Sunday, 9 June 2013

विवार, 31 मार्च 2013


खुशी


‘सूरज,की पहली किरण जैसे ही धरती पर अपनी लालिमा बिछाती है...नीरू रोज सुबह सूरज के निकलने कि पहले ही उठ जाती थी...और सूरज का स्वागत करती थी | ये ही वो वक़्त था जिसे वो अपने लिये जीती थी |जैसे ही सूरज की किरण धरती पर आती है ,वो उन्हें अपनी बांहों में समेट लेती और दस मिनिट तक तक आँखे बंद करके खुद मे खो जाती है |उसी वक़्त घर मे से आवाजे आनी शुरू  हो जाती है | ‘मम्मी जल्दी क्यों नहीं उठाया,मुझे आज जल्दी कालेज जाना था , नीरू के बेटे जीत  आवाज आई अभी वो इसका कुछ जवाब दे,तभी नीरू की तेरह की साल की बेटी पिंकी कहती है,;मम्मी आज मेरे टिफिन मे सेंडविच बना कि डालना मेरे फ्रेंड्स को बहुत पसंद है |
                       जैसे ही ये दोनों काम नीरू ख़तम करती है,तभी ससुर जी की आवाज आती है की’नीरू चाय मुझे बाहर आँगन मे ही दे जाना आज यही परर बैठ कर चाय पिने का मन कर रहा है |’ तभी सासुजी कि आवाज नीरू के कानो मे आती है ,;नीरू बेटा मुझे चाय कमरे मे ही दे जाना बाहर थोड़ी ठण्ड है |एक को इधर एक को उधर,तभी उसे याद आया की आज ‘ नीरव , की शर्ट भी इस्त्री करनी है,नहीं तो सुबह –सुबह डांट खानी पड़ जाएगी | वो दौड़ कर इस्त्री करने चली गयी |
                       फिर उसने नीरव को उठाया......नीरव चाय पीता है तब रोज दस मिनिट उनके पास बैठना पड़ता है | ये दस मिनिट वो नीरव के लिये मुश्किल से निकालती ,अपने आप से ही सवाल करती है कि वो इतने से वक़्त मे क्या काम लेगी | नीरव उसे कितना प्यार करता है पर वो दस मिनिट भी नहीं निकाल पाती | नीरव को नीरू का दस मिनिट उसके पास बैठना समझ ही नहीं आता,क्योंकि उस वक़्त नीरू का ध्यान उसका टिफिन बनाने मे लगा रहता था |
                     सबके चले जाने के बाद वो खुद की चाय ले कर बैठी ही थी की ससुर जी की आवाज आई ‘नीरू मेरा तौलिया कहाँ है ,वो चाय रख कर तौलिया देने गयी वापस आई तब तक चाय ठंडी हो गयी |वैसी ही चाय को पीकर वो चल दी वापस बाकि के काम निपटाने | शाम कब हो जाती थी उसे पता नहीं चलता था |अब वापस वो ही शाम का खाना बानाना वो ही शिकायते,ये क्यों बनाया ,ये क्यों नहीं बनाया ,क्या करती हो सारा दिन |रोज रोज ये ही सब सुन कर अब नीरू तंग आगयी थी |
            आज उसकी शादी की शालगिरह है,पर घर मे किसी को भी याद नहीं,सब अपने अपने काम मे जुटे थे,और अपनी अपनी जरुरत की चीज मांगने मे लगे थे |यहाँ तक कि खुद नीरव को भी अपने शादी की शालगिरह याद नहीं थी | सब चले गये तो नीरू की आँखों मे आंसू आगये | अपनी सासुजी के पास बैठ कर रोई और उन्हें कहा कि शायद माँ अपने बेटे की शादी इसलिए करती है कि उसे आगे जाकर कोई काम न करना पड़े ,राधा देवी उसकी सासुजी सुनकर कुछ नहीं बोली ,बस उठ कर अपने कमरे मे चली गयी |
रात को’ नीरव, आया बच्चे आये | वो रात का खाना बनाने मे जुट गयी पर अन्दर ही अन्दर जल रही थी | कि किसी को कुछ याद नहीं,लगता है ,मै इस घर कि कामवाली बाई हूँ,जो दिन भर इनको सभालने मे लगी रहती है | तभी घर कि बेल बजी और एक आदमी हाथ मे केक लिये खड़ा है जिस पर लिखा हैniru from sasu maa सब देखते रह गये,नीरू ने सासुजी के पैर पकड़ कर माफ़ी मांगी वो दिन मे उनको सुना कर आई थी इसलिए,तभी सास राधा देवी ने उसे दो टिकिट दिए और कहा कि जाओ घूम कर आओ दार्जिलिंग तुम और नीरव |
राधा देवी ने नीरू से कहा ‘’मे जानती हूँ तुम हम सब को सँभालने मे कितनी परेशां होती हो,पर नीरू ये घर इसलिए ही टिका है कि तुम अच्छे से संभालती हो ,तुम इस घर की काम वाली बाई नहीं ,घर की मालकिन हो | बड़े नसीब वाले है हम ,हमें तुम जैसी बहु मिली ,जो गृह लक्ष्मी बन कर इस घर मे आई है |
अब राधा देवी ने नीरू से कहना शुरू किया ‘’जब मै इस घर मे बहु बन कर आई ,मेरी सासुजी का सवभाव बहुत तेज था ,बात बात मे उनका टोकना रोज का काम था | मै उनसे बहुत डरती थी ,बाद मे मैंने सोचा ऐसे कसे चलेगा |धिरे धिरे मैंने उनके दिल मै अपने लिये जगह बनानी शुरु की ,और कुछ ही सालो मे उनकी और मेरी पक्की दोस्ती हो गयी | अब हम दोनों के बिच मे माँ बेटी का रिश्ता कायम हो चूका था | अब घर मे सब खुश थे | तुम्हारे ससुर जी बहुत खुश हुए मेरे इस काम से ‘’तुमने कसे इतनी जल्दी मेरी माँ का मन जीत लिया ,सच मे तुम ने इस घर को नरक होने से बचालिया मे  बहुत खुश हूँ |

शांति पुरोहित
shanti.purohit61@gmail.com

15 टिप्पणियाँ:

  1. बहुत बढ़िया कहानी शांति जी ...
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    1. उपासना आपका बहुत शुक्रिया
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    2. उपासना आपका बहुत शुक्रिया
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  2. अच्छी कहानी शांति जी ........बधाई सुन्दर रचना के लिए ......
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    1. अरुणा जी आपका बहुत शुक्रिया जी
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  3. ye hi hai aurt ki jindgi shantiji..par aapne jo sas ki bat kahi usse bahut achcha laga..ki ek aurt agar dusri aurt ka dard samje to jina aasan ho jata hai.. bahut achchi kahani..
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  4. एक नई शुरुआत के लिए नीरू को ढेरों बधाई
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बृहस्पतिवार, 25 अप्रैल 2013


रिश्ता


आज सुबह -सुबह मुकेश भाई की पत्नी कृष्णा ने कहा ''अब तो मेरे बेटे अमित की शादी के लिये कोई रिश्ता देखो,अब तो वो पढ़ -लिख कर आपके काम मे आपको हाथ भी बटाने लगा है |
तभी मुकेश भाई ना कहा'अरे ! हाँ ''मै तो तुम्हे बताना ही भूल गया था कि अमित के लिये एक बहुत ही अच्छे घर से रिश्ता आया है ,|मुकेश भाई ने अपनी पत्नी कृष्णा को जानकारी देने के हिसाब से कहा कि'' कृष्णा मैंने तो ये पक्का कर लिया है कि अमित की शादी इसी घर की लड़की के साथ ही करूँगा |
                                                            मुकेश भाई को लगा कि मोहन भाई की लड़की के साथ अमित का रिश्ता कर देने से उनके घर की जो भी तखलीफ है वो दूर हो जायेगी,घर मे जिस चीज की भी कमी है वो भी दूर हो जाएगी |
                                                            क्योंकि मोहन भाई अपनी बेटी की शादी मे बहुत पैसे खर्च करने वाले है | तो मुकेश भाई ने तो मन -ही -मन मे ये तय कर लिया था कि अपने बेटे अमित की शादी इसी घर मे करेंगे |
                                                              ये सब उन्होंने अपनी पत्नी कृष्णा को नहीं बताया था |
                                                                                                                                             अब इसके लिये मुकेश भाई ने अपने बेटे अमित को भी कह दिया था कि लड़की दिखने मे चाहे कैसी भी हो,तुम्हे हां ही कहना है | अमित ने सोचा की पापा ऐसा क्यों कह रहे है | उसने सुन कर हाँ बोल दिया और पूछा कुछ नहीं | आज वो अपने मम्मी -पापा के साथ मोहन भाई के घर लड़की देखने आये है | एक आलीशान बैठक मे सब बैठ गये और इधर -उधर की बातो से बोल -चाल का का सिलसिला चालू किया लेकिन मुकेश भाई का ध्यान बातो से ज्यादा उनके आलीशान घर को देखने मे ही था | वो उनकी शानो -शौकत देख कर उसी घर मे अमित का रिश्ता करने के अपने इरादे को और भी मजबूत कर चुके थे |
                                                                  इतने मे ही लड़की की माँ किरण देवी अपनी बेटी प्रिया को लेकर बैठक मे आई | सब को नमस्ते बोल कर प्रिया सोफे पर अपनी माँ के पास बैठ गयी | अमित ने देखा की प्रिया सुन्दर,सोम्या तो थी साथ ही रहन -सहन मे पैसो की झलक स्पष्ट दिखाई दे रही थी उसके चेहरे का रौब देखते ही बनता था | अमित को लगा कि जैसे वो अपने आप को उसके सामने छोटा समझने लगा है | वो मन ही मन विचार करने लगा कि कैसे संभाल पायेगा वो प्रिया को जो इतने आराम से रही हुई है अपने घर मे |
                                             वैसे अमित भी कम नहीं था,देखने मे स्मार्ट था अच्छी कद -काठी का था,किसी भी लड़की को देखते ही पसंद आ जाये ऐसा वयक्तित्व था उसका और यहाँ भी ऐसा ही हुआ | प्रिया ने उसे पसंद कर लिया और इशारे से अपनी माँ को बता भी दिया फिर वो सब की इजाजत ले कर अपने कमरे मे चली गयी | पर अमित की माँ इस रिश्ते के खिलाफ थी | अमित की माँ कृष्णा ये मानती थी कि लड़की के पापा के पास बहुत पैसा है और वो अपनी बेटी की शादी मे खूब पैसा खर्च करेंगे | उनका छोटा सा घर तो उनके दिए सामान से जैसे भर ही जायेगा  | तब लड़की के पापा बेटी को नया घर लेकर दे देंगे तो मेरा अमित मुझसे दूर चला जायेगा तो वो मन ही मन सोच रही है की ये रिश्ता हो ही ना | पर मुकेश भाई ने भी कृष्णा को कह दिया था की तुम्हे कुछ नहीं कहना है | इधर इन सब बातो से अनजान
 अमित को कुछ भी पता नहीं था |
                                                 तभी मोहन भाई ने कहा ''दोनों बच्चो की कुंडली मिलवा लेते है सब ठीक रहा तो बात पक्की समझो | अब मुकेश भाई को चिंता हुई कि कुंडली नहीं मिली तो?.फिर भी उन्होंने मोहन भाई को कहा ''मै कल पंडित को लेकर आपके घर आता हूँ | और वो लोग मोहन भाई से विदा ले कर अपने घर आ गये |मुकेश भाई ने पंडित को अपने घर बुलाया | मुकेश भाई को जिस बात का डर था वही हुआ पर उन्होंने पंडित को पैसो से खरीद लिया | ये सब मुकेश भाई की पत्नी कृष्णा ने सुन लिया था अब मुकेश भाई पंडित को ले कर मोहन भाई के घर पहुंचे इससे पहले ही कृष्णा ने मोहन भाई को फोन कर दिया कि ''मेरे पति ये रिश्ता पैसो के लिये कर रहे है कुंडली मिली नहीं है |, सामने से मोहन भाई बोले मै बहुत खुश हूँ की लड़के की माँ इतनी ईमानदार और साफ दिल की है, और कहा कि बहन जी अब तो मुझे कुंडली भी नहीं मिलानी है, और अब शादी पक्की ही समझो |, अगर आप जैसी सास मेरी बेटी को मिल जाये तो इससे बढ़ कर और क्या है |खुशिया ही खुशिया भर जाएगी मेरी बेटी प्रिया के जीवन मे | जब बात चल ही  रही थी तो कृष्णा ने अपने मन का डर भी उनके सामने रख दिया | ''आप इतने अमीर हो मेरे बेटे को घर तो खरीद कर नहीं दोगे ना ,, अमित की माँ कृष्णा ने मोहन भाई को कहा | मोहन भाई ने कहा ''बहन जी घर तो आको लेना ही पड़ेगा,आपका घर है भी तो कितना छोटा |,वो बोली इसलिए ही मै अमित की शादी यहाँ करना नहीं चाहती थी |
                                           मोहन भाई हंसने लगे और कहा ''मै आपको इतना बड़ा घर लेकर दूंगा जिसमे आप सब आराम से रह पाओगे | मेरे तो ये एक ही बेटी है तो इसे ना दूँ  तो और किसे दूँ ,और हाँ आप डरिये बिलकुल भी नहीं मैंने अपनी बेटी को केवल पैसो की चका -चौध नहीं दिखाई है उसे अच्छे संस्कार भी दिए है की वो बड़ो का आदर -सम्मान करे |
                                           अब अमित की माँ कृष्णा ने चैन की साँस ली और अमित की शादी धूम -धाम से की | शादी हो जाने के बाद मोहन भाई ने कृष्णा को कहा कि लड़की के लिये पैसा वाला घर ही देखना मेरी नजर मे ठीक नहीं है पैसा ही सब कुछ नहीं होता एक अच्छी सास का होना भी बहुत जरुरी है और अच्छी बहु का होना भी जरुरी है तभी घर -घर बना रहता है मुकेश भाई ने अपनी पत्नी कृष्णा की सुलझी हुई सोच की बहुत तारीफ करी और सब खुश थे |
shanti ji kahani
                   शांति पुरोहित

9 टिप्पणियाँ:

  1. बहुत अच्छी कहानी , आपकी कहानियों के विषय हमेशा अच्छे होते हैं
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  2. बेहद खूबसूरत अहसास से सजी हुई कहानी
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  3. ek sakaratamak soch wali kahani par real life main kaha ho pata hain aisa?
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  4. सुन्दर प्रस्तुति शान्ति जी ..........
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  5. सुन्दर प्रस्तुति शान्ति जी
    प्रत्‍युत्तर दें
  6. awesome jada paisa bhale na ho par insan sachchaa hona chahiye jindagi me sukun hona chahiye
    प्रत्‍युत्तर दें
                                                         

"दोस्ती "

सुश्री शांति पुरोहित की कहानी  "दोस्ती  "  





                                                                                                        रुकसाना और हेमा दोनों बहुत अच्छी दोस्त थी | दोनों की उम्र ही क्या थी, रुकसाना,दस साल की ,हेमा आठ साल की,पर दोनों मे गहरी दोस्ती थी | पिछले दो साल से, रुखसाना हेमा को 'ईद, पर सेवइया खिलाती रही है | आज हेमा के घर पर 'सत्यनारायण भगवान ' की कथा रखवाई है |
                                सब को बुलाया गया है | हेमा ने रुकसाना को कहा ''कल हमारे घर सत्यनारायण भगवान की कथा है तुम, जरुर आना |'
                      दोनों बच्चिया मासूम ,धर्म के बारे मे क्या जाने | उनको धर्म की परिभाषा भी पता नहीं थी | हिन्दू -मुसलमान का धर्म भे, वो क्या जाने | दोनों धर्मो मे कोई भेद नहीं है | दोनों  धर्म मे बल्कि दुनिया के तमाम धर्मो मे ,इंसानियत, का ही पाठ पढाया जाता है | इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है | प्रेम,भाईचारा और सम- भाव से जीना ही धर्म का मूल मन्त्र है |
                        हेमा के घर मे कथा की तमाम तैयारिया लगभग पूर्ण हो चुकी थी | पंडित जी आसन पर विराज मान हो गये | सभी आगन्तुक अपने- अपने आसन पर बैठ गये थे | हेमा भी बैठ गयी मम्मी के पास,पर उसका पूरा ध्यान ,दरवाजे की और था | रुकसाना अभी तक नहीं आयी थी |
                             पंडित जी ने कथा आरम्भ कर दी | हेमा का ध्यान कथा मे नहीं ,ये देख कर उसकी ममी ने कहा ''वो नहीं आएगी ,तुम कथा मे ध्यान दो | हेमा चुप-चाप बैठ गयी | सोचने लगी कहा, तो भी रुकसाना अभी तक क्यों नहीं आयी |'
                           तभी पंडित जी ने कथा की पूर्णाहुति की घोषणा की | और कहा ''सब लोग प्रसाद लेकर ही घर जाये ,प्रसाद नहीं लेने से भगवान का अपमान होता है | हेमा ने एक प्लेट मे प्रसाद लिया और दरवाजे की तरफ जाने लगी | उसकी दादी ने उसे रोक कर कहा ''कहाँ जा रही है ?' 'रुकसाना को प्रसाद देने जा रही हूँ |' हेमा ने कहा | ''नहीं जाना है प्रसाद देने,वो मुस्लिम है, भगवान नाराज हो जायेंगे |' हेमा सोच मे पड गयी, कि पंडित जी ने कहा,वो सही है, या दादी कह रही है वो सही है | उसने तय किया ,कि वो रुकसाना को प्रसाद जरुर से देकर आएगी |
                     हेमा ने दादी से छुप कर रुकसाना को प्रसाद खिलाया और वो इंतजार करने लगी कि देखती हूँ ,भगवान्  क्या करते है |,रुकसाना मुझे सेवइया खिलाती है तब तो भगवान नाराज नहीं होते | बाल मन मे फिर शंका उभरी | दस दिन हो गये कुछ नहीं हुआ | हेमा ने सोचा,दादी कुछ नहीं जानती है | भगवान कुछ बुरा नहीं करते है | हमारी दोस्ती ही भगवान् को अच्छी लगी है, तभी कुछ बुरा नहीं हुआ है |
      शांति पुरोहित
मेरी कहानी "दोस्ती " पढना और अपने अनमोल प्रतिभाव देना.

Tuesday, 4 June 2013

भक्त,भक्ति और भगवान

" भक्त,भक्ति और भगवान "

सुश्री शांति पुरोहित की कहानी " भक्त,भक्ति और भगवान "





'बधाई हो, दया बहन ,आज आपके घर मे लक्ष्मी आई है |, वीणा बहन ने खुश होकर दया बहन को बधाई दी |  'सच मे बहुत ख़ुशी की बात है कि आज हमारे घर लक्ष्मी का आगमन हुआ है,मै बहुत ख़ुशी मेहसूस कर रही हूँ |' 'ना, जाने लोग बेटी के जन्म जाने पर क्यों नहीं खुश होते,इसके विपरीत बेटे के जन्म पर बहुत ख़ुशिया मनाते है ?' दया ने चिंता करते हए कहा | 'ऐसा भाव रखना उनकी ओछी मानसिकता को ही दर्शाता है |' वीणा बहन ने कहा |
                       दोनों सहेलिया बाते कर रही थी,तभी अंदर से दया बहन की छोटी बहु प्रिया जल-पान लेकर कमरे मे उपस्थित हुई | ''नमस्ते आंटी, बहु ने वीणा बहन को नमस्ते किया,जल-पान रख कर बाहर चली गयी |चाय पीते हुए दया बहन ने कहा 'अगले महीने बच्ची का नामकरण संस्कार है,मैंने बहुत बडा आयोजन रखवाया है| तुम पूरे परिवार को लेकर जरुर आना |' वीणा बहन अपने घर चली गयी |
                        इतना बड़ा आयोजन, और अपनी बेटी ,का इतना सम्मान देख कर बहु के मम्मी-पापा बहुत खुश हुए | ख़ुशी से उनकी आँखे भर आयी थी |
                          समय बीतता रहा,आज राधिका तीन साल की हो गयी थी | वो जब दो साल की थी,तभी से अपनी दादी दया बहन के साथ पूजा-घर मे बालकृष्ण की पूजा के लिए बैठने लगी थी,और छोटी-छोटी बाल चेष्टा करने लगी थी | दया बहन को बहुत आश्चर्य हुआ, जब राधिका उनके आने से पहले पूजा की सभी तैयारी कर देती थी | इतनी कम उम्र मे राधिका की भगवान के प्रति आस्था और सेवा-भावना देख कर दया बहन को बहुत हैरानी हुई |
                             तीन साल की राधिका अपनी दादी से ज्यादा बालकृष्ण की आराधना मे लग गयी | ये सब देख कर उसके पापा ने दया बहन से कहा ''माँ राधिका को अब स्कूल जाना होगा,अगले माह स्कूल खुलने वाला है | ये कैसे पढेगी,इसका सारा टाइम और सारा ध्यान तो पूजा घर मे ही लगा रहता है |'
                                 पापा की ये चिंता, उस वक्त ख़ुशी मे बदल गयी जब राधिका ने पहले ही साल मे क्लास मे सबसे ज्यादा मार्क्स ला कर प्रथम स्थान पर अपना कब्ज़ा किया | ख़ुशी उस वक्त दुगुनी हो गयी, जब स्कूल से ''हेड -मिस्ट्रेस का फोन आया ''आपकी राधिका ने क्लास मे ही नहीं बल्कि चारो सेक्शन मे प्रथम स्थान पाया है,बहुत बधाई , राधिका का भविष्य उज्वल हो | हमे राधिका पर गर्व है |
                              राधिका को अब बालकृष्ण की आराधना करने से कोई नहीं रोकता | सुबह चार उठ कर नित्य क्रिया-क्रम से निवृत होकर, अपने आराध्य के चरणों अपने आप को स्कूल जाने पहले समर्पित कर देती थी | स्कूल से वापस आकर,अपना होम वर्क पूरा करना,माँ को शाम का खाना बनाने मे उनकी मदद करना,फिर सेवा मे लग जाना बस यही रूटीन बन गया था |
                             समय कब पंख लगा कर उड़ जाता है पता ही नहीं चलता | राधिका ने स्कूल टॉप किया,कॉलेज की पढाई पूरी करी | राधिका के मन मे प्रशासनिक अधिकारी बनने का सपना मन मे सालो से पनप रहा था | इसके लिए तैयारी करने के लिए राधिका को दिल्ली जाना पढ़ा |
                                 आखिरकार आज राधिका ''प्रशासनिक अधकारी''बन गयी |आज घर मे उत्सव का सा माहौल है | दया बहन आज बहुत खुश है,सारी कॉलोनी,को भोजन का निमंत्रण दिया है | सभी गण-मान्य लोगो ने राधिका को आशीर्वाद के साथ-साथ उपहार भी दिया |
                              'दया ने अपने बेटे रविकिशन को,राधिका की शादी के लिए रिश्ते देखने की सलाह दी | कितने रिश्ते देखे पर किसी ने हां नहीं कहा | सब ने एक ही आशंका व्यक्त की, कि आपकी बेटी कृष्ण आराधना मे लीन रहती है | उसमे वैराग्य, की भावना कब उत्पन्न हो जाये इसका कोई ठिकाना नहीं है हमे अपने बेटे की शादी करके हमारे वंश को आगे बढ़ाना है | ना की राधिका से शादी कराके चिंता मोल लेनी है |
                              घर वालो के सामने बहुत बड़ी समस्या कड़ी हो गयी,पर राधिका उनको कहती कि आपलोग मेरी शादी की बिलकुल भी चिंता ना करे | बालकृष्ण को सब पता है कब क्या करना है | एक साल की ट्रेनिंग भी पूरी हो गयी |
                              ''कल राधिका को देखने लडके वाले आ रहे है| सब तैयारी आज ही कर लेना |' उसके पापा ने कहा | आखिकार राधिका की शादी तय हो गयी | अगले माह धूम-धाम से शादी हो गयी | ससुराल मे खूब स्वागत हुआ| सास-ससुर ने बेटे-बहु को चार दिन बाद ही शिमला दस दिन घुमने के लिए भेजा |शादी को तीन महीने ही हुए थे,कि सास को पोता चाहिए की डिमांड शुरु हो गयी | अभी तक राधिका की पोस्टिंग होनी बाकी थी,पति से दबाव डलवाया जाने लगा | राधिका एक साल के बाद बच्चा चाहती थी | अब घर मे सब उससे कटे-कटे से रहने लगे,तो वो अपने माँ-पापा के घर रहने आगयी |
                             दो महीने गुजर गये इसी दौरान राधिका की पोस्टिंग भी हो गयी | एक दिन राधिका की सास और पति उसके माँ-पापा के घर उसे वापस लेजाने के लिए आगये | माँ के समजने पर वो उनके साथ ससुराल आगयी | एक साल बाद राधिका के बेटा पैदा हुआ | घर मे जश्न का माहोल था | सास राधिका के पास आयी और उससे कहा ''बहु हमे माफ़ कर देना, हम भी तुम्हारी बालकृष्ण के प्ररि इतनी सेवा भावना देख कर चिंतित थे | तुम्हारे साथ किये ओछे व्यवहार के लिए माफ़ करना |' ''आप नाहक ही चिंतित हुए,मेरे बालकृष्ण मेरे साथ कोई अनहोनी कभी नहीं होने देते है |' राधिका ने सास से कहा |
                           ''क्या तम्हे, कभी अपने बालकृष्ण के दर्शन हुए है ? सास ने कहा | हां कई बार हुए है,कहा राधिका ने | ''कभी हमे भी दर्शन करवा सकती हो ?' कहा सास ने | हां , आप भी करना | जन्माष्टमी आने वाली है,इस दिन दर्शन होते है | आप भी करियेगा | ' राधिका ने कहा |
                              आज जन्माष्टमी है,राधिका ने ऑफिस की छुटी ली और पुरे दिन से कान्हा के जन्दीन की तैयारी मे जुटी हुई है | सास भी बरोबर साथ दे रही है | बालकृष्ण के लिए नये वस्त्र,नया श्रंगार,नया झुला और भोग-सामग्री सब बन गये | ठीक बारह बजे जन्म के समय राधिका ने सास को कहा माँ ,आओ दर्शन करो | पर सास को कोई दर्शन नहीं हुए,बस बंसी की मधुर धुन सुनाई दे रही थी | राधिका को बाल-रूप के दर्शन हुए | सास ने कहा '' हम धन्य हुए आज तुम्हारे कारण,कान्हा की बंसी की धुन सुनी | कभी दर्शन भी होंगे |सास ने अपनी गलती मानी की हमने तुम्हारी भक्ति को शक की नजर से देखा , हमे माफ़ करना | राधिका ने सास को गले से लगाया और कहा '' आप माता-पिता हमारे लिए पूजनीय हो माफ़ी हमसे नहीं कान्हा जी से मांगो | और दोनों की आँखों मे आंसू थे |
       शांति पुरोहित
                       
मेरी कहानी पढना और अपने अनमोल प्रतिभाव देना. "" भक्त,भक्ति और भगवान " "

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Sunday, 2 June 2013

                        अनमोल पल                                                                                                                                                 आज उर्मि अपने अतीत की खट्टी- मीठी यादो मे खोई हुई है,'उमेश ऑफिस चला गया वो  बैठ गयी | सोच रही है कि कालेज के कितने सुहावने दिन थे कितनी मस्ती करते थे |                
                       कालेज मे उसके बहुत सारे दोस्त थे,  सब दोस्त सैर करने जाया करते थे | उर्मि गाना बहुत अच्छा गाती थी ये उन सब को पता था | कालेज के हर उत्सव मे उर्मि गाती थी | जब भी वो  लोग पिकनिक जाते तो सब दोस्त उर्मि से गाना जरुर गवाते थे |
                          कालेज का कोई भी उत्सव उसके गाने के बगैर समाप्त नहीं होता था | वैसे तो सबको उसका गाना पसंद था पर एक लड़का जिसका नाम तक वो  नहीं जानती क्योंकि वो सीनियर स्टूडेंट जो था | उसे उर्मि का  गाना- गाना बहुत पसंद था | उर्मि के किसी भी प्रोग्राम को छोड़ता नहीं बस | उर्मि को  उसके बारे मे कुछ जानने की इच्छा हुई | उसने वंशिका से उसके बारे पता किया वो उसकी क्लास मे पढ़ती थी |
                            कालेज में सबने कहना शुरू कर दिया कि उमेश तुम्हे कितने ध्यान से सुनता है हमे तो लगता है ये उमेश जल्दी ही तुम्हे शादी के लिये प्रपोज करेगा | उर्मि उन सब को हलके से डांट देती थी | वैसे तो कभी उमेश ने बात नहीं की पर उस दिन कालेज का वार्षिक उत्सव था,उर्मि गाने की आखिरी बार रिहर्सल कर  रही थी कि तभी उमेश वहां आया और कहा''समय मिलते ही मुझसे पास के कॉफ़ी हाउस मे मिलना |, उमेश का इस तरह से अचानक कॉफ़ी हाउस मे बुलाना थोडा अजीब लगा | पर उसने जाने का तय किया \
                           कॉफ़ी हाउस मे उमेश पहले से ही बैठा था | उर्मि भी बैठ गयी | कुछ देर की चुपी तोड़ते हुए उमेश ने कहा ''उर्मि तुम बहुत अच्छी गायिका हो |'
'' धन्यवाद , मैंने कहा
'' क्या मै तुमसे दोस्ती कर सकता हूँ ?'
'' हाँ, क्यों नहीं ? उसने कहा |
 वो थोडा सहज हुआ ''मेरा नाम उर्मि है.....''..जानता हूँ , वो बोला ''इसी कालेज मे हूँ नाम तो सब को पता होगा ही  अब उर्मि और उमेश रोज ही मिलने लगे | अब उमेश नोट्स बनाने मे भी उर्मि की मदद कर देता था समय बीतता गया दोस्ती ने जब प्यार का रूप लेना शुरू किया तो उर्मि को लगा ये ठीक नहीं होगा | उमेश और उर्मि की आर्थिक परिस्थिती मे रात दिन का अंतर था वो अमीर बाप का बेटा और उर्मि गरीब बाप की बेटी | शादी अपने से बराबर वाले के साथ ही की जानी चाहिये |
                        एक दिन उमेश ने आकर कहा ''उर्मि ,मै तुमसे शादी करना चाहता हूँ ,उर्मि कुछ तय नहीं कर पारही थी | उसने फिर कहा ''क्या तुम नहीं चाहती ?''उर्मि ने ना बोला '' उर्मि गरीब बाप की बेटी थी  तो उमेश के माँ -पापा शायद उर्मि को पसंद ना करे | '' तुम मुझे पसंद हो,तुम्हारा गाना -गाना मुझे पसंद है |माँ -पापा को मै राजी कर ही लूँगा |उर्मि खुद भी उससे शादी करना चाहती पर कुछ तय नहीं कर पा रही थी |अब उर्मि चुप -चुप सी रहने लगी |एक बार वंशिका ने कहा ''उर्मि तुम्हे आजकल क्या हो गया तेरी सारी मस्ती कहाँ गायब हो गयी ?''
                         उर्मि ने अपने और उमेश के बारे मे सब कुछ वंशिका को बताया उसने उर्मी से कहा तुम्हारा
 मन जो कहता है वो करो और किसी की चिंता मत करो |आज उमेश उर्मि को पूछ रहा था कि उर्मि क्या सोचा तुमने तो उर्मि हंस कर वहां से भाग गयी |अब परीक्षा नजदीक थी उर्मि और उमेश तैयारी मे लग गये थे |
                         कालेज की छुट्टियों मे उर्मि और उमेश की शादी उमेश की माँ की मर्जी के खिलाफ हो गयी |उमेश की माँ को उर्मि पसंद नहीं थी वो अपने बेटे की शादी किसी अमीर घराने की लड़की से करना चाहती थी तो जाहिर सी बात है उनका उर्मि के साथ अच्छा व्यवहार तो नहीं हो सकता था बात -बात पर उर्मि को उसकी गरीबी का एहसास कराया जाता था, उमेश बहुत अच्छे थे पर माँ को कुछ नहीं कहते,|
                       एक बार तो सासूजी ने सारी हद पार करते हुए जो ताना दिया उर्मि को की वो चुप सी हो गयी उर्मि को अब गाना तो दूर की बात किसी से बात करना भी अच्छा नहीं लगता था | उमेश ने कई बार पूछा भी ''उर्मि तुमने गाना क्यों छोड़ दिया,कितनी अच्छी गायिका थी तुम जब तुम शादी करके आई? उर्मि बस उन्हें देखती रहती थी |  उसकी माँ के बारे मे बता कर माँ-बेटे मे दुरी पैदा नहीं करना चाहती थी |
                   एक दिन सासुजी ने उमेश को कहा ''उर्मि को नीचे लेकर आओ,मंदिर चलना है | उर्मि आई और वो  सब गाड़ी मे बैठ गये |उर्मि ने कुछ नहीं पूछा कि हम कहाँ जा रहे है किसी ने कहा होगा की मंदिर ले जाने से ठीक होगा | उमेश सारे रास्ते मेरे बारे मे सोचते रहे कि क्या हुआ है उर्मि को गाना तो दूर बोलती भी नहीं किसी से |
                    अचानक गाड़ी मनोरोग चिकित्सक के अस्पताल के आगे रुकि उर्मि समझ गयी कि उन्होंने उसे पागल समझ के रखा है |दोनों माँ-बेटे बाहर बैठ गये उर्मि डाक्टर के पास चली गयी | करीब दो घंटे बाद बाहर आई,डाक्टर ने उमेश और माँ को कुछ भी बताने से मना किया था | अब माँ-बेटे के समझ नहीं आ रहा था कि डॉ.और उर्मि के बीच क्या बाते हुई होगी |
                    रास्ते मे एक दुकान आई उर्मि ने कहा''जरा गाड़ी रोको,वो दुकान से एक डायरी खरीद कर लायी और कहा ''डॉ.ने कहा कि जो भी दिमाग मे आए वो इस डायरी मे लिखना | उमेश को अच्छा लगा पर सासुजी बडबडाई '' डायरी लिखने के लिये डॉ . के पास आने का इतना खर्चा किया ? उमेश ने मेरे हाथ पर अपना हाथ रखकर कहा ''तुम लिखना, रात को उर्मि तीन बजे तक लिखती रही | इस दौरान उमेश दो बार उठा उसे जगी हुई देख कर वापस सो गया | चार बजे उर्मि सो गयी तब उमेश फिर उठा और डायरी पढने लगा |''गरीब के घर मे पैदा होना गुनाह है,ये मैंने तब जाना जब मेरी सासुजी ने मझसे कहा कि ''तुम्हारे माता-पिता के पास पैसा नहीं था ,वे मुझसे गाना गवा कर कमाई करते थे | मेरा गाना उनकी कमाई का जरिया था | उनकी इस बात से मुझे बहुत टीस पहुंची और मैं खामोश हो गयी | मेरी कला का इतना अपमान ये मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ और उसी दिन से मैंने गाना छोड़ दिया | उमेश बहुत अच्छे थे पर माँ को कुछ नहीं कहते तो मझे उन पर गुस्सा आता था |
                         ये सब पढ़ कर उमेश की आँखों मे आंसू आ गये मे उर्मि को समझ ही नहीं पाया | दुसरे दिन उर्मि दवाई लेने के बाद घर के काम में लग गयी | सारे काम खत्म करके अपने कमरे मे उदास होकर लेट गयी अपनी आज की दशा पर सोचने लगी,तभी उमेश का फोन आया कि'' उर्मि, आज हम दोनों बाहरगाँव घुमने चलेंगे|ये सुनकर उर्मि ख़ुशी से रोने लगी|  शाम को उमेश ने'' माँ को कहा ''मै और उर्मि दो माह के लिये घुमने जा रहे है,आप छोटे भाई -भाभी को बुला लेना या उनके पास चली जाना |
                        मुझे उर्मि को गायिका बना कर ही लाना है | मैंने गाने की वजह से ही इसे चुना था और मेरी वजह से ही इसका गाना बंद हुआ जो अब मुझे इसे वापस देना है उर्मि की आँखों मे आंसू छलकने लगे| क्योंकि ये उसके जीवन के अनमोल पल थे |
                 
             शांति पुरोहित

                        
                             
                         
                           
                        एक नई दिशा          

एक नई दिशा

सुश्री शांति पुरोहित की कहानी    एक नई दिशा    




                                                                                                                                                                                                                                      अचानक रात को ग्यारह बजे माँ के कराहने की आवाज आई ,मै तुरंत उनके कमरे मे गयी | वहां का द्रश्य देख कर मे घबरा गयी | ' माँ पसीने नहायी हुई और बेहोश होगयी थी | पडौस मे रहने वाले 'शर्मा अंकंल को बुलाने के लिए मै उनके घर गयी |दरवाजा खुलते ही मैंने कहा 'अंकल माँ को कुछ हुआ है,आप चलिए मेरे साथ उनको अस्पताल ले जाना है |' अस्पताल पहुँचते ही डॉ. ने उन्हें आई .सी .यू. मे एडमिट कर कर लिया |
                               माँ को दिल का दौरा पड़ा था | डॉ.के प्रयास और दवाइ के असर से माँ को सुबह तक थोडा आराम आया,तो मै घर चली गयी | घर मे मै और माँ दो ही जन थे | पापा का चार साल पहले देहांत तेज सुगर के कारण उनके ऑफिस मे ही हो गया था | रिटायर होने मे पांच साल और बाकी थे | अब उनकी जगह पर भाई को राज्य सरकार ने अनुकम्पा नौकरी दी है | हम इस शहर मे नए है,भाई ऑफिस टूर के लिए दस दिन के लिए उदयपुर गये हए थे | 
                             सुबह नर्स आयी इंजेक्शन  लगाने के लिए मुझे उठाया | 'आपके साथ मे कौन है, ये दवा मंगवानी है |' नर्स ने कहा | 'सिस्टर अभी कुछ ही देर मे मेरी बेटी आने वाली है |' दवाओ के असर से आँखे नींद से बोझिल थी,बस इतना कह कर मै वापस सो गयी | फिर दो घंटे बाद नर्स आयी,उसने सोचा, मै सो रही हूँ तो वापस चली गयी, मै तो ऐसे ही आँखे बंद करके लेटी हुई थी |
                            घर के जरुरी काम करके और मेरा खाना लेकर मेरी बेटी रश्मि आ गयी थी | उसने मुझे खाना खिलाया,फिर आराम से लिटा दिया | 'मैंने उसे मेरे बेटे राज को फोन करने से मना कर दिया, बेकार मे वो चिंता करता और अपना काम छोड़ कर यहाँ आ जाता | मुझे तो डॉ. ने दस दिन तक अस्पताल मे रहने को कह दिया था |' दोपहर को नर्स आयी, मुझे सुबह की दवाई देकर कहा 'आंटी जी अब कैसी तबियत है ?' मै कुछ नहीं बोली बस मुस्करा रही थी | मुझे मुस्कराता देख वो बोली 'क्या हुआ आंटी आप ठीक हो ना |' 'मुझे ऐसा क्यों लगता है जैसे मैंने तुम्हे कहीं देखा है |' मैंने उसे कहा | 'एक जैसे चेहरों से दुनिया भरी पड़ी है | तभी ओ.पी डी.मे से सिस्टर  मौली का नाम पुकारा जाने लगा और वो बात बीच मे छोड़ कर भागी | मै वापस सोने का उपक्रम करने लगी |
                            जब मेरी शादी हुई, पति सरकारी नौकरी में थे,मै ''टीचर ट्रेनिग'' कर रही थी | समय के कब पंख लग गये पता ही नहीं चला | मै दो बच्चो की माँ बन गयी ! राज और रश्मि स्कूल जाने लगे,तभी एक दिन पोस्ट मैन मेरा जोइनिंग लेटर लेकर आया | घर मे मेरी नौकरी लगने से सब खुश थे,बस मे खुश नहीं थी | बच्चो से दूर रहना पड़ेगा ये सोच कर ही मे घबराने लगी | मेरी पोस्टिंग राजस्थान के गाँव पांचू मे हुई,वहां मुझे अकेले ही रहना था ये सोच कर मै दुखी थी |
                             'मेरा दुःख ख़ुशी मे तब बदल गया, जब मेरे ससुर अपना सामान लेकर मेरे साथ चलने को तैयार खड़े थे | ' वहां स्कूल के ही पास हमने किराये का एक घर लिया,घर के काम के लिए एक बाई भी रखली |बाई अपनी बेटी को साथ लेकर आती थी | वो लड़की इतना चपर-चपर करती कि मेरे तो सर मे दर्द हो जाता था | एक बार मैंने मेरी बाई माया को कहा '' अपनी बेटी को स्कूल क्यों नहीं भेज देती,वहां जाएगी तो  कुछ पढना लिखना सीख जाएगी तो भविष्य मे इसके बहुत काम आएगा |' सुनकर पहले तो कुछ नहीं बोली फिर कहा 'कहाँ से पैसा लाऊ ,इसे पढ़ाने का ,दिन भर खटती हूँ ,तब पेट भरने जितना पैसा कमा पाती हूँ |'
                           'सरकारी स्कूल है, ज्यादा खर्चा नहीं होगा,फिर तुम फ़िक्र मत करो मै सारा खर्चा वहन करुँगी | अगले ही दिन से बाई की बेटी मौली स्कूल आने लगी | स्कूल मे मौली का मन पढने से ज्यादा बाते करने मे ज्यादा लगता था | गाँव मे किसके घर मे शादी है,किसके घर मे बच्चा आने वाला है वो सब जानकारी रखती थी | पौडर,क्रीम और काजल के बिना वो कभी स्कूल नहीं आती थी | 'तुम अपना सारा ध्यान इधर-उधर लगाती रहोगी तो पढ़ोगी कब |' मैंने उसे डांटते हुए कहा | मौली हाजिर जवाब तो थी,तुरंत कहा 'मैडम मै पढ़-लिख कर कॉलेज की लेक्चरार बनुगी ,आप देखना मै जरुर बनुगी |मै शादी करके बच्चो को नहीं पालूंगी |'
                           'मौली ने दसवी पास कर ली थी | मै आश्वस्त थी कि मौली ने जो कहा वो करके रहेगी इसी बीच मेरा ट्रांसफर हो गया,मै वो गाँव और मौली सब को भूल कर अपने काम मे व्यस्त हो गयी | समय बीतता रहा | शाम को जब सिस्टर आयी तो मैंने फिर वही सवाल दोहराया तो वो अपने को रोक नहीं सकी और रो पड़ी |, मैंने उसे कुछ देर रोने दिया | 'मैडम आपने मुझे अब तक नहीं पहचाना,मै तो आपको देखते ही पहचान गयी पर आपको बता कर दुखी नहीं करना चाहती थी |' 'क्या हुआ तुम कॉलेज लेक्चरार बनी नहीं,नर्स कैसे बन गयी |' मैंने उससे पूछा | ' हायर सेकंडरी पास करते ही माँ ने मेरी शादी मेरे से ज्यादा उम्र के आदमी के साथ करा दी | मैंने इसे अपनी किस्मत समझ कर स्वीकार कर लिया,पर मेरी किस्मत मे इससे भी ज्यादा बुरे दिन देखने लिखे थे | मेरे पति के एक पत्नी पहले से ही थी| बच्चा नहीं था इसलिए मुझसे बच्चा पाने के लिए दूसरी शादी की वो भी हमे धोखे मे रख कर |' इतना कह कर वो फिर रोने लगी ,अपने आपको सम्भाल कर फिर कहा 'ये सब मै बर्दाश्त नहीं कर सकी, अपने जीवन को एक नई दिशा देने के लिए मै वहां से वापस अपने घर आ गयी|
                             'पति को तलाक दे कर दीन- दुखियो की सेवा करने के लिए नर्स की ट्रेनिग कर के अस्पताल मे मरीजो की सेवा करना ही अब मेरे जीने का उद्देश्य बन गया है |और मै बहुत खुश हूँ | आज आप मिल गये मै बहुत खुश हूँ | इतना कहकर मौली चुप हो गयी और मेरी गोद मे सर रख कर सो गयी थोड़ी देर |
                               दस दिन तक अस्पताल मे मौली ने मेरी बहुत सेवा की | आज मुझे डिस्चार्ज मिलने वाला था | सुबह से मौली बहुत उदास दिख रही थी | घर जाने से पहले मैंने उसे अपने पास बिठा कर कहा 'तुम अब अकेली नहीं हो ,जब भी मन करे आ जाना |,तुम्हारा अपना घर है तुम आओगी तो मुझे अच्छा लगेगा |' हम दोनों के साथ सब लोगो की आँखो से आंसू बहने लगे |
             शांति पुरोहित
मेरी कहानी पढना और अपने अनमोल प्रतिभाव देना. " एक नई दिशा "

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Saturday, 1 June 2013

     वो फ़रिश्ता                                                                                                                                                              रमा के चार बहने और थी ;पिता की कम आमदनी के कारण एक भी पढ़ नहीं पाई थी | रमा नहीं चाहती थी, की उसकी बेटी पैसो के अभाव मे पढने से वंचित ना रह जाये,अपने वश मे जो कुछ होता वो करती जैसे-टीचर से विनती करना, कि वो दिव्या को अपनी बेटी समझ कर बिना पैसो के कोचिंग क्लास मे पढने दे ,समय-समय पर टीचर से मिलकर बेटी की पढाई के बारे मे पूछते रहना ;बस खुद, पढ़ नहीं सकी जिसका उसे बेहद अफसोस है | आज रमा कितनी परेशान है | उसके दुःख का का कोई पारावार नहीं है |  उसकी बेटी के कालेज की फीस भरने के लिए सिर्फ पंद्रह हजार रुपयों की और जरुरत थी| बाकी के रुपयों का इंतजाम रमा  ने इधर-उधर से लेकर कर लिया;कुछ रूपया ब्याज पर लिया,कुछ दोस्तों से उधार लिया,किसी ने तो रूपया देते वक्त लिखवा भी लिया था कि जैसे ही बेटी कमाने लगे पहले हमे वापस देना | कभी तो समाज के लोगो के आगे भी हाथ फैलाया ;क्या-क्या सहना पड़ा, ये उसका ही दिल जानता है |तब बेटी की पढाई बरोबर चलती रही |
                                         रमा के पति किराने की दुकान पर खाता-बही का काम करते थे | बहुत ज्यादा पैसा तो उनको नहीं मिलता था |पर उनकी बेटी दिव्या पढने मे बहुत तेज थी | दिव्या ने जब से पढ़ना शुरू किया हर क्लास मे अव्वल रही | उसकी लगन देख कर माँ ने बेटी के उज्जवल भविष्य का सपना देखना शुरू कर दिया |क्या गरीब लेकिन प्रतिभासंपन बेटी की माँ को बेटी आगे बढे, ये सपना देखना मना है क्या ? अपनी बेटी के भविष्य के बारे मे सोचना क्या गलत बात है ?
                                           बी.ए.तक तो रमा  और मनोहर भाई, दिव्या के पापा, ने अपनी बेटी को जैसे-तैसे कर के पढ़ा दिया | पर अब दिव्या एम.बी.ए.करना चाहती है | दिव्या ने इसके लिए प्रवेश परीक्षा उतीर्ण करली और ''बिरला उच्च शिक्षण संस्थान'' मे उसका चयन भी हो गया ; पर अब फीस की इतनी बड़ी रकम का इंतजाम कैसे किया जाये, ये बड़ी  चिंता रमा को थी | कुल खर्चा ढाई लाख रुपया था,सब भर दिया बस आखिरी साल का पंद्रह हजार रुपया बाकी था | किसे कहे ! क्या करे ? कुछ समझ नहीं आ रहा था | रमा को लगा अब कुछ नहीं हो सकता |
                                       अब तो कोई भी रिश्तेदार, या जान-पहचान वाला नहीं बचा था जिससे मदद ली जा सकती है | फीस भरने के अब सिर्फ पांच ही दिन बचे है | रमा क्या करे, उसके तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा है | उसकी हालत बिना पानी की मछली की तरह हो गयी थी | रमा आज हिम्मत करके अपनी स्कूल की एक सहेली मोना को फोन किया | पर पंद्रह हजार कोई छोटी रकम तो नहीं थी | मोना की भी आर्थिक स्थति ज्यादा अच्छी नहीं थी वो भी मदद नहीं कर सकी |
                                         रमा की चिंता बढती जा रही थी, दिन भी एक ही बचा था | रमा बैठ गयी और पुरानी बातो को याद करने लगी, कि पढने मे कितनी तेज थी दिव्या ,उसकी लगन को देख कर कालेज प्रशाशन ने दिव्या  की बी,ए. की तीनो साल की फीस भी माफ़ कर दी थी | इस बार भी कालेज प्रसाशन ने कोशिश की पर अब उच्च   शिक्षा थी, तो फीस माफ़ करवाना बहुत मुश्किल था | फीस के कारण बेटी आगे पढ़ नहीं पायेगी ,ये सोच कर रमा अब रोने लगी थी |
                                              रमा के बहुत से रिश्तेदार ऐसे थे जिनके पास बहुत पैसा था, वे बहुत कंजूस प्रवति के लोग थे ;वो कहते है कि पैसा नहीं है तो पढने की क्या जरुरत है | | पर रमा उनको मदद के लिए कभी नहीं कहती | वो लोग मंदिरों मे अपने नाम की तख्ती लगाने के लिए,पाठ-पूजा और हवन के लिए और बाकी जगहों पर पैसा दान-पुण्य के काम मे लगाना ज्यादा पसंद करते थे, क्योंकि वहां नाम होता है | पर परिवार की एक प्रतिभाशाली लड़की को पढने मे उसकी कोई मदद नहीं कर सकते थे |  दिव्या का फोन आया 'माँ फीस का इंतजाम हुआ क्या ? क्या कहती रमा बेटी को कि 'नहीं हुआ आज तुम्हारा कॉलेज मे आखिरी दिन है| फिर भी रमा ने कहा 'तुम फिक्र न करो कुछ न कुछ इंतजाम हो जायेगा |
                                              मानसिक थकान थी,आँखे रो-रोकर सूज गयी, रमा सर पकड कर बैठ गयी,तभी डोर-बेल बजी,अब इस वक्त कौन हो सकता है ! दरवाजा खोला तो सामने एक व्यक्ति खड़ा मुस्करा रहा था | रमा ने उसे पहचाना नहीं प्रश्नभरी नजरो से देखने लगी | 'अंदर आने का नहीं कहोगी क्या रमा ? रमा को आश्चर्य हो रहा था कि जिसे मै जानती तक नहीं वो मेरा नाम भी जानता है | रमा ने उन्हें अंदर आने को कहा और दरवाजा खुला ही छोड़ा;ये देख कर वो व्यक्ति मुस्कुराया ; उसके मुस्कुराने का मतलब रमा नहीं समझी | पानी पिलाने के बाद रमा ने कहा 'अब बताइए कौन है आप ! मुझे कैसे जानते है ? जवाब मे उसने एक कवर दिया 'कहा इसमें पंद्रह हजार रूपया है बेटी की फीस भर देना |,रमा को समझ नहीं आ रहा कि ये कौन इंसान है जो इस वक्त भगवान बन कर आया है | 'पहले अपनी पहचान बताइए , मेरी मदद क्यों करना चाहते है ?
                           'शायद तम्हे याद नहीं,हम मिडिल तक साथ पढ़े है ;उस वक्त मेरी माँ मुझे पैसा नहीं देती थी  तुम्हे याद नहीं !सब बच्चे कैंटीन मे खाते,और मै पैसो की वजह से नहीं खाता ,मुझे बहुत बुरा लगता और मै रो पड़ता था |दोस्त चिड़ाते क्या ! खाने के पैसे भी नहीं है ?| तुमने स्कूल की कैंटीन वाले चाचा से मुझे मिलवाकर कहा था कि ये जो भी खाना चाहे दे देना पैसा मे दे दूंगी | ज्यादा अच्छी बात तो ये रही कि तुमने मेरे दोस्तों को या और किसी को कभी ये बात नहीं नहीं बताई जिसके कारण मुझे कभी शर्मिंदा नहीं होना पड़ा | तुम भूल गयी मै अक्सर अपने बच्चो, को ये बात बताता हूँ | कल मोना मिली उसने तुम्हारी बेटी की फीस भरने की परेशानी की बात बताई |मोना, मै और तुम तीनो साथ पढ़े है |  ये मत समझना की मै उस बचपन मे की गयी मदद का बदला चुकाने आया हूँ ; उसका मोल तो मै अपना सब कुछ देकर भी चूका ही नहीं सकता | आगे भी एसी कोई परेशानी हो तो मुझे याद करना,ख़ुशी होगी कि मैंने तुम्हारे लिए कुछ किया | रमा कुछ बोलती उससे पहले वो कवर को टेबल पर रख कर चला गया |
                         रमा की आँखों से आंसू बहने लगे | उसे याद ही नहीं कि उसने स्कूल मे कभी इनकी मदद की थी | जो पौधा उसने अपने बचपन मे लगाया था आज वो पेड़ बन कर फल दे गया है | अब रमा ने बेटी को सूचना की कि 'तुम कल से कॉलेज जा सकोगी | कोई फरिश्ता आया और मेरी मदद कर गया है | रमा ने बेटी को बताया कि इस तरह से लोगो कि मदद करनी चाहिए कि करो और भूल जाओ | रमा ना तो उसे बैठने को कह सकी ना चाय,कॉफ़ी के लिए पूछा ,बस वो तो हैरान थी कि बचपन मे कि गयी किसी कि मदद मेरी बेटी के कितनी काम आई  है |
शांति पुरोहित