप्ताह नीता के कॉलेज मे वार्षिक उत्सव होने वाला था नीता ने फैन्सी ड्रेस प्रतियोगिता मे भाग लिया था| उसने टेलर से जो ड्रेस बनवाई वो उसे बिलकुल भी पसंद नहीं आयी | नीता उदास हो गयी | आज फिर किसी अन्य टेलर के पास गयी | बेटी की उदासी मुझसे देखी नहीं गयी | तभी मुझे अपनी कला का ख्याल आया मैंने आज अपनी कला का उपयोग करके बड़े ही मनोयोग से बेटी के लिए ड्रेस तैयार करली |
             शाम को जब नीता उदास चेहरा लेकर घर वापस आयी | ''कुछ काम नहीं बना क्या ? मैंने पूछा | नहीं माँ , तभी उसके हाथ मे वो ड्रेस रखी मैंने | नीता ख़ुशी से उछल पड़ी ''वाह माँ , आपने कहाँ से बनवाई ड्रेस ?,
            बहुत अच्छी है मुझे एसी ही ड्रेस चाहिए थी |, तभी मेरी सासु माँ ने उसे कहा 'तेरी माँ रूपा ने ही बनाई है | आज हमे अपनी गलती का एह्सास हो रहा है | ' किस गलती का दादी , नीता ने कहा | रूपा बह इतनी टेलेंटेड है पर हमने इसे घर के कामो मे लगा कर रखा,  इसकी कला का कभी सम्मान नहीं किया |, सासु माँ ने कहा |
              तो नीता बोली '' अब भी मम्मी अपना बुटिक खोल सकती है, अब तो हम भी अपना काम खुद कर सकते  है | शाम को निलेश आया सासु माँ और नीता ने उन्हें सब बताया | नीता ने पापा से कहा ,मम्मी इतनी योग्य थी ,अपना बुटिक खोलना चाहती थी ,तो आपने मम्मी को सपोर्ट क्यों नहीं किया ?,एक पति को तो अपनी पत्नी की योग्यता की कद्र करनी चाहिए थी | निलेश को सच मे अपनी ग़लती का एहसास हुआ और  निलेश ने अगले ही दिन अति व्यस्त बाजार मे एक दुकान देखली और जोरो से तैयारिया चलने लगी | प्रतियोगिता मे नीता का पहला स्थान आया | नीता भी मेरी मदद करने मे लग गयी |
   आखिर पांच माह के बाद आज मेरे बुटिक का उद्घाटन था | जो मैंने अपनी सासु माँ और ससुरजी के हाथो कराया | बहुत सारे कपड़े लोगो ने खरीदे साथ ही इतने आर्डर आये मे एक साल तक के लिए एक साथ व्यस्त हो गयी | आज तो मेरे बनाये कपड़े देश के अन्य भागो मे भी जाने लगे है | ये सब मेरी बेटी और सासु माँ के कारण ही हुआ है | मेम चाय , मिस डिसूजा की आवाज से मेरा चिंतन ख़त्म हुआ | जब जागो तभी सवेरा वाली बात मुझ पर फिट बैठी है | आज मेरा वर्षो पहले देखा सपना या यू सोच लीजिये कि मेरे जीने का मकसद अब मुझे मिला है |
 
शांति पुरोहित



माँ के लिए.........

                                                                                                                                                                                               
Cover Photo                                                                                                                                                                                                                                       शोर्य को स्कूल और पति संजय के ऑफिस जाने के बाद संगीता, लोन मे बैठ कर चाय के साथ अख़बार पढ़ती थी,ये उसकी रोज की आदत थी | अन्दर का पेज जैसे ही खोला एक समाचार पर नजर पड़ी ,पूरी खबर पढने लगी जो इस प्रकार थी| सेठ दीनानाथ की दूकान का वफादार मुनीम, बीस हजार रुपया ले कर फरार हो गया |
            ये कैसे हो सकता है?, इतना ईमानदार था ,मुनीम रामसिंह ,फिर उसने ऐसा क्यों किया ?, संगीता हैरान रह गयी ये खबर पढकर ! दीनानाथ जी संगीता के पडौसी होने के नाते उनका एक दुसरे के घर आना -जाना होता रहता था | फिर उनकी पत्नी संगीता की सहेली भी थी |
            उस दिन दीनानाथ जी के घर उनके पौत्र चिन्मय की जन्म दिन की पार्टी का अवसर था | रिश्तेदारों के आलावा, शहर की जानी -मानी हस्तिया पार्टी मे शिरकत करने वाली थी | सेठ दिनानाथ जी शहर के रसूखदर आदमी थे | उनका तैयार वस्त्रो का बहुत बड़ा शो रूम था | परिवार मे दो बेटे और एक प्यारी सी बेटी दिव्या थी |
                  बेटी ने M.B.B.S.किया और अपने साथ ही पढने वाले डॉ. विक्रम से उसकी शादी कर दी | और वो अपने ससुराल चली गयी | छोटा बेटा कमलेश पढने के लिए विदेश गया, वहीं पर काम करने लगा, वहीँ की गौरी लड़की के साथ ब्याह कर लिया | दीनानाथ जी और उनकी पत्नी ने बेटे की जिद के आगे समझोता कर लिया | बड़ा बेटा विमलेश, ही परिवार सहित इनके पास रहता था | यहाँ का सारा काम -धंधा ,ये दोनों बाप -बेटे मिलकर सम्भालते थे |
               आज तो सुबह से ही हवेली के सभी नौकर हवेली को सजाने मे लगे हुए थे | दीनानाथ जी के पर -दादा के ज़माने की बहुत बड़ी हवेली थी | रख -रखाव के लिए नौकरों की फौज लगी रहती है |
                    शाम के सुहाने वक्त मे पार्टी शुरू हो चुकीं है | दीनानाथ जी आगन्तुको के स्वागत के लिए दरवाजे पर खड़े,उनका अभिवादन स्वीकार कर रहे है | पास ही खड़े उनके बेटे विमलेश की गोद मे चिन्मय को तोहफा भी दे रहे थे | पार्टी मे खाने -पीने के साथ नाच -गाने का भी प्रोग्रेम था| पार्टी अरेंज करने मे पैसा पानी की तरह लगाया था | सभी लोग पार्टी का आनंद ले रहे थे, वहीँ सेठ का एक नौकर रामसिंह, ये सब देख कर दुखी हो रहा था | उसका सोचना था कि,दिखावे के लिए ये बड़े लोग इतना पैसा खर्च कर सकते है,और एक जरूरत मंद इंसान को पैसा उधार भी नहीं दे सकते है?,
               पिछले दस दिनों से रामसिंह सेठ से अपनी माँ के इलाज़ के लिए बीस हजार रुपया उधार मांग रहा था ,पर सेठ के कान मे जैसे ये बात गयी ही नहीं हो | पैसा पास मे नहीं है, तो क्या माँ को बिना इलाज मर जाने तो नहीं दे सकता ? एक के बाद एक विचार रामसिंह के दिमाग मे आ- जा रहे है | आखिर उसने मन ही मन कुछ निश्चय किया ,और मौका पाकर सेठ की दुकान की तरफ अपने कदम बढ़ा दिए | दुकान के गल्ले मे से रुपया निकाला और घर चला गया |
              दुसरे ही दिन अपनी माँ को इलाज के लिए शहर ले गया | डॉक्टर के प्रयास और रामसिंह की सेवा से माँ जल्दी ही अच्छी होने लगी | एक दिन माँ ने पूछा 'मेरे इलाज के लिए इतने पैसे कहाँ से लाया बेटा ?' माँ सेठ से पेशगी लाया हूँ | पर सच्चाई तो कुछ और ही थी , जिसे सिर्फ वो ही जानता था |
              दुसरे दिन सेठ ने दूकान के गल्ले मे देखा तो पैसे कम मिले |,और आज रामसिंह भी अभी तक नहीं आया | सेठ को समझते देर नहीं लगी कि रामसिंह ही रुपया लेकर फरार हुआ है | सेठ ने पुलिस थाने मे रिपोर्ट लिखवानी चाही पर सेठानी ने रामसिंह की माली -हालत और परेशानी का सोच कर पुलिस थाने मे रिपोर्ट लिखवाने से मना किया |  सेठ ने इस घटना को फिलहाल भूल जाने मे ही अपना भला समझा | कहीं ना कहीं सेठ अपने को ही इस घटना का जिम्मेदार समझ रहा था | काश ! मुझे  रामसिंह की मदद कर देनी चाहिए थी |
              रामसिंह की मेहनत रंग लाई, माँ अब ठीक हो गयी तो रामसिंह अपने खेत को ओने -पोंने भाव मे बेच कर , बीस हजार रुपयों के साथ सेठ के सामने हाजिर हो गया | विनम्र  भाव से बोला ' मैं गुनाह गार हूँ मैंने आपका विस्वास तोडा है | जो सजा देंगे भुगतने को तैयार हूँ | माँ को बचाने के लिए मुझे ये सब करना पडा | मेरी नौकरी ,मेरी बदनामी से ज्यादा मुझे अपनी माँ की जान ज्यादा प्यारी थी | जिसे बचाने के लिए मुझे ये सब करने पर विवश होना पडा | और सेठ को पैसा लौटा कर माफ़ी मांगने लगा | सेठ को पहले तो गुस्सा आया पर खुद को भी जिम्मेदार मानते हुए आगे से फिर कभी ऐसा मत करना बोलकर उसे माफ़ कर दिया |साथ ही ये भी सन्तोष था कि इतने रुपयों मे से केवल बीस हजार रुपया ही ले कर भागा है | पर रामसिंह ने विश्वास तोडा ये सेठ के लिए सोचने वाली बात थी | और उसकी माँ के प्रति एसी भावना देख कर मन ही मन बहुत खुश हुआ | रामसिंह अपनी माँ के सामने किसी भी चीज को तुच्छ समझता है | तो मालिक के फायदे लिए भी कुछ भी कर सकता है | और उसे वापस काम पर रख लिया |
 शांति पुरोहित 

सरकारी अफसर

 आज ऑफिस की छुट्टी है| सिरिष ड्राइंग रूम मे कपिल के साथ बैठा है | कपिल की नन्ही -नन्ही शरारते देख रहा है | कुछ देर की मस्ती के बाद कपिल थक कर सो जाता है सिरिष उसे उठाकर पलंग पर सुला देता है | खुद भी तकिये का सहारा लेकर लेट जाता है,अपने गत जीवन के चिंतन मे खो जाता है |
                  रीमा पिछले बीस -पच्चीस दिनों से हॉस्पिटल के आई .सी .यू .वार्ड मे बीमारी से लड़ रही थी | उसकी किडनी मे इन्फेक्सन हुआ था | डॉ के अनुसार ठीक होने के बहुत कम चांस है | किडनी फ़ैल भी हो सकती है | सिरिष अपने पांच माह के दूधमुहे बच्चे को लेकर रात -दिन पत्नी की सेवा मे इसी आशा के साथ लगा है कि वो जल्दी ठीक होकर हमारे बच्चे को संभालेगी |
                  सिरिष का परिवार अमेरिका मे रहता है,सिरिष को अपने देश भारत मे रहना अच्छा  लगता था ,वो अपनी पढाई ख़त्म होते ही भारत आ गया यहाँ आकर रीमा से शादी कर ली | उस दिन सिरिष आई .सी .यु .के बाहर बैठा था होस्पिटल मे शांत वातावरण था सिरिष विचार मग्न| भविष्य मे आने वाली समस्याओ के बारे मे सोच कर परेशान हो रहा है कि कब ठीक होकर रीमा बच्चे को फिर से सम्भालेगी ? ओर  कुछ सोचता, उससे पहले आई.सी.यु.से नर्स दौडती हुई बाहर आई ,डॉ सात नंबर पेशेंट की तबियत बिगड़ गयी,उसे सास लेने मे तखलीफ़ हो रही है |, सिरिष किसी अनिष्ट की आशंका से घबरा गया उसे तो पता ही था सात नंबर पेशेंट रीमा ही है | डॉ ने भाग कर रीमा को चेक किया ,उसकी सास उखड़ रही थी | रीमा के शरीर के सभी पार्ट्स ने लगभग काम करना बंद कर दिया | डॉ के अथक प्रयास के बाद भी रीमा बच नहीं सकी उसके जीवन की डोर टूट गयी |
                    सॉरी सर ,रीमा इज नो मोर , डॉ ने कहा | सिरिष की आँखों मे आंसू आ गये ,कपिल को भी जैसे आभास हो गया उसकी माँ उसे अकेला छोड़ गयी ,वो भी पापा के साथ जोर -जोर से रोने लगा था | कपिल के रोने से सिरिष चुप हुआ | डॉ. ने कहा 'होस्पिटल की ओपचारिकता पूरी करके आप घर जा सकते हो | कुछ भी सोचने -समझने की ताकत नहीं बची थी | अपनी ओर अपने नन्हे बच्चे के जीवन मे आने वाली तमाम परेशानियों को भुला कर,सिरिष रीमा की डेड बॉडी को घर ले जाने के लिए होस्पिटल की ओपचारिकता पूरी करने लगा | रीमा को अंतिम विदाई देने के लिए परिवार आ चुका था |
                   रीमा को अंतिम विदाई देने के बाद सिरिष इतने लोगो के बीच भी खुद को अकेला महसूस कर रहा था | रीमा के जाने के तीसरे ही दिन सिरिश मुन्सिपलटी बोर्ड के ऑफिस मे रीमा का  मृत्यु  -प्रमाण पत्र लेने पहुँच गया | गोद मे कपिल को लिए वो सम्बन्धित अफसर से बोला 'सर मेरी पत्नी का मृत्यु -प्रमाण पत्र बना दीजिये |, पर वो अफसर कुछ नहीं बोला | सिरिष ने कई बार कहा पर वो जान -बूझ कर फ़ाइल् के पन्ने पलटता रहा |कपिल भी रोने लगा तो सिरिश ऑफिस की सीढियों मे बैठ गया | तभी वो अफसर उसके पास गया और बोला प्रमाण पत्र बनवाने के पांच सौ रुपया दे दो, कल आकर मृत्यु प्रमाण -पत्र ले जाना |, सिरिष को बहुत गुस्सा आया मेरी सत्ताईस साल की जवान बीवी मर गयी इसे रुपयों की पड़ी है | अपने गुस्से को काबू करके उसने रुपया दे दिया | उसे समझ आ गया ऑफिस मे सी.सी.टीवी कैमरा लगा था इसलिए वहां पैसा नहीं लिया| रिश्वत लेने के मामले मे सावधान जो है |
                दुसरे दिन सिरिष ऑफिस गया तो सीट पर दूसरा  अफसर  बैठा था | सिरिष ने उनसे मृत्यु -प्रमाण पत्र माँगा, उसने दो मिनिट मे बना कर दे दिया | अरे ! 'ये क्या आपने बिना रिश्वत लिए ही बना दिया ?, सिरिष ने कहा | कल उस अफसर ने पांच सौ रूपया लिया है मुझसे | 'मै कभी किसी से एक पैसा नहीं लेता हूँ | आपका कोई भी काम हो आप आना मै करूँगा आपका काम|, दुसरे अफसर  ने कहा |सिरिष ने उस रिश्वत खोर  अफसर  को सबक सिखाने का मन बना लिया और  उन इमानदार ऑफिसर के साथ मिलकर उस रिश्वत खोर  अफसर को रंगे हाथो पकड़वाया | किसी ने सच ही कहा है कि एक व्यक्ति की गलती के कारण  पूरा विभाग बदनाम हो जाता है
शांति पुरोहित 

Saturday, 26 October 2013

ममता एक माँ की

                                                                                                                                                                                                               क्या ममता ने इसलिए दूसरी शादी की थी ?
कि जिन लोगो के लिए उसने अपना सारा जीवन लगा दिया वो ही लोग उसे इस तरह ठेस पहुँचायेगे ,और वो भी तब जब घर मे इतना अहम् और ख़ुशी का माहोल हो, और बहुत सारे लोग मौजूद हो| और कोई नहीं उसका पति एसी दिल तोड़ने वाली बात करेगा ऐसा होगा कभी नहीं सोचा था |लोग ये तो जानते है की स्त्री सहनशील होती है ,पर ये शायद नहीं जानते कि सहन करने की भी एक सीमा तो होती ही है | स्त्री कोई भी हो छोटी -मोटी बात की तो परवाह नहीं करती पर बात अगर उसके स्वाभिमान की होती है तो चुप नहीं रहती और स्वाभिमान की रक्षा के लिए कुछ भी कर सकती है |
                      मेरी कहानी की नायिका ममता एक ऐसे पिता की बेटी है जो मजदूरी करके अपनी बेटी को को शिक्षा दिलवा रहा है | और उसकी हर ख्वाहिश को पूरी करने की पुरजोर कोशिश करता था | पिता को मजदूरी करते इस बात का एहसास हो गया कि बिना शिक्षा इंसान को जीवन मे बहुत सारी कठिनाइयो का सामना करना पड़ता है | और अभाव मे जीना रोज एक मौत मरना जैसे है |उस वक्त ममता का आखिरी साल था फीस भरने की तारीख नजदीक आ रही थी पैसो का इंतजाम नहीं हो रहा तो ममता के पिता रामसिंह ने तब अपने  खेत को गिरवी रखा और ममता के कोलेज की फीस भरी | उस वक्त लाखो के खेत को हजारो मे गिरवी रखना पड़ा था | समय बीतता गया चार साल बाद ममता की पढाई पूरी हुई अब ममता बी .ऐ.बी.एड थी |
                        ममता ने अभी नौकरी करने का सोचा ही था की मम्मी -पापा ने अपना फैसला सुना दिया कि अब हम तुम्हारी शादी करना चाहते है और लड़का भी देख लिया है तुम भी चाहो तो देख सकती हो | लड़के के माता -पिता दोनों नौकरी करते थे और लड़का तुषार जिसने अभी -अभी इंजीनियरिग की पढाई पूरी की और एक बड़ी कम्पनी मे नौकरी लग गया था | बहुत ही नेक और संपन परिवार था | ममता ने कहा ''माता पिता अपने बच्चो के लिए अच्छा ही करते है मुझे मंजूर है जो लड़का आपने मेरे लिए देखा अच्छा ही होगा | और ममता की शादी तुषार संग हो गयी |
                     ममता का ससुराल मे सास ने बहुत स्वागत किया और सर आँखों पर बिठाया शादी के चार दिन बाद जब ममता सास के लिए चाय लेकर गयी तो सास ने ढेरो आशीष के साथ एक लिफाफा ममता के हाथ पर रखा और कहा ''ये तुम दोनों के लिए सिंगापुर जाने की टिकिट है कल निकलना है जाओ तैयारी करो | ममता को बहुत ख़ुशी हो रही थी कि सास उसे कितना प्यार करती है किते अच्छे से संभालती है सास का शुक्रिया कर के ममता जाने की तयारी मे लग गयी थी | ममता ने अपने व्यवहार से सबका दिल जित लिया समय तो चलता रही रहता है |
दो साल बाद
ममता ने घर मे बच्चे के आने की खबर सुनाई सब बहुत खुश हए पर सास लीला तो बहुत ही खुश हुई क्योंकि वो तो कब से ही इस बड़ी ख़ुशी का इंतजार कर रही थी | उसने ममता को गले लगा कर माँ बनने की और बेटे नितिन को बाप बनने की बधाई दी अब तो सास लीला ममता का खूब ख्याल रखने लगी ममता को पंलग से नीचे पैर ही नहीं रखने देती थी | लीला बेसब्री से बच्चे का इंतजार करने लगी थी | सब अच्छे से चल रहा था कि एक दिन तुषार ने माँ को कहा कि'' कल मुझे ऑफिस टूर से दिल्ली जाना है सोच रहा हूँ ममता को ले जाऊ काम ख़त्म करके थोडा हम दोनों घूम लेंगे,ममता की सास ने कहा जाओ पर समय पर खाना,नाश्ता और सोने का ध्यान रखना ,ज्यादा चलना मत बहुत सारी हिदायतों के साथ जाने की इज़ाज़त दे दी |
                      अभी कुछ रास्ता ही तय किया था कि तुषार की कार दुर्घटनाग्रस्त हो गयी जिसमे तुषार की मौत हो गयी और ममता घायल हुई | डॉ. को ममता का अर्जेंट ओपरेशन करना पड़ा क्योंकि ममता के गर्भाशय मे चोट लगने के कारण संक्रमण हो गया था | और गर्भाशय को तुरंत निकालना पड़ा | अब इसे समय का फेर ही कहेंगे की कितनी खुश थी ममता और अब पलक झपकते  ही उसका सुखी संसार उजड़ गया था | लीला बहुत दुखी हुई उस पर तो जैसे दुखो का पहाड़ ही टूट पड़ा, पर फिर भी उसने अपने आपको संभाला और ममता की देख भाल करने लगी | होश आने पर ममता ने अपने आपको अस्पताल मे पाया तो कुछ ही देर बाद उसको समझ आ गया कि उसका सब कुछ लुट गया वो रोने लगी सास ने ममता को सम्भाला |
                           अहिस्ता -अहिस्ता समय का मरहम हर घाव को भरता है जीने के लिए इंसान को अपने मन को कुछ तो तसल्ली देनी ही पड़ती है अब ममता वापस अपने पिता के घर आ गयी और शिक्षिका की नौकरी कर ली |
तीन साल बाद
अब ममता ने स्कूल मे बच्चो के साथ अपना मन लगा लिया था| और बच्चे भी अपनी ममता मैडम से बहुत प्यार करने लगे थे | स्कूल मे ममता के बिना बच्चो का मन ही नहीं लगता था | स्कूल के प्रिंसिपल भी खुश थे कि बच्चे पढाई मे रूचि ले रहे है सब अच्छे से चल रहा था कि एक दिन पडौस मे रहने वाले रामकिशन की पत्नी का अचानक दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया | अब चार बच्चो को सम्भालना रामकिशन जी के बस की बात नहीं थी | उन्होंने दूसरी शादी करने का फैसला किया |कितनी ही जगह रिश्ते की बात की पर उनकी शर्त के कारण कोई भी औरत ने हां नहीं की शर्त ये थी कि रामकिशन जी दुसरी शादी से बच्चा नहीं पैदा करेंगे |
                 ममता के तो अब ग्रभाशय ही नहीं था तो बच्चा होने वाला ही नहीं था ये बात ममता के पिता को पता चली तो उन्होंने ये बात घर मे सब के सामने रखी तो सब ने कहा ममता  रामकिशन से बहुत छोटी है और वो चार बच्चो का पिता था | ममता का मन भी अब दूसरी शादी करने का बिल्कुल भी नहीं था |वो सोचने लगी कि ये दूसरी शादी किसलिए ? पिता के घर मे बेटी का रहना आज भी बोझ समझा जाता है,या इसलिए कि रामकिशन जी के चार बच्चो को सम्भाल सकू |और बिना पैदा किये सीधा चार बच्चो की माँ बनू तो क्या बुरा है कुछ तय नहीं कर सकी थी | अगर ममता अपने पिता के घर मे रहकर जीवन काटे तो इसमें क्या बुराई थी |अब तो वो उसने स्कूल मे नौकरी भी कर ली थी |पर उसके माता -पिता का ये सोचना था कि बेटी का अपना एक ठिकाना होना चाहिये| ये कैसी सोच थी समाज वालो की उसे समझ नहीं आ रहा था, कि क्यों एक विधवा अकेले अपना जीवन नहीं बिता सकती ? और फिर ठिकाने के लिए क्या ये चार बच्चो का बाप ही मिला था | रामकिशन फिर ममता के हां- ना की परवाह किसे थी | सिर्फ हाँ बोलना था |और शादी हो गयी |
                           अब तीस साल की ममता चार बच्चो की माँ बन गयी | जीवन का रुख ही बदल गया |जो किस्मत मे था हुआ उसने भी चुप -चाप स्वीकार किया और लगी नई गृहस्थी सम्भालने शादी होने के बाद कभी उसके माता -पिता ने ये नहीं पूछा की पति और बच्चो के साथ उसका रिश्ता कैसा है |बस वो तो खुश थे कि उनकी बेटी के ठिकाना हो गया है |दिन, महीने , साल बित्तते गये पर चार बच्चो को संभालना वो भी सौतेले बड़ा कठिन काम था | सौतेली माँ के प्रति बच्चो के मन मे ये बात भर दी जाती है ,कि वो सौतेले बच्चो को प्यार नहीं कर सकती बल्कि मारती है|पर लोग ये नहीं समझते कि माँ तो माँ होती है चाहे वो सौतेली हो या खुद, की माँ के दिल मे बच्चो के लिए केवल और केवल प्यार रहता है| वात्सल्य और ममत्व का भाव रहता है माँ ही उनको आगे बढ़ने मे उनके लिए दिशा निर्धारित करने मे उनकी मदद करती है |
                     यहाँ रामकिशन के बच्चो के दिल मे भी सौतेली माँ के खिलाफ जहर भर दिया गया था| बच्चे ममता के पास भी नहीं फटकते थे| पर ममता ने धीरे -धीरे उन्हें प्यार से उनकी सोच बदल दी अब वो अपनी ममता माँ की हर बात मानने लगे अपनी माँ को अब याद नहीं करते और ममता माँ के पास ही रहते थे समय बीतता रहा अब बच्चे बड़े हो गये पढ़ -लिख लिए | बड़े बेटे नितिन की तो नौकरी भी लग गयी |नितिन की शादी का मौका था |बेटे की शादी के लिए ममता ने बहुत सारी तैयारी की पर उसने जो चाहा वो तो नहीं हुआ रामकिशन ने शादी के मांगलिक काम अपने छोटे भाई -भाभी को करने को कहा क्योंकि उनकी नजरो मे वो अब भी विधवा थी |इतने साल उनके साथ उनकी पत्नी बने रहने के बाद भी ममता के उपर से विधवा का ठप्पा नहीं हटा ये उनकी ओछी सोच थी |तो क्या रामकिशन उसे अपने बच्चो की आया समझता था ये उसकी समझ से परे था?|
                          ममता कुछ नहीं बोली चुप -चाप सहन कर लिया शादी हुई बहु भी समझदार थी और सास भी समझदार तो दोनों मे खूब पटने लगी | माँ बेटी का रिश्ता हो गया दोनों मे |बहु ने सास को आते ही कह दिया कि अब आप आराम करो बाकि सब मे सम्भालती हूँ |आप तो मुझे आदेश करो अब आप और पापा अपने लिए जिओ | बहु का प्रेम देख ममता रोने लगी | दो साल बाद ममता की बहु ने बच्चा आने की खबर सुनाई सब खुश थे | सातवा माह था बहु की गोद भराई की रश्म थी आज जैसे ही ममता ने सगुन लेकर बहु के पास जाने को कदम बढाया तभी बहु के मायके वालो मे से किसी ने कहा की आपकी कभी गोद भरी नहीं तो आप रहने दो ममता ये सहन ना कर सकी और कमरे मे जाकर रोने लगी रामकिशन ये सब देख सुन रहे थे पर शादी के वक्त भी कहाँ साथ दिया जो अब देंगे | पर ममता की बहु ने भी कह दिया कि ''मेरी गोद अगर मेरी सास नहीं भर सकती तो मुझे ये सब करना ही नहीं है, मै ऐसे ही ठीक हूँ | नितिन ने भी कहा कि कौन कहता है ममता माँ माँ नहीं है वो तो चार बच्चो की माँ है ये ना होती तो हम आज किसी बुरी सगत मे पड गये होते | ममता माँ ये सब सुन कर खुश हुई| चलो अब गोद भराई शुरू करो हम और हमारे बच्चे को आपके आशीर्वाद की जरुरत है और ममता ने सोचा कि कैसे कहू इनको सौतेले ये बच्चे तो खुद के बच्चो से भी ज्यादा प्यार करते है मुझे और ममता ने अपने पति की और देखा जैसे कह रही हो कि आप से तो आपके बच्चे अच्छे है कितना सम्मान किया है |
                     शांति पुरोहित
                                  

फिर हुई मुलाकात

                                                                                                                                                                      'क्या वक्त आया है,रिटायर जिला-शिक्षा अधिकारी को अब टीचर नहीं पहचानता है | मैडम शर्मा ने ये मैडम माथुर को नहीं कहा,पर मन ही मन सोच रही है |'जब वो कैमेस्ट्री की टीचर माथुर के पास अपनी पोती रश्मि को टयूसन पढ़ाने की बात करने को गयी |'
                               'क्या आप अपने तीन ग्रुप मे एक और, लड़की को नहीं पढ़ा सकती,ये तो बड़ी हैरानी की बात है|...आपसे इस जवाब की अपेक्षा कतई नहीं थी |'मैडम शर्मा ने कहा |
                                 'अब आपसे क्या कहूँ मैडम ,टाइम होता तो आपको निराश नहीं करती | स्कूल से आने के बाद घर की,बच्चो की जिम्मेदारी,पूरी करने के बाद ये तीन ग्रुप को मुश्किल से पढ़ा पाती हूँ | और, एक लड़की की जिम्मेदारी नहीं ले सकती |'मैडम माथुर ने अपनी सफाई दे दी और चुप होगयी |
                                     'आपका कहना अपनी जगह पर बिलकुल सही है,पर मै भी, अपनी विवशता के कारण आपके पास आई| मेरी अब वृद्धा अवस्था है |.....रोग ने जकड़ लिया है | कुछ समय पहले दिल का दौरा पढ़ा तो डॉ. ने आराम करने को बोल दिया | नहीं तो मै आपको तकलीफ देने नहीं आती |' खैर,जाने दो टाइम-टाइम की बात है,मेरी जगह अभी आपका कोई परिचित होता तो ,टाइम का बहाना बना कर टाल देती आप ?
                                   थैंक्स टॉक टू मी,और वर्दधा अपनी पोती का हाथ पकड कर धीरे-धीरे कमरे से बाहर आ गयी |
                                    लम्बा-गोरा,पतला शरीर ,चौड़ा ललाट,चेहरे पर गजब का तेज,मैडम शर्मा अपनी पोती के साथ आकर गाड़ी मे बैठ कर चली गयी |
                                      घर आकर थकान के कारण पलंग पर तकिये के सहारे लेट गयी | विचारो की श्रंखला शुरू हो गयी |अपने ज़माने की मशहूर कैमेस्ट्री की टीचर,मिस शाह ने बी. एस. सी. किया ऍम.एस. सी.किया | पिता की आर्थिक हालत ठीक नहीं होने से जल्दी ही सरकारी टीचर की नौकरी करनी पड़ी | सपना तो कॉलेज लेक्चरर बनने का था | पर अगर कोई किसी चीज को पाने की ठान ले तो पाकर रहता है | मिस शाह ने कड़ी मेहनत करके ''लोक सेवा आयोग'' से फर्स्ट ग्रेड परीक्षा पास करी और स्कूल लेक्चरर बन गयी |
                            स्कूल मे एक-एक लड़की को कैमेस्ट्री समझाती और सवालों का हल करती थी | दिन भर वो अपने घर मे भी लडकियों को पढने को बुलाती थी | जो लडकिया पढने मे कमजोर होती उन पर तो विशेष ध्यान देती | लडकिया भी निसंकोच मैडम के घर पढने के लिए जाती थी | किसी से कोई पैसा नहीं लेती | विधा-दान करना ठीक समझती,बजाय विधा को बेचने |
                              उन्ही दिनों उसके लिए लड़के की तलाश भी होने लगी | वो अभी शादी नहीं करना चाहती थी ,पर माता-पिता के आग्रह को टाल भी नहीं सकती थी | और वन-विभाग के फारेस्ट-अधिकारी मिस्टर शर्मा के साथ उसकी शादी हो गयी |अब वो मिस शाह से मिसेज शर्मा बन गयी |
                               जहाँ भी जिस भी स्कूल मे उसकी पोस्टिंग हुई,वहां लडकियों की सबसे अच्छी टीचर बन कर रही | बड़ी कुशलता के साथ पढ़ाती थी | अपनी मेहनत के कारण उसने खूब नाम कमाया |अब वो सीनियर स्कूल की प्रिंसिपल है | हर साल उसके स्कूल की लडकियों ने राज्य मे पोजीशन हासिल करी| साथ ही स्कूल की अन्य गतिविधियों मे भी लडकियों ने अपना और स्कूल का नाम रौशन किया | अंत मे मैडम शर्मा प्रमोशन लेते-लेते जिला-शिक्षा अधिकारी की पोस्ट से रिटायर हुई |
                          अब ढलती उम्र मे अपने परिवार के साथ सुख-चैन का जीवन अपने अपनों के साथ बसर कर रही है | एक पुत्र- और एक पुत्री,पति बस यही उनका परिवार;पुत्री अपने ससुराल और पुत्र अपने परिवार के साथ ही रहता है | एक पौत्र-पौत्री है जो इनकी आँखों के तारे,इनके जीने का सुखद अहसास भी है | पुत्र अकाउंटेंट है| पुत्र-वधु कुशल गृहणी के साथ एक अच्छी बहु,पत्नी और माँ है |
                         पौत्री रश्मि अपनी दादी से ही पढना चाहती थी | अपनी तकलीफ के कारण अभी नहीं पढ़ा सकती इसलिए उसकी स्कूल की टीचर के पास बात करने गयी | पर सब बेकार ! रश्मि ने कहा 'आप कब तक ठीक होगी?' 'क्या बताऊ , बेटा डॉ . ने और, एक महिना आराम करने को कहा है | तब तक तुम रुक जाओ फिर मै सारा कोर्स करवा दूंगी |' मिसेज शर्मा ने कहा | ' पलंग पर लेटी है मिसेज शर्मा, और सोच रही है कि मैंने पहले ही कहा था बेटे से कि अब रिटायर होने के बाद कौन पहचानेगा मुझे ! विचारो की श्रंखला उसे अतीत की यादो मे ले गयी |
                                पापा के पास कितने सारे लड़के-लडकिया दिन भर आते रहते थे | कभी किसी को नहीं निराश नहीं किया सबको गणित सीखने मे उनकी भरपुर मदद करते थे | गणित पर उनका बहुत कंट्रोल था | बहुत सारे पढने वाले बच्चो को गणित मे निपुण किया था | बिना कोई पैसा लिए |
                              माँ बहुत नेक दिल और धरम-परायण थी | पति से उनको कभी कोई शिकायत नहीं रही ,जो कुछ पति ने लाकर दिया,उसी मे संतोष के साथ अपना गुजरा किया | ये सब सोचते-सोचते कब उसकी आँख लग गयी पता ही नहीं चला | उठी तब तक शाम हो गयी थी |
                               मिसेज शर्मा मिसेज माथुर की माँ की कॉलेज टाइम की दोस्त थी ,जब मिसेज शर्मा उनके घर से निकल रही थी,तो उन्होंने बात करनी चाही ,पर तब तक मिसेज शर्मा निकल गयी थी | 'बेटा मिसेज शर्मा जो तुम्हारी गुरु भी है, आज इनके आने से तुम्हे गुरु सेवा करने का मौका मिला | तुम बहुत भाग्यशाली हो |' 'वो अपनी पोती के लिए टयूसन की बात करने आई,मैंने तो पहचाना नहीं और मना भी कर दिया |'कहा मैडम माथुर ने | और अब मुझे उनके घर जाकर माफ़ी मंगनी होगी |' 'माफ़ी तो तुझे माँगनी पड़ेगी,जब तुम उनकी स्टूडेंट थी ,तो कितनी मेहनत की,कि तुम्हे अच्छी पोजीशन मिले ! अब जब तुम्हे अपना फर्ज अदा करने का अवसर मिला तो तुमने उन्हें पहचाना तक नहीं |'
                              मैडम माथुर शाम होने का बेसब्री से इन्तजार करने लगी | ठीक छ बजे वो मैडम शर्मा के घर पहुँच गयी | डोर बेल बजने पर नौकर ने दरवाजा खोला 'कहिये किससे मिलना है|'मैडम से , वो उसे मैडम के कमरे मे ले गया | मैडम माथुर अपनी गुरु के पैरो मे गिर कर माफ़ी मांगने लगी | अरे ! आप , माफ़ी क्यों मांग रही है,आपने पढाने से इंकार करके कोई गुनाह नहीं किया ,मै समझ सकती हूँ वक्त की कमी के कारण ऐसा किया है आपने ,मुझे बिलकुल बुरा नहीं लगा | बल्कि अच्छा लगा कि आपने पता चलते ही अपनी गलती मान कर माफ़ी मांगने मेरे पास आयी,
                             'आपने मेरी कितनी मदद करी कि,मै कैमेस्ट्री मे विशेष योग्यता हासिल कर सकू,आज मै जो कुछ हूँ,आपके कारण हूँ | 'आप अपनी रश्मि को अपनी इस शिष्या के पास पढने को जरुर भेजना | तभी मै समझूंगी कि,आपने मुझे माफ़ कर दिया है | जो पहले कहा उसे भूल समझ कर माफ़ करना | 'इसमें माफ़ी मांगने जैसी कोई बात नहीं है | पर एक बात आपसे कहना चाहती हूँ |' 'जी , कहिये , मै चाहती हूँ कि आप हर साल कम-से-कम दस लडकियों को निशुल्क पढाये | जो पैसा भर नहीं सकती | मैंने पता लगाया है कि आपके पास जितनी लड़कियां आती है ,उनमे से कुछेक को छोड़ कर बाकी सब माध्यम परिवारों से है | आप खुद
सोचिये,कितनी मुश्किल से उनके माँ-बाप पैसो का इंतजाम करते होंगे |'
                       'ठीक है मैडम, अगले साल से दस लडकियाँ बिना पैसो के पढाऊगी ,और ये आपको मेरी गुरु दक्षिणा होगी | आप अपनी पौत्री को कल से जरुर भेजना, और हां आप से मै पैसा नहीं लुंगी |
                       ''अब ये सब छोड़ो चाय-नाश्ता करो,जब से आयी हो माफ़ी मांग रही हो | तुम अपनी गुरु के घर पहली बार आयी हो ,मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है | 'तुम्हे याद है,तुम मेरी सबसे चहेती छात्रा थी | पर तुम्हे कैमेस्ट्री मे रूचि कम थी,मेरे कहने से ही तुमने लिया था,और खूब मेहनत करके विशेष योग्यता भी हासिल करी |' तब तक रश्मि के पापा -मम्मी भी आ गये थे | सब ने मिलकर चाय-नाश्ता किया , थोड़ी देर मैडम शर्मा ने मैडम माथुर से बाते की,इतने सालो बाद मिलकर दोनों बहुत खुश थी | बहुत ही खुशनुमा माहौल से दोनों की मुलाकात खत्म हुई |
              शांति पुरोहित
                             

ये कैसी श्रद्धा

               ये कैसी श्रद्धा                                                                                                                                                                       प्रकाश के पिताजी ने अपने जीवन मे ये प्रत्यक्ष अनुभव किया है, कि जब हम पशु-पक्षी को रोज दाना डालते है ,रोटी खिलाते है तो ; वे रोज हमारा उस वक्त इंतजार करते है | गाय की पीठ पर रोज दस मिनिट हाथ फिराने से मनुष्य के शरीर मे रक्त संचार कम- ज्यादा नहीं रहता है | गाय को रोज नियमित समय पर रोटी खिलाने से अकाल मौत टल जाती है |
                     प्रकाश के पिता इस काम को नियमित रूप से करते, चाहे कितना ही जरुरी काम क्यों ना हो | यही संस्कार उन्होंने अपने बेटे प्रकाश को दिए | जब प्रकाश पांच साल का तब से पिता जी के साथ पशु-पक्षियों को दाना डालने,उनको रोटी खिलाने जाने लगा था |
                     प्रकाश के पिताजी का मानना था कि इनकी सेवा के साथ-साथ अपने आस-पास कोई दुखी है, तो उनकी सेवा करना इंसान का प्रथम कर्तव्य होना चाहिये |
                     प्रकाश अपने पिता के दिए इन्ही संस्कारो के साथ बड़ा हुआ है | प्रकाश बैंक मे प्रबंधक के पद पर काम करता है ;पर उसने गाय,कुत्ते ,बिल्ली और पक्षियों की सेवा करना नहीं छोड़ा है|
                      प्रकाश की पत्नी स्कूल मे टीचर है ;पर अपने पति के इस नेक काम मे वो भी साथ देती है | पर उसके मन मे हमेशा एक सवाल आता है, कि इंसान को पशु पक्षियों की सेवा से ज्यादा गरीब और लाचार इंसानों की सेवा करनी चाहिए  पर प्रकाश का कहना है ''भगवान ने इंसान को हाथ-पैर दिए है वो कमा कर खा सकता है \| प्रकाश ने इस काम के लिए एक काम वाली बाई  रखी है जो सुबह-शाम रोटियाँ बनाती है | सौ रोटी सुबह और उतनी ही शाम को चाहिए थी | प्रकाश और शीला दोनों शाम को ये सारी रोटिय अपने हाथो से जानवरों को खिला कर आते है |      
                                                                                        ये उनका का रोज का काम था| वैसे तो प्रकाश खुद आर्थिक रूप से सक्षम था| पैसे की उसके पास मे कोई कमी नहीं, पर कोई अपनी इच्छा से सेवा के लिए कुछ
देना चाहता तो ;वो मना नहीं करता था |
                       
                   आज बारिश बहुत तेज हो रही थी ;ऐसा लग रहा है जैसे सारा शहर पानी मे डूबा हुआ है | प्रकाश की पत्नी शीला सोच रही है कि आज काम वाली बाई आएगी कि नहीं | और आएगी भी तो कैसे ! बारिश तो थमने का नाम ही नहीं ले रही थी | सब अपने घरो मे बैठे बारिश के थमने का इंतजार कर रहे थे |
                    प्रकाश और शीला भी बारिश के थमने का इंतजार कर रहे है | प्रकश का मन आज दुखी हो रहा है क्योंकि आज गाय,कुत्ते बिल्ली और सारे पक्षी भूखे बैठे उसका इंतजार कर रहे होंगे | कभी ऐसा नहीं हुआ  पर प्रक्रति के आगे आज वो मजबूर है |
                             शीला ने देखा कि इतनी बारिश मे कामवाली बाई आई है | पर प्रकाश ने आज रोटी बनवाने से इंकार कर दिया, कहा की ''आज रहने दो  मत बनाना बारिश मे कैसे जा सकूंगा |''
                             शीला ने देखा कामवाली बाई कुछ परेशान लग रही है | आज तो रोटी बनाने के काम से आजादी मिली है, फिर भी दुखी क्यों है? ''क्यों क्या हुआ ? पूछा शीला ने | तब कामवाली बाई ने कहा ''साब ने तो रोटी बनाने को मना कर दिया तो मुझे लगता है की आज मेरे बच्चे क्या खायेंगे शायद भूखा ही सोना पड़ेगा? '' शीला ने कामवाली बाई को कहा हुआ था की तुम अपने बच्चो के लिए भी रोटी बना कर ले जाया करो |प्रकाश को शीला ने इस बारे मे बताया नहीं था |
                                   कामवाली बाई, का पति बीमारी से जुज रहा था | और ये घरो मे काम कर के थोडा बहुत कमा लेती है तो शीला ने सोचा रोटी यहाँ से ले जायेगी तो इसको काफी मदद होगी | शीला ने कामवाली बाई को पचास रूपया दिया और कहा ''अपने बच्चो के लिए कुछ ले जाना | कामवाली बाई ने शीला को ढेरों आशीष दिया |और कहा कि आपके कारण मेरे बच्चे आज भी खाना खाकर सोयेगे | आपके दिल मे हम गरीबो के लिए कितनी दया है आपको ऊपर वाला खुश रखे और वो अपने घर चली गयी |  
शांति पुरोहित