Saturday, 26 October 2013

ये कैसी श्रद्धा

               ये कैसी श्रद्धा                                                                                                                                                                       प्रकाश के पिताजी ने अपने जीवन मे ये प्रत्यक्ष अनुभव किया है, कि जब हम पशु-पक्षी को रोज दाना डालते है ,रोटी खिलाते है तो ; वे रोज हमारा उस वक्त इंतजार करते है | गाय की पीठ पर रोज दस मिनिट हाथ फिराने से मनुष्य के शरीर मे रक्त संचार कम- ज्यादा नहीं रहता है | गाय को रोज नियमित समय पर रोटी खिलाने से अकाल मौत टल जाती है |
                     प्रकाश के पिता इस काम को नियमित रूप से करते, चाहे कितना ही जरुरी काम क्यों ना हो | यही संस्कार उन्होंने अपने बेटे प्रकाश को दिए | जब प्रकाश पांच साल का तब से पिता जी के साथ पशु-पक्षियों को दाना डालने,उनको रोटी खिलाने जाने लगा था |
                     प्रकाश के पिताजी का मानना था कि इनकी सेवा के साथ-साथ अपने आस-पास कोई दुखी है, तो उनकी सेवा करना इंसान का प्रथम कर्तव्य होना चाहिये |
                     प्रकाश अपने पिता के दिए इन्ही संस्कारो के साथ बड़ा हुआ है | प्रकाश बैंक मे प्रबंधक के पद पर काम करता है ;पर उसने गाय,कुत्ते ,बिल्ली और पक्षियों की सेवा करना नहीं छोड़ा है|
                      प्रकाश की पत्नी स्कूल मे टीचर है ;पर अपने पति के इस नेक काम मे वो भी साथ देती है | पर उसके मन मे हमेशा एक सवाल आता है, कि इंसान को पशु पक्षियों की सेवा से ज्यादा गरीब और लाचार इंसानों की सेवा करनी चाहिए  पर प्रकाश का कहना है ''भगवान ने इंसान को हाथ-पैर दिए है वो कमा कर खा सकता है \| प्रकाश ने इस काम के लिए एक काम वाली बाई  रखी है जो सुबह-शाम रोटियाँ बनाती है | सौ रोटी सुबह और उतनी ही शाम को चाहिए थी | प्रकाश और शीला दोनों शाम को ये सारी रोटिय अपने हाथो से जानवरों को खिला कर आते है |      
                                                                                        ये उनका का रोज का काम था| वैसे तो प्रकाश खुद आर्थिक रूप से सक्षम था| पैसे की उसके पास मे कोई कमी नहीं, पर कोई अपनी इच्छा से सेवा के लिए कुछ
देना चाहता तो ;वो मना नहीं करता था |
                       
                   आज बारिश बहुत तेज हो रही थी ;ऐसा लग रहा है जैसे सारा शहर पानी मे डूबा हुआ है | प्रकाश की पत्नी शीला सोच रही है कि आज काम वाली बाई आएगी कि नहीं | और आएगी भी तो कैसे ! बारिश तो थमने का नाम ही नहीं ले रही थी | सब अपने घरो मे बैठे बारिश के थमने का इंतजार कर रहे थे |
                    प्रकाश और शीला भी बारिश के थमने का इंतजार कर रहे है | प्रकश का मन आज दुखी हो रहा है क्योंकि आज गाय,कुत्ते बिल्ली और सारे पक्षी भूखे बैठे उसका इंतजार कर रहे होंगे | कभी ऐसा नहीं हुआ  पर प्रक्रति के आगे आज वो मजबूर है |
                             शीला ने देखा कि इतनी बारिश मे कामवाली बाई आई है | पर प्रकाश ने आज रोटी बनवाने से इंकार कर दिया, कहा की ''आज रहने दो  मत बनाना बारिश मे कैसे जा सकूंगा |''
                             शीला ने देखा कामवाली बाई कुछ परेशान लग रही है | आज तो रोटी बनाने के काम से आजादी मिली है, फिर भी दुखी क्यों है? ''क्यों क्या हुआ ? पूछा शीला ने | तब कामवाली बाई ने कहा ''साब ने तो रोटी बनाने को मना कर दिया तो मुझे लगता है की आज मेरे बच्चे क्या खायेंगे शायद भूखा ही सोना पड़ेगा? '' शीला ने कामवाली बाई को कहा हुआ था की तुम अपने बच्चो के लिए भी रोटी बना कर ले जाया करो |प्रकाश को शीला ने इस बारे मे बताया नहीं था |
                                   कामवाली बाई, का पति बीमारी से जुज रहा था | और ये घरो मे काम कर के थोडा बहुत कमा लेती है तो शीला ने सोचा रोटी यहाँ से ले जायेगी तो इसको काफी मदद होगी | शीला ने कामवाली बाई को पचास रूपया दिया और कहा ''अपने बच्चो के लिए कुछ ले जाना | कामवाली बाई ने शीला को ढेरों आशीष दिया |और कहा कि आपके कारण मेरे बच्चे आज भी खाना खाकर सोयेगे | आपके दिल मे हम गरीबो के लिए कितनी दया है आपको ऊपर वाला खुश रखे और वो अपने घर चली गयी |  
शांति पुरोहित     

पछतावा

पछतावा
पति कि असामयिक मौत के बाद देवयानी के जीने का एक मात्र सहारा उसकी बेटी ही थी;जो अभी एक साल की थी | अपने ही पति कि मौत का इल्जाम देवयानी के सर पर लगा कर सास -ससुर ने तो उससे रिश्ता ही तोड़ लिया | उसे ''भाग्यहीन, कह कर घर से निकल जाने को कह दिया |
                               देवयानी के सामने अपनी नन्ही बेटी नीलू के भरण पोषण का सवाल खड़ा था | मेहनत मजदूरी करने के आलावा देवयानी के सामने और कोई रास्ता ही नहीं बचा था | पढ़ी-लिखी जो नहीं थी | माँ-बेटी दोनों एक दूसरे का सहारा थी | नीलू पढ़ -लिख कर कुछ बन जाये,देवयानी ने इसे अपने जीने का उद्देश्य बना लिया | भविष्य में कुछ भी अनचाहा घट जाये तो उससे निपटने के लिए खुद को सक्षम होना ही चाहिये |
                              दिन,महीने, साल बीतते गये,नीलू ने सीनियर दूसरी पोजीशन के साथ उतीर्ण करी | नीलू ''इंटरनेशनल लॉ '' करना चाहती थी;इसके लिए नीलू ने ''प्रवेश परीक्षा'' भी उतीर्ण कर ली थी | ''पुणे इंटरनेशनल लॉ '' कॉलेज मे उसका चयन हो गया | माँ-बेटी दोनों खुश थी | नीलू कॉलेज जाने के लिए सुबह सात बजे निकलती और घर पहुंचते-पहुँचते उसे रात हो जाती |
                                देवयानी रोज गुस्सा करती,''सुबह सात बजे से रात की आठ बजे तक कौनसा कॉलेज खुला रहता है?,आधुनिक विचारो वाली बेटी, माँ को ये कह कर, चुप करा देती की माँ ,'तुम तो मुंबई आकर भी देहाती ही रही;कुछ भी तो नहीं बदली|,आहत हुई देवयानी सिर्फ इतना ही कहती ''मैंने तुमसे ज्यादा दुनिया देखी है |'
                                'माँ गाँव मे दस साल रहना, और मुंबई मे एक साल तक रहना बरोबर है |,कहा नीलू ने | 'तुम तो यहाँ भी वो ही तेहती कपडे पहनती हो;वो ही देहाती बोली बोलती हो| सच कहूँ ,तो मुझे मेरे दोस्तों को घर लाने मे शर्म आती है | ये सब सुन कर देवयानी को दुःख होता;पर क्या करे ! बेटी कुछ ज्यादा ही समझदार हो गयी,मुंबई मे जो पढने लगी है | मुंबई कि हवा ने नीलू को पूरा ही बदल दिया था |
                                 अब नीलू कि पढाई का आखिरी साल बचा था | रिश्ते भी आने शुरू हो गये थे ;पर नीलू इंकार कर दिया | देवयानी ने सोचा अगला साल पढने का आखिरी साल है तब हां बोल देगी | समय बीतता रहा |एक दिन नीलू जल्दी घर आगयी,चेहरा सूजा हुआ,आँखे रोई हुई थी | ''क्या हुआ बेटा कुछ हुआ क्या कॉलेज ,नहीं कुछ नहीं हुआ |,नीलू अपने कमरे मे और देवयानी अपने कमरे मे चली गयी |पर देवयानी का पूरा ध्यान बेटी पर लगा रहा |
                              नीलू को सुबह उठने के साथ वोमेटिग हुई | फिर फ्रेश हो कर माँ के साथ चाय पीने बैठी | देवयानी ने कहा ''यहाँ मुंबई शहर मे हर किसी से गलती हो जाती है तुमसे भी हुई है कल मेरे साथ अस्पताल चलना ,तुम्हे छुटकारा मिल जायेगा और देरी हो गयी तो जन्म दे देना | मै हर पल तुम्हारे साथ हूँ | जो हुआ उसको ले कर घबराना नहीं,मै अपना बच्चा,यानि तुम्हे नहीं खोना चाहती हूँ |
                                नीलू ने कहा ''माँ देहाती तुम नहीं मै हूँ | तुम तो कितनी समझदार हो ! नीलू माँ के गले लग कर बहुत देर तक रोई | अब तक जो कुछ माँ को कहा नीलू को पछतावा होने लगा | मै ,न तो देहाती हूँ ;ना समझदार हूँ ;मै तो बस एक माँ हूँ जोअपने बच्चे के चलने मात्र से जान जाती है की उसे क्या परेशानी है | नीलू माँ से लिपट कर रोने लगी थी |

                           


उतराखंड त्रासदी - धार्मिक अनुष्ठान तथा मानवीय संवेदनाये

           उतराखंड त्रासदी -धार्मिक अनुष्ठान तथा मानवीय संवेदनाये                                                                                                                                                          आज इकीसवी सदी का इंसान वापस आध्यात्मिकता की और जा रहा है| अपने भाग्य को और अच्छा बनाने के लिए मानव ,विभिन प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान करता है;और वो भी तीर्थ स्थान मे जाकर करता है| धारणा ये है कि,जो इन्सान तीर्थ स्थान पर जाकर धार्मिक अनुष्ठान करता है उसका भाग्य जयादा अच्छा रहता है|
                   भाग्य दो प्रकार के होते है|
                              १ - सौभाग्य
                              २ -दुर्भाग्य
          सौभाग्य- दुर्भाग्य का पता तो तभी चलता है,जब भाग्य अपना परिणाम दिखाता है| अभी इसी जून माह मे जो लोग अपने घर से चार धाम यात्रा -बद्रीनाथ,केदारनाथ,गंगोत्री और यमुनोत्री के लिए निकले,तो उस समय उन्हें अपने भाग्य पर गर्व हो रहा था| और जो किसी कारण वश नहीं जा सके वो लोग अपनी किस्मत को कोस रहे थे|
                        पर वहां पर जो त्रासदी हुई;उसके कारण तो भाग्य की परिभाषा ही बदल गयी| जो गये वो अपने आप को दुर्भाग्य शाली समझ रहे थे| जो नहीं गये सौभाग्य शाली मान कर खुश हो रहे थे|
                          देश के प्रति सजग मिडिया ने जब केदारनाथ मे हुई त्रासदी के समाचार और फोटो दिखाए तो आँखों से आंसू रोके नहीं रुक रहे थे| बस जैसे घर मे बैठ कर आंसुओ का सैलाब आ गया हो| कितने छोटे-छोटे बच्चे अनाथ हो गये; और कितनी माताओं के सामने उनके जिगर के टुकड़े उनके मासूम बच्चे पानी की तेज धार मे बह गये|
                         इतने छोटे बच्चो को तीर्थ मे ले जाने का क्या अर्थ है| तीर्थ मे तो वानप्रस्थ अवस्था मे आये लोगो को ही जाना चाहिए| जिन्होंने अपनी गृहस्थी की समस्त जिम्मेदारिया पूर्ण कर ली हो|
                         जो लोग त्रासदी के कहर से किसी तरह अपनी जान बचा कर आये है| वो आज भी पूरी नींद सो नहीं पा रहे है| उनकी आँखों के सामने वो ही खौफनाक मंजर घुम रहा है| आज भी बहती हुई लाशे दिखाई दे रही है|
                      सेना के जवानो ने बहुत मदद की है| उनकी जितनी तारीफ की जाये कम है| पर लोग इतने है कि किसको बचाये,किसको छोड़े| सेना के जवान औरतो,बच्चो और बुजुर्गो को निकाल कर सुरक्षित स्थान पर पहुंचा रहे है| अगर आदमी लोग वहां से बच कर नहीं आये तो,बच कर आने वाली औरतो,बच्चो की जिन्दगी अपने आदमियो के बिना बदतर हो जाएगी|
                      पर सोचने वाली बात है, कि इतनी बड़ी आपदा मे भी लोग सियासत करना नहीं छोड़ते है| -राजनेता -मिडिया वाले -बचे हुए दुकानदार और कुछ आर्मी वाले| इन सबके बारे मे जो बाते सुनी- सुनकर बहुत दुःख हुआ| कैसी अमानवीयता है, इन लोगो मे कि लाशो के ढेर पर भी अपनी रोटिया सेंक रहे है|
                    जब सोनिया गाँधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उतराखंड का हवाई दौरा किया तो सवाल उठा युवराज को विदेश मे ही रहने दो उनको यहाँ की तखलीफ़ से क्या मतलब है| मुझे ये समझ नहीं आ रहा है कि इतनी बड़ी आपदा के वक़्त भी लोगो का ध्यान इन बातो की और कैसे जाता है|
                     गुजरात के मुख्या मंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा 'गुजरात मे तखलीफ़ आयी तो मैंने एक दिन मे हजारो लोगो को बचया था| तो यहाँ वो किसके आमन्त्रण का इंतजार कर रहे है| उन्होंने त्रासदी से पीड़ित लोगो को बचाने के बजाय केदारनाथ के मंदिर को बनवाने का प्रस्ताव उतराखंड के मुख्या मंत्री के समक्ष रखा|
                अगर मिडिया वाले सजग नहीं होते तो हम कभी इतना सब कुछ नहीं देख पाते| वो बहुत कुछ दिखाते है| पर वो भी दो मिनिट की न्यूज़ दिखाते है विज्ञापन ज्यादा दिखाते थे| शायद न्यूज़ एजेंसिया भी इस वक़्त इस बारे सोचना भूल गये हो| पर लोगो को इससे मानसिक थकान और गुस्सा ज्यादा आता था|
                कोई एक भी ऐसा न्यूज़ चैनल नहीं है जो ये समझे की जो घर मे बैठ कर आँखे फाड़-फाड़ कर अपने अपनों की खबर पाने के लिए टीवी के सामने बैठे है| निरंतर उनकी आँखों से आंसू बह रहे है| पर नहीं कोई नहीं समझता उनकी पीड़ा|
                जो तीर्थ यात्री उस भयंकर त्रासदी से बच कर आये और उन्होंने बताया कि ऐसे समय भी कुछ लालची लोगो ने अपना लालच बरकरार रखा एक पानी की बोतल १०० रुपया मे और एक ५ रुपया वाला बिस्किट का पैकेट ५० रुपया मे देते हए उनकी रूह बिलकुल भी नहीं कांपी? सुनकर आत्मा सिहर जाती है कि क्या मानवीय संवेदनाये बिलकुल नहीं बची| मौत के ऐसे भयानक तांडव मे फंसे लोगो के साथ ऐसे कैसे कर सकते है| क्या उनमे मानवोचित भावनाए नहीं है| या वो जड़ थे| लोग क्यों इतना पाप करते है?
                   नेपालियों मे तो जैसे मानवीय संवेदना मर ही गयी| यात्रा मे फंसी परेशान औरतो को जंगलो मे ले जाकर उनकी इज्ज़त पर ही डाका डाल दिया| उनको ऐसे वक़्त मे भी भगवान का डर नहीं लगा| तो कभी ना कभी तो भगवान अपना प्रकोप दिखाते ही है| केदार नाथ का मंदिर वैज्ञानिक कारणों से बचा है पर लोगो ने इसमें भी अन्धश्र्धा फैलाई पर गौरी कुंड के गौरी मंदिर का महत्व कम तो नहीं है फिर वो क्यों नहीं बचा पूरा का पूरा पानी मे बह गया
                    एक छोटी सी बच्ची से जब मिडिया वालो ने बात की, तो उसने बताया कि ''मै और मेरा भाई परिजनों से आगे निकल गये थे| रस्ते मे देखा एक पांच साल का बच्चा पानी-पानी करता मर गया| वहां पर और भी बहुत सारे बुजुर्ग लोग फंसे हुए पानी-पानी कर रहे थे| पास ही कुछ सेवादार बैठे बतिया रहे  थे| बालिका ने छह किलोमीटर दूर झरने से पानी लाकर उन सब की जान बचाई| और समर्थ लोग बैठे रहे| '
                     दुकान वालो ने लागत से ज्यादा पैसा लेकर ऐसे समय मे पीड़ित लोगो को लुटा| क्या भगवान ऐसे लोगो को कभी माफ़ करेंगे ? शायद कभी नहीं| आने वाले दिनों मे क्या होने वाला है? पता नहीं| पर इन सब से सीखने वाला सबक येही है कि जियो तो ऐसे जियो कि अपने अपनों की वेदना को संवेदना बना कर हर सम्भव उनकी मदद को तत्पर रहो| बाकि सब तो उपर वाले के हाथ है|
    शांति पुरोहित 

बाते बाल मन की ..



                      बाते बाल मन  की                                                                                                                                                           सरिता का सब कुछ खत्म हो चूका था,पूरी दुनिया जैसे उसके लिए वीरान  हो गयी थी | अब वो कुछ तय नहीं कर पा रही थी, कि उसका पति राम लाल तीन बच्चो को उसके भरोसे छोड़ कर गया है, वो कैसे उनको संभालेगी | वो पढ़ी -लिखी भी नहीं है | बस सरिता रोज रोती जरुर है |एक महीने पहले उसके पति रामलाल की लंबी बीमारी के बाद मौत हो गयी थी |
                     सरिता के पति, ने जो कुछ कमाया था, उसमे से सरिता जो बचत करके रखती थी,वो सब पति की बीमारी मे खर्च हो गये थे | वैसे भी राम लाल एक प्राइवेट कंपनी मे सहायक कर्मचारी ही था, बहुत कम वेतन मिलता था,इतने कम वेतन मे घर चलाना राम लाल के लिए एक चुनौती से कम नहीं था | पर राम लाल ने इस चुनौती से निपटने के लिये रिश्वत लेने का रास्ता अपना लिया | वो काम के लिए ऑफिस मे                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             आने वाले हर व्यक्ति से कुछ पैसे लेकर अपने बॉस से मिलवा देता था | ईमानदारी से कब किसका पेट भरा है, मंत्री से संतरी तक सब रिश्वत लेते है | तो वो किसलिए ईमानदारी दिखाए और क्यों दिखाए ?
                       पर सरिता को पति का रिश्वत लेना बिलकुल भी ठीक नहीं लगता था | सरिता अपने पति से रोज ही कहा करती थी, कि ईमानदारी की कमाई इंसान के जीवन मे खुशिया बिखेरती है और बेईमानी से कमाया गया धन इंसान को कभी चैन से जीने नहीं देता है | जिस रास्ते आता है उसी तरह जाने का भी रास्ता निकाल ही लेता है पर सरिता के पति ने सरिता की बात को कभी तव्वजो नहीं दी| पर आखिर वही हुआ रामलाल को कैंसर जैसी जान लेवा बिमारी हुई और उसके इलाज मे कमाया हुआ सारा पैसा खर्च हो गया |
                      सरिता के तीन बच्चे थे बड़ी बेटी,बड़ी क्या सिर्फ दस साल की थी निशा,और उससे छोटे दो भाई थे | जब भी होली आती सरिता के दोनों बेटे मिठाई के लिए रोते पर बेटी कभी नहीं रोती, और दीवाली आती तो नये कपडे और फटाको के लिए रोते | बच्चो को रोते देख सरिता भी रोने लगती,पर रोने से कब किस समस्या का हल हुआ है कुछ करना ही पड़ता है | सरिता ने आस-पास के घरो मे चार घंटे सुबह और चार घंटे शाम को सफाई का काम शुरू किया | गरीब के बच्चो के बचपन कहाँ होता है | जब माता -पिता मजदूरी करने जाते है और उनके बड़े बच्चे घर पर रह कर छोटे बच्चो को सम्भाले है | गरीब, के बच्चे पढना चाहे तो भी धन की कमी उन्हें कहाँ पढने देती है | निशा अपने पडौसियो के बच्चो को स्कूल जाते देखती थी, तो मन करता है वो भी पढने जाये पर कैसे ! दो छोटे भाइयो को कौन संभालेगा | निशा रोज स्कूल के पास जाकर खड़ी हो जाती थी,और ध्यान से बच्चो को पढ़ते हुए देखती थी | एक बार स्कूल के एक अध्यापक ने उसे कहा ''बेटा तुम स्कूल मे आकर पढ़ सकती हो,निशा ने कहा 'नहीं आ सकती  मेरी माँ कमाने जाती है, और मै घर मे रह कर भाई को संभालती हूँ | बच्ची की बाते सुन कर उन्होंने कुछ तय किया और दुसरे दिन जब निशा स्कूल के बाहर आयी तो उस अध्यापक ने उसे किताबे,कापी और पेन्सिल दी और कहा कि अब जाओ घर पर इनसे पढना,और कुछ समझ ना आये तो मुझसे पूछना | निशा बहुत खुश हुई थी |
                               अब निशा भाई को सभालने के साथ पढने भी लगी | पर भाइयो को हर होली,दीवाली पर मिठाई के लिए रोते देख कर उसने कुछ तय किया | और एक दिन जब सरिता काम करके घर आई तो देखा निशा घर पर न, तो माँ को फिक्र तो होगी ही ना | निशा एक मिठाई वाले की दुकान पर गयी और कहा ''मुझे कुछ काम दे दो?, मालिक ने कहा ''कितनी छोटी हो ? क्या काम करोगी ? पर उसने कहा 'कोई तो काम होगा जो मै कर सकूं ? मालिक ने कहा तुम्हे काम देकर मुझे जेल नहीं जाना है | बाल मजदूरी कराने वाले को जेल जाना पड़ता है| पर फिर कहा ठीक है, एक काम है तुम डिब्बो मे मिठाई भरने का काम करना लेकिन गोडावन मे बैठ कर के करना है |
                        निशा जब सब तय करके घर गयी तो माँ को अपना इंतजार करते पाया | माँ को बताया की तीस रूपया रोज का मिलेगा,सिर्फ दो घंटे डिब्बो मे मिठाई भरनी है | सुन कर माँ को लगा कि मेरी मासूम निशा जैसे सच मे बड़ी बहन बन गयी है सरिता की आँखों मे आंसू आ गये  थे |
                             साल भर काम किया अब दीवाली नजदीक आ रही थी | निशा का मिठाई भरने का काम बहुत बढ़ गया था | बहुत मन लगा कर काम किया ,और उसने सोचा था कि इस बार दीवाली पर ना भाई रोयेंगे और ना माँ रोयेंगी | मालिक एक डिब्बा मिठाई तो दे ही देगा | पर उस दिन दीवाली को जब निशा को मालिक ने सिर्फ काम करने के पैसे ही दिए मिठाई का एक डिब्बा नहीं दिया | निशा सोच मे पड़ गयी कि क्या करे | आखिर उसने सोचा पापा ने ठीक ही कहा था कि ईमानदारी से पेट नहीं भरता | निशा के बाल मन मे ये बात बचपन से ही उसके पापा ने भर दी थी जो कि गलत थी|और निशा एक मिठाई का डिब्बा मालिक की नजरो से बचा कर अपने घर ले आई थी |
                           सरिता ने पूछा तो कहा ''मालिक ने दिया है | भाई और माँ दोनों खुश थे| निशा यही तो चाहती थी| पर उसको माँ से झूठ बोलने का अफ़सोस भी हो रहा था | एक दिन सरिता बाहर से घर पर आई तो उसे निशा के बोलने की आवाज आ रही थी, पर उसने देखा उसके दोनों बेटे तो बाहर खेल रहे थे | फिर किसके साथ है निशा ? सरिता ने चुपके से घर के अन्दर झाँक कर देखा तो पता चला कि निशा भगवान के आगे हाथ जोड़ कर रो रही है और कह रही है कि ''मुझे माफ़ करना माँ, मैंने आपसे झूठ बोला मालिक ने नहीं दी मै चुरा कर लाई थी, मिठाई | मै, अपने भाइयो को और माँ को दुखी नहीं देख सकती थी | ये सब सुन कर सरिता ने अपनी मासूम बेटी को गले से लगाया और रोने लगी| पर उसे ख़ुशी भी हो रही थी, कि मेरी बेटी अपने पापा पर नहीं गयी है उसने अगर झूठ बोला तो उसका पश्चाताप भी कर रही है|
                                 शांति पुरोहित
                     

परिवर्तन

परिवर्तन                           शांति पुरोहित की कहानी
   प्रतीक का आज छ सालो बाद दुबई से अपने देश भारत आने का हुआ था | वहां जाकर तो जैसे वो बदल ही गया था | जब प्रतीक दुबई गया तब तो पूरा देहाती था,और अब लौटा है तो पूरा विदेशी बन कर | प्रतीक ने फाइनेंस मे ऍम.बी.ए.किया था | वहां जाकर उसे एक प्राइवेट कंपनी मे जॉब मिल गयी,पर वो मेहनत भी बहुत करता था तब जाकर उसने इतने पैसे कमाए है |
                                उसने वहां जाकर अपने घर पर जो पैसा भेजा उन पैसो से उसके पापा ने एक छोटी सी स्कूल खोल ली थी,जिसमे उसकी माँ और बहन पढ़ाती और पापा वस्थापक थे | अब उसके माँ -पापा और बहन सुख से अपना जीवन बसर कर रहे थे, और खुश थे | प्रतीकएयर बस मे बैठा सोच रहा है, कि उसका दुबई जाना कितने मुश्किल हालत मे हुआ था| कम्पनी से ऑफर लैटर एक माह पहले ही आ गया था पर वो जाने का तय ही नहीं कर पा रहा था,यहाँ तक प्रतीक ने एजेंट से अपना पासपोर्ट, वीसा और सब कागजी कार्यवाही पूरी करवा ली थी | बस हाँ भरने की देरी थी | दरअसल विदेश जाने मे प्रतीक को डर लग रहा था |
                                प्रतीक एयरपोर्ट पर उतर चूका था वहां से उसके गाँव पहुँचने का छ घंटे का रास्ता था | उसे गाड़ी मे बैठते ही सब पुरानी बाते याद आने लगी | प्रतीक जब जाने का तय नहीं कर पाया तो उसकी छोटी बहन ने कहा था कि''भाई तुम्हारे एक के जाने से तुम्हारी और हम तीनो की जिंदगी संवर जायेगी, बस पांच साल मेहनत कर लो, फिर हम सब साथ -साथ रहेंगे यहीं पर | और तब उसे अपनी बहन की बात सही लगी और प्रतीक का जाना तय हो गया |
                               उस वक़्त प्रतीक एयरपोर्ट की केन्टीन मे बैठा नाश्ता कर रहा था, पास ही की टेबल पर एक जानी पहचानी सूरत दिखाई दी,उसे लगा कि इसे कहीं देखा है,तभी उसे याद आया कि अरे ! ये तो हमारे ही गाँव का गुंडा है,जिसे सब सेठी भाई कहते है प्रतीक एक मिनिट के लिये उससे डर गया कि कंही ये उसे ही ना लुट ले | तभी उसे याद आया कि दुबई जाने की एक रात पहले गाँव मे हल्ला मचा था कि सेठी गुंडा गाँव के ही रामू चाचा की बेटी सरिता को भगा कर ले गया | रामू चाचा की गिनती धनाड्य लोगो मे होती थी | रामू चाचा के घर की सारे गहने भी गुम थे और सरिता भी गायब थी | उस वक्त प्रतीक इतना व्यस्त था वो सरिता के लिये कुछ नहीं कर पाया | लेकिन विदेश से उसने अपने पापा से कई बार पूछा कि सरिता का कुछ पता चला क्या ? और  वो सेठी कभी गाँव वापस आया क्या ?
                              प्रतीक को अब तक पक्का याद आ गया कि ये, वो ही गुंडा है | वो सोचने लगा कि इसने गहने ले कर सरिता को कंही बेच दिया होगा या छोड़ दिया होगा | सेठी से बात करने की हिम्मत जुटा कर वो उसके पास गया और कहा''आपका नाम सेठी,भाई है ना?,सेठी ने प्रतीक के सामने देखा | तभी उसके साथ बैठे दो व्यक्तियों ने कहा ''भैया , आपको कोई गल्तफहमी हो रही है ये सेठी नहीं असीम भाई है |, अब उस गुंडे से सच तो बुलवाना था,गाँव की बेटी के बारे मे पता जो लगाना था तो प्रतीक ने कहा''मै दो मिनिट आपसे अकेले मे बात कर सकता हूँ ? थोड़ी ना -नुकर के बाद वो बोला ''ठीक है चलो, वो दोनों एक टेबल के पास जाकर बैठ गये |
                         ''आप हमारे गाँव के सेठी भाई ही हो ना, जो सरिता को भगा कर ले गया और साथ मे घर के सारे गहने भी ले भागा ? वो सकपकाया कुछ नहीं बोला तो प्रतीक ने पुलिस का डर दिखाया अब'' मरता क्या ना करता, उसने कहा ''हां मै ही हूँ सेठी,प्रतीक ने झट से पूछा ''सरिता कहाँ है,उसने फिर कोई जवाब नहीं दिया मुझे लगता है आपने उसे  कंही बेच दिया होगा,प्रतीक ने कहा | ''नहीं आप चलो मेरे साथ|, वैसे तो प्रतीक को घर जाने की जल्दी थी पर गाँव की बेटी के बारे मे जानना भी जरुरी था तो चल दिया उसके साथ |
                              वो दोनों अब एक बस्ती मे एक घर के सामने थे,सेठी ने प्रतीक को कहा ''चलिए, प्रतीक ने घर के अन्दर देखा सरिता पलंग पर लेटी हुई थी,सरिता ने प्रतीक को नहीं पहचाना पर उसने पूछा 'तुम ठीक हो ना?, इस सेठी ने तुम्हे परेशांन तो नहीं किया ना ?, नहीं भैया बिलकुल नहीं,बल्कि इन्होंने ही मुझे संभाला है,मे दो साल से बीमार हूँ ,मेरा एक दो साल का बेटा भी है उसे भी ये ही सँभालते है | हम दोनों अपनी मर्जी से भागे थे | ये तो इनका नाम पहले से ही बदनाम था तो लोगो का शक इन पर जाना ही था | हम दोनों मे प्यार था और इन्होंने मुझे कहा था कि अगर मै इनसे शादी करती हूँ तो ये सारे बुरे काम छोड़ कर एक आम आदमी की तरह जियेगेt तो मैंने इनसे शादी करने का फैसला किया और हां भैया ,वो गहने भी इन्होंने नहीं चुराए मैंने ही साथ लिये थे, की कहीं खाने को नहीं मिलेगा तो ये गहने काम आयेगे | आज भी गहने मेरे पास पड़े है| इन्होंने हाथ भी नहीं लगाया कभी गहनों को ||
                    भैया इन्होंने सारे बुरे काम छोड़ भी दिए हम खुश है प्रतीक को ये सब सरिता के मुहं से सुन कर बहुत ख़ुशी हुई | वो सोचने लगा कि एक  स्त्री का प्यार पाकर इन्सान इतना बदल सकता है | अब उसने सरिता से पूछा कि तुम लोग कभी गाँव गये ''सरिता ने कहा नहीं भैया डर के मारे नहीं गये,प्रतीक ने कहा मेरे साथ चलो ,सरिता ने ना कहा पर प्रतीक जिद पकड़ कर बैठ गया तो जाना पड़ा |
                           अब सरिता और सेठी को गाँव मे देख कर गाँव वाले और सरिता के माँ -पापा प्रतीक पर  बहुत नाराज हुए पर जब प्रतीक ने सब कुछ बताया तो सब ने उन्हें माफ़ कर दिया |अब सरिता की माँ ने सेठी से कहा अब आप हमारे दामाद हो | सरिता को थोड़े दिन हमें सँभालने दो, आप अपने काम पर ध्यान दो जो सरिता की बीमारी के कारण बंद पड़ा है |
                  प्रतीक को ये देख कर ख़ुशी हो रही है, कि सरिता के माँ -पापा को आज कितने सालो बाद सुख मिला है | प्रतीक को अच्छा लग रहा था कि उसने गाँव मे आते ही अच्छा काम किया | ये सब जान कर उसके माँ -पापा और बहन भी खुश थे|
                     
                            शांति पुरोहित 

विदेश मे शादी के मायने

                   विदेश मे शादी के मायने                                                                                                                                                             आज सुबह ही दिव्या का फोन आया था , उसने अपनी सारी तखलीफ को भुला कर, अपनी जैसी मुसीबत मे फंसी हजारो  भारतीय लडकियों का विदेश मे जीवन बर्बाद ना हो ,उसके लिए वहां के स्थानीय लोगो के साथ मिलकर एक N. G. O. खोला है | आज रमा बहुत खुश है , बेटी ने वो काम कर के दिखाया है,जिसकी उसने तो कभी कल्पना ही न की थी |
      रमा अपनी छोटी सी ग्रहस्थी मे बहुत खुश थी | पति विकास और एक प्यारी सी बिटिया दिव्या ही उसका परिवार था  रमा का| विकास के साथ प्रेम-विवाह हुआ था , ससुराल वालो ने बेटे -बहु को अपनाने से इंकार कर दिया था | कारण, वो ही सदियों पुरानी 'जाति -धर्म' की मानसिकता थी | रमा ब्राह्मण परिवार से थी, और विकास जैन धर्म को मानने वाला था |
      कॉलेज मे साथ पढ़ते थे, दोनों मे पहले दोस्ती हुई फिर प्रेम के बीज का अंकुरण हुआ,पल्वित हुआ और रमा और विकास ने घर वालो की रजामंदी के बिना ही शादी कर ली थी | दोनों को अपनी नहीं गृहस्थी बसाने मे ज्यादा परेशानी नहीं हुई, विकास एक बड़ी कंपनी मे मैनेजेर के पद पर कार्य करता था | पगार अच्छी थी | कभी किसी चीज की कोई कमी नहीं हुई थी |
        समय अपनी गति से चलता रहा | पता ही नहीं चला कब तीन साल निकल गये,इसी दौरान रमा एक प्यारी सी बच्ची की माँ बन गयी थी | रमा का पूरा ध्यान अपनी बेटी दिव्या की देख -भाल मे लगा रहता था | विकास ने घर के काम -काज के लिए दो-दो नौकर रख लिए थे | घर के काम से रमा बिलकुल ही फ्री थी | विकास और रमा बहुत खुश थे | पर कुदरत ने रमा की ख़ुशी का वक़्त बहुत कम तय कर के रखा था | अचानक ही रमा की खुशियों को न जाने किसकी नजर लगी , उसका सब कुछ बर्बाद हो गया |
        विकास का कार दुर्घटना मे प्राणान्त हो गया | पल भर मे रमा का जीवन छिन्न -भिन्न  हो गया | पति के इस तरह बीच राह मे छोड़ कर जाने से रमा पत्थर सी निष्प्राण हो गयी | सामाजिक लोकाचार के बाद सब रिश्तेदार वापस चले गये ,तब रमा को अपनी बेटी दिव्या का ख्याल आया, की वो अकेली नन्ही सी जान के साथ कैसे जियेगी | रमा के पास कोई नौकरी भी नहीं थी | ससुराल मे तो उसे कोई अपनाएगा नहीं फिर भी उसने वहीं जाने का निर्णय किया |
        ' इस घर के दरवाजे तुम्हारे लिए पहले से ही बंद है,फिर क्यों आई हो अपना मनहूस साया लेकर यहाँ, चली जाओ वापस |,पहले हमारे बेटे को हमसे दूर किया और अब इस दुनिया से ही दूर हो गया | अब यहाँ क्या करने आयी हो | सास ने जली -कटी सुनाकर अपना दरवाजा बंद कर लिया | दुखी रमा ने वापस अपने घर जाना ही उचित समझा |
        रमा ने कुछ दिनों के लिए मम्मी -पापा के घर जाने का निश्चय किया | मम्मी के गले लगकर रमा बहुत रोई | मम्मी ने कहा ' रमा ये तुम्हारा ही घर है ,जब तक मन करे यही रहो, और मै तो कहती हूँ ,अब वहाँ अकेली रह कर क्या करोगी, हमारे पास ही रहो |, माँ के प्यार भरे स्पर्श से रमा के आर्त -मन को कुछ तो राहत मिली | भाभी तो रूखेपन से बस मुस्कराई भर थी, और रसोई मे चाय बनाने चली गयी | रमा को समझते देर ना लगी कि भाभी को मेरा यहाँ आना अच्छा नहीं लगा है |
        अभी कुछ दिन ही हुए रमा को यहाँ आये कि भाभी का हर छोटी -मोटी बात पर रमा को टोकना ,नीचा दिखाना चालू हो गया | रमा अनदेखा करती रही | पर आज तो रमा ने जो सुना,उसके बाद उसने मम्मी के घर से जाने का निश्चय कर लिया | भाभी भाई से कह रही थी कि ' आप अपनी बहन को यहाँ से जाने के लिए बोल दो ,ये जब से अपनी फूटी किस्मत लेकर यहाँ आई है ,मुझे अपनी चिंता होने लगी है | मुझे डर है कि कहीं आपको कुछ हो ना जाये |, इसके रहने ,खाने का खर्च हम वहन कर लेंगे ,आप तो इसको यहाँ से चलता करो |,
              भाई ने कहा 'कुछ दिन ही तो हुए है कितने बड़े दुःख से गुजरी है ,कुछ दिन बाद खुद ही चली जाएगी|,ये सब सुनकर रमा हैरान रह गयी ,जाने के लिए मम्मी को भी तो राजी करना होगा | सुबह चाय पीते हुए रमा ने मम्मी से कहा ' मम्मी अब मै अपने घर जाना चाहती हूँ , यहाँ इस उम्र मे आप पर बोझ बन कर नहीं रहना चाहती |, मम्मी ने कहा क्यों ?  वहां कोई भी तो नहीं,किसके सहारे रहोगी |, 'नहीं मम्मी जाने दो ,और इससे पहले भाई उसे जाने का बोले, वो किसी तरह मम्मी को समझाकर अपने घर आ गयी |
          शाम को भाई ने रमा को घर मे नहीं देखा तो पत्नी से पूछा 'रमा कहाँ है ? 'चली गयी अपने घर अपने को कुछ कहना ही ना पडा ,चलो बला टली |, पत्नी ने खुश होते हुए कहा | बहु -बेटे की बाते सुनकर रमा की मम्मी के रमा के जाने का कारण समझ मे आ गया था | रमा अपने घर मे विकास की यादो के सहारे जीने की कोशिश करने लगी | विकास की कम्पनी ने रमा को सहानुभूति वश कम्पनी मे काम दे दिया था ,जिससे रमा का जीवन सुचारू रूप से चलने लगा
          अब रमा का सारा ध्यान अपनी बेटी दिव्या पर था, जो उसका एक मात्र जीने का सहारा भी थी | समय अपनी गति से चलता रहा | दिव्या अब बड़ी हो गयी, पढने मे वो कुशाग्र बुधि की थी | उसने ऍम ,बी .ए . किया | कॉलेज मे दिव्या का प्लेसमेंट मे एक बड़ी कंपनी मे जॉब का ऑफर आ गया था | पर रमा उसकी शादी करना चाहती थी | माँ -बेटी मे इस मामले मे बहुत बार बहस होती थी | दिव्या माँ को अकेला छोड़ कर शादी नहीं करना चाहती थी | रमा कहती ' दिव्या तेरे हाथ पीले करके तुझे अपने घर विदा करदू तो मे चैन से जी लुंगी अपना बाकि का जीवन |,
        रमा ने आखिर दिव्या के ना चाहने पर भी उसके लिए रिश्ते देखने शुरू किये | बहुत रिश्ते देखे ,पर कुछ रमा को पसंद नहीं आते ,तो कुछ को दिव्या नहीं पसंद आती थी |समय बीतता जा रहा था | रमा की चिंता बढती जा रही थी | दिव्या २७ वा साल पूरा करने वाली है | कोई भी रिश्तेदार रमा की मदद भी नहीं कर रहा था | सबका ये सोचना था कि माँ -बेटी की किस्मत अच्छी नहीं है ,कहीं हमारी खुशियों को भी ग्रहण ना लग जाये | रमा करे तो क्या करे! अब रमा के दिन -रात इसी चिंता मे बीतने लगे थे | दिव्या माँ के गले लगकर हमेशा बोलती थी कि 'मेरी शादी की चिंता छोड़ दो,मै आपके बुढ़ापे का सहारा बनुगी |,
            दिव्या के कॉलेज जाने के बाद रमा उदास बैठी थी, तभी फोन की घंटी बजी | रमा ने फोन उठाया ,हल्लो , सामने से कमला ताई की आवाज आई 'मै कमला अमेरिका से बोल रही हूँ ,
  आज हमारी याद कैसे आई , रमा ने बोला |
  दिव्या के रिश्ते के लिए मेरे देवर का बेटा संदीप कैसा रहेगा ,
  'वो जिसका परिवार अम्रतसर मे रहता है , रमा ने कहा |
  'हाँ ,वही, कमला ताई ने कहा |
 ' तुम चाहो तो अम्रतसर चले जाओ , हाँ ठीक है ,देखते है , रमा ने फोन कट किया |
        रमा के दिल मे विचार चल रहा था कि इतनी दूर सात समन्दर पार दिव्या का ब्याह करना ठीक रहेगा ?,
        दिव्या से बात की तो वो बोली ' विदेश मे रहने  वाले लडको पर मुझे तो भरोसा नहीं है , आपके पहचान वाले है, तो ठीक है | रमा को बात ठीक लगी, अम्रतसर जाकर संदीप के माता -पिता से मिली ,सब ठीक लगा ,दिव्या की संदीप के साथ शादी की बात पक्की हो गयी | दो माह बाद शादी हो गयी | रमा के कोई रिश्तेदार नहीं होने के कारण ,अम्रतसर जाकर एक सादे समारोह मे शादी कर दी | आखिरकार शादी के बीस दिन बाद दिव्या के अमेरिका जाने का समय आ गया |रमा ने नम आँखों से बेटी को विदाई दी | संदीप और कमला ताई को बेटी को प्यार से रखने की बात कह कर रमा अपने घर आ गयी |
     प्लेन की कुछ घंटो की यात्रा के बाद दिव्या 'अमेरिका के न्यूयॉर्क, शहर मे थी | संदीप का आलिशान घर और और उसका अपने प्रति इतना प्रेम देख कर ,दिव्या अपनी किस्मत पर बहुत खुश हो रही थी | संदीप रोज ऑफिस से जल्दी आ जाता, और दिव्या को बाहर घुमाने ले जाता था | करीब बीस दिनों तक संदीप उसे पार्टी,होटल आदि ले जाता रहा| शाम का खाना तो प्राय बाहर ही खा कर आते थे | दिव्या बहुत खुश थी |
          दिव्या की ख़ुशी ज्यादा दिन तक ना रही,आज संदीप ने दिव्या को साथ ले जाने से इंकार किया | दिव्या ने कारण जानना चाहा ,तो उसे गुस्सा आ गया दिव्या को डांटने लगा | फिर भी दिव्या ने जानना चाहा, तो सुनो संदीप ने कहा ' मैंने यहाँ की एक विदेशी लड़की से घर वालो को बिना बताये शादी कर ली है,हमारे एक बच्चा भी है, तुमसे शादी की तो सिर्फ माँ -पापा को खुश रखने के लिए | और हाँ ,तुम अपने घर दिल्ली जाने का तो सोचना भी मत , तुम्हारा पासपोर्ट मेरे पास ही रहेगा, मै नहीं चाहता मेरे घरवालो को इस बात की भनक भी लगे | तुम्हे यहाँ सब कुछ मिलेगा तुम्हे किसी भी बात की कमी नहीं रहेगी , इतना कहकर वो अपनी पहली पत्नी के घर चला गया | दिव्या को ये सब सुनकर ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके शारीर से रक्त का एक -एक कतरा निकाल लिया हो और वो निष्प्राण हो गयी | उसे अपनी दुनिया उजडती हुई साफ दिखाई दे रही थी |
        हैरान,परेशांन दिव्या ने कुछ देर बाद अपने अंदर इस मुसीबत से लड़ने की हिम्मत पैदा की, दिव्या एक बहुत ही समझदार और संस्कारी लड़की थी | पति के इस कृत्य मे चुप रहकर अन्याय सह कर उसे बढ़ावा देने वालो मे से नहीं थी | अब उसे अपना आत्म सम्मान बचाना था | उसने पहला कदम बढ़ाया, संदीप से बात करने का कोई फायदा नहीं था | उसने पुलिस  -स्टेशन जाकर, संदीप पर धोखे से शादी करने के लिए ऍफ़ .आई .र . लिखवा दी | संदीप को गिरफ्तार कर लिया गया | संदीप ने सोचा नहीं कि दिव्या उसके साथ ऐसा कुछ करेगी |
          पुलिस ने दिव्या का पासपोर्ट भी संदीप से लेकर दिव्या को दे दिया ,और कहा 'आप इंडिया जाना चाहो तो हम सरकारी खर्च पर भेज सकते है |, दिव्या ने कहा 'नहीं जाना अभी तो मुझे बहुत काम करने है | संदीप को सबक सिखाना है |
          दिव्या ने कुछ स्थानीय लोगो के साथ मिलकर एक N.G.O.खोला , जिसके अंतर्गत तमाम भारतीय लडकियों की मदद की जा सके, जो उसकी तरह मुसीबत मे फंस जाये | पुलिस ने भी अपना पूरा सहयोग देने का वादा किया | इससे भारतीय लडकियों का जीवन बर्बाद होने से बच जायेगा |
        संदीप की विदेशी पत्नी को उसके बारे मे ये सब पता चला तो उसने उसे छोड दिया | संदीप को एक साल की सजा हुई | एक साल की सजा काट कर जब संदीप वापस आया , तो दिव्या उसके घर से जाने लगी ,उसने अपना अलग घर ले लिया था, वो एक कम्पनी मे मार्केटिंग मैनेजर की हेसियत से काम करती थी | संदीप ने उसे रोका और कहा ' दिव्या मुझे छोडकर मत जाओ, अब मै कहाँ जाऊंगा ? जूलिया तो मुझे पहले ही छोडकर चली गयी है | अब कभी तुम्हे धोखा नहीं दूंगा |, पर दिव्या ने उसके साथ रहने से साफ इंकार कर दिया और चली गयी | इस तरह संदीप को दोनों औरतो ने छोड़ दिया , दोनों ने अपने आत्म सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा की | किसी ने सच ही कहा है, जैसी करनी वैसी भरनी |
               शांति पुरोहित 

           
       

Saturday, 5 October 2013

                         अन्याय एक लघु कथा                       सुश्री शांति पुरोहित की कहानी                                                                                                                                                ''मम्मी आप क्यों उस आदमी के लिए इतना कठोर व्रत रख रही हो, वो तो कभी आपको भूले से भी याद नहीं करते है| हम दोनों को उनके रहते,लावारिस जीवन जीने को मजबुर होना पड़ा|' रवि ने अपनी माँ शारदा से थोडा झुंझलाहट के साथ कहा| आज आरती ने करवा चौथ का व्रत अपने पति की लंबी उम्र के लिए रखा है|
                                   शारदा अपने सास-ससुर जी और पति विष्णु के साथ रहती थी| सास- ससुर आरती को बेटी से बढकर प्यार करते थे| सुबह से शाम तक आरती उनका बहुत अच्छे से ख्याल रखती थी| अभी आरती की शादी को कुछ महीने ही हुए थे| एक दिन विष्णु बाहर बगीचे मे टहल रहा था| उसका फ़ोन कमरे मे बज रहा था| शारदा ने फोन उठा लिया| सामने से किसी महिला की आवाज आई '' मेरी आवाज सुनकर उसने फोन कट कर दिया|' शारदा ने इस बात को कभी गभीरता से नहीं लिया|
                         समय बीतता रहा| शादी के एक साल बाद शारदा एक बच्चे की माँ बनी| बहुत खुश थी अपनी दुनिया मे; तभी एक दिन विष्णु के एक फैसले ने उसके हँसते-खेलते जीवन में आग लगा दी| 'शारदा मैंने तुमसे और माँ-पापा से एक बात छुपाई है| मेरी नीलू से एक साल पहले, शादी हो चूकी है| हम दोनों एक दुसरे से प्यार करते थे| वो दुबई मे रहती है| कुछ दिन बाद मे उसके साथ रहने के लिए जा रहा हूँ| तुम अपना फैसला लेने के लिए स्वतंत्र हो; हमारे बेटे के साथ यहाँ रहकर, मेरे माँ-पापा के साथ रहकर भी अपना जीवन गुजार सकती हो|' विष्णु की एक-एक बात उसे जहर से भी ज्यादा कडवी लग रही थी|
                                शारदा ने रोते हुए कहा '' मेरे साथ ऐसा अन्याय करते हुए एक बार भी आपने नहीं सोचा कि आप मुझे बिना कोई कुसूर के इतनी बड़ी सजा दे रहे हो| पर कोई बात नहीं जब सोच लिया है तो जाओ, मेरे बारे मे तुम क्या सोचोगे,तुम्हे तो अपने जन्म देने वाले माँ-पापा की भी कोई परवाह नहीं है| जब उनको तुम्हारे इस फैसले का पता चलेगा तो वो भी मेरी तरह टूट जायेगे| इसलिए तुम उनको बिना कुछ कहे यहाँ से चले जाओ;उनको मे संभाल लुंगी|' शारदा ने रोना उचित नहीं समझा और फिर वो सास-ससुर को इस बात की भनक भी नहीं पड़ने देना चाहती थी| तब से लेकर आज तक वो सास-ससुरजी का सहारा बनी बैठी है,जो खुद भी एक बेसहारा है| रवि ने छोटी उम्र से ही बड़े की तरह अपनी माँ को संभाला है|
                        शांति पुरोहित