Sunday, 2 June 2013

                        एक नई दिशा          

एक नई दिशा

सुश्री शांति पुरोहित की कहानी    एक नई दिशा    




                                                                                                                                                                                                                                      अचानक रात को ग्यारह बजे माँ के कराहने की आवाज आई ,मै तुरंत उनके कमरे मे गयी | वहां का द्रश्य देख कर मे घबरा गयी | ' माँ पसीने नहायी हुई और बेहोश होगयी थी | पडौस मे रहने वाले 'शर्मा अंकंल को बुलाने के लिए मै उनके घर गयी |दरवाजा खुलते ही मैंने कहा 'अंकल माँ को कुछ हुआ है,आप चलिए मेरे साथ उनको अस्पताल ले जाना है |' अस्पताल पहुँचते ही डॉ. ने उन्हें आई .सी .यू. मे एडमिट कर कर लिया |
                               माँ को दिल का दौरा पड़ा था | डॉ.के प्रयास और दवाइ के असर से माँ को सुबह तक थोडा आराम आया,तो मै घर चली गयी | घर मे मै और माँ दो ही जन थे | पापा का चार साल पहले देहांत तेज सुगर के कारण उनके ऑफिस मे ही हो गया था | रिटायर होने मे पांच साल और बाकी थे | अब उनकी जगह पर भाई को राज्य सरकार ने अनुकम्पा नौकरी दी है | हम इस शहर मे नए है,भाई ऑफिस टूर के लिए दस दिन के लिए उदयपुर गये हए थे | 
                             सुबह नर्स आयी इंजेक्शन  लगाने के लिए मुझे उठाया | 'आपके साथ मे कौन है, ये दवा मंगवानी है |' नर्स ने कहा | 'सिस्टर अभी कुछ ही देर मे मेरी बेटी आने वाली है |' दवाओ के असर से आँखे नींद से बोझिल थी,बस इतना कह कर मै वापस सो गयी | फिर दो घंटे बाद नर्स आयी,उसने सोचा, मै सो रही हूँ तो वापस चली गयी, मै तो ऐसे ही आँखे बंद करके लेटी हुई थी |
                            घर के जरुरी काम करके और मेरा खाना लेकर मेरी बेटी रश्मि आ गयी थी | उसने मुझे खाना खिलाया,फिर आराम से लिटा दिया | 'मैंने उसे मेरे बेटे राज को फोन करने से मना कर दिया, बेकार मे वो चिंता करता और अपना काम छोड़ कर यहाँ आ जाता | मुझे तो डॉ. ने दस दिन तक अस्पताल मे रहने को कह दिया था |' दोपहर को नर्स आयी, मुझे सुबह की दवाई देकर कहा 'आंटी जी अब कैसी तबियत है ?' मै कुछ नहीं बोली बस मुस्करा रही थी | मुझे मुस्कराता देख वो बोली 'क्या हुआ आंटी आप ठीक हो ना |' 'मुझे ऐसा क्यों लगता है जैसे मैंने तुम्हे कहीं देखा है |' मैंने उसे कहा | 'एक जैसे चेहरों से दुनिया भरी पड़ी है | तभी ओ.पी डी.मे से सिस्टर  मौली का नाम पुकारा जाने लगा और वो बात बीच मे छोड़ कर भागी | मै वापस सोने का उपक्रम करने लगी |
                            जब मेरी शादी हुई, पति सरकारी नौकरी में थे,मै ''टीचर ट्रेनिग'' कर रही थी | समय के कब पंख लग गये पता ही नहीं चला | मै दो बच्चो की माँ बन गयी ! राज और रश्मि स्कूल जाने लगे,तभी एक दिन पोस्ट मैन मेरा जोइनिंग लेटर लेकर आया | घर मे मेरी नौकरी लगने से सब खुश थे,बस मे खुश नहीं थी | बच्चो से दूर रहना पड़ेगा ये सोच कर ही मे घबराने लगी | मेरी पोस्टिंग राजस्थान के गाँव पांचू मे हुई,वहां मुझे अकेले ही रहना था ये सोच कर मै दुखी थी |
                             'मेरा दुःख ख़ुशी मे तब बदल गया, जब मेरे ससुर अपना सामान लेकर मेरे साथ चलने को तैयार खड़े थे | ' वहां स्कूल के ही पास हमने किराये का एक घर लिया,घर के काम के लिए एक बाई भी रखली |बाई अपनी बेटी को साथ लेकर आती थी | वो लड़की इतना चपर-चपर करती कि मेरे तो सर मे दर्द हो जाता था | एक बार मैंने मेरी बाई माया को कहा '' अपनी बेटी को स्कूल क्यों नहीं भेज देती,वहां जाएगी तो  कुछ पढना लिखना सीख जाएगी तो भविष्य मे इसके बहुत काम आएगा |' सुनकर पहले तो कुछ नहीं बोली फिर कहा 'कहाँ से पैसा लाऊ ,इसे पढ़ाने का ,दिन भर खटती हूँ ,तब पेट भरने जितना पैसा कमा पाती हूँ |'
                           'सरकारी स्कूल है, ज्यादा खर्चा नहीं होगा,फिर तुम फ़िक्र मत करो मै सारा खर्चा वहन करुँगी | अगले ही दिन से बाई की बेटी मौली स्कूल आने लगी | स्कूल मे मौली का मन पढने से ज्यादा बाते करने मे ज्यादा लगता था | गाँव मे किसके घर मे शादी है,किसके घर मे बच्चा आने वाला है वो सब जानकारी रखती थी | पौडर,क्रीम और काजल के बिना वो कभी स्कूल नहीं आती थी | 'तुम अपना सारा ध्यान इधर-उधर लगाती रहोगी तो पढ़ोगी कब |' मैंने उसे डांटते हुए कहा | मौली हाजिर जवाब तो थी,तुरंत कहा 'मैडम मै पढ़-लिख कर कॉलेज की लेक्चरार बनुगी ,आप देखना मै जरुर बनुगी |मै शादी करके बच्चो को नहीं पालूंगी |'
                           'मौली ने दसवी पास कर ली थी | मै आश्वस्त थी कि मौली ने जो कहा वो करके रहेगी इसी बीच मेरा ट्रांसफर हो गया,मै वो गाँव और मौली सब को भूल कर अपने काम मे व्यस्त हो गयी | समय बीतता रहा | शाम को जब सिस्टर आयी तो मैंने फिर वही सवाल दोहराया तो वो अपने को रोक नहीं सकी और रो पड़ी |, मैंने उसे कुछ देर रोने दिया | 'मैडम आपने मुझे अब तक नहीं पहचाना,मै तो आपको देखते ही पहचान गयी पर आपको बता कर दुखी नहीं करना चाहती थी |' 'क्या हुआ तुम कॉलेज लेक्चरार बनी नहीं,नर्स कैसे बन गयी |' मैंने उससे पूछा | ' हायर सेकंडरी पास करते ही माँ ने मेरी शादी मेरे से ज्यादा उम्र के आदमी के साथ करा दी | मैंने इसे अपनी किस्मत समझ कर स्वीकार कर लिया,पर मेरी किस्मत मे इससे भी ज्यादा बुरे दिन देखने लिखे थे | मेरे पति के एक पत्नी पहले से ही थी| बच्चा नहीं था इसलिए मुझसे बच्चा पाने के लिए दूसरी शादी की वो भी हमे धोखे मे रख कर |' इतना कह कर वो फिर रोने लगी ,अपने आपको सम्भाल कर फिर कहा 'ये सब मै बर्दाश्त नहीं कर सकी, अपने जीवन को एक नई दिशा देने के लिए मै वहां से वापस अपने घर आ गयी|
                             'पति को तलाक दे कर दीन- दुखियो की सेवा करने के लिए नर्स की ट्रेनिग कर के अस्पताल मे मरीजो की सेवा करना ही अब मेरे जीने का उद्देश्य बन गया है |और मै बहुत खुश हूँ | आज आप मिल गये मै बहुत खुश हूँ | इतना कहकर मौली चुप हो गयी और मेरी गोद मे सर रख कर सो गयी थोड़ी देर |
                               दस दिन तक अस्पताल मे मौली ने मेरी बहुत सेवा की | आज मुझे डिस्चार्ज मिलने वाला था | सुबह से मौली बहुत उदास दिख रही थी | घर जाने से पहले मैंने उसे अपने पास बिठा कर कहा 'तुम अब अकेली नहीं हो ,जब भी मन करे आ जाना |,तुम्हारा अपना घर है तुम आओगी तो मुझे अच्छा लगेगा |' हम दोनों के साथ सब लोगो की आँखो से आंसू बहने लगे |
             शांति पुरोहित
मेरी कहानी पढना और अपने अनमोल प्रतिभाव देना. " एक नई दिशा "

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Saturday, 1 June 2013

     वो फ़रिश्ता                                                                                                                                                              रमा के चार बहने और थी ;पिता की कम आमदनी के कारण एक भी पढ़ नहीं पाई थी | रमा नहीं चाहती थी, की उसकी बेटी पैसो के अभाव मे पढने से वंचित ना रह जाये,अपने वश मे जो कुछ होता वो करती जैसे-टीचर से विनती करना, कि वो दिव्या को अपनी बेटी समझ कर बिना पैसो के कोचिंग क्लास मे पढने दे ,समय-समय पर टीचर से मिलकर बेटी की पढाई के बारे मे पूछते रहना ;बस खुद, पढ़ नहीं सकी जिसका उसे बेहद अफसोस है | आज रमा कितनी परेशान है | उसके दुःख का का कोई पारावार नहीं है |  उसकी बेटी के कालेज की फीस भरने के लिए सिर्फ पंद्रह हजार रुपयों की और जरुरत थी| बाकी के रुपयों का इंतजाम रमा  ने इधर-उधर से लेकर कर लिया;कुछ रूपया ब्याज पर लिया,कुछ दोस्तों से उधार लिया,किसी ने तो रूपया देते वक्त लिखवा भी लिया था कि जैसे ही बेटी कमाने लगे पहले हमे वापस देना | कभी तो समाज के लोगो के आगे भी हाथ फैलाया ;क्या-क्या सहना पड़ा, ये उसका ही दिल जानता है |तब बेटी की पढाई बरोबर चलती रही |
                                         रमा के पति किराने की दुकान पर खाता-बही का काम करते थे | बहुत ज्यादा पैसा तो उनको नहीं मिलता था |पर उनकी बेटी दिव्या पढने मे बहुत तेज थी | दिव्या ने जब से पढ़ना शुरू किया हर क्लास मे अव्वल रही | उसकी लगन देख कर माँ ने बेटी के उज्जवल भविष्य का सपना देखना शुरू कर दिया |क्या गरीब लेकिन प्रतिभासंपन बेटी की माँ को बेटी आगे बढे, ये सपना देखना मना है क्या ? अपनी बेटी के भविष्य के बारे मे सोचना क्या गलत बात है ?
                                           बी.ए.तक तो रमा  और मनोहर भाई, दिव्या के पापा, ने अपनी बेटी को जैसे-तैसे कर के पढ़ा दिया | पर अब दिव्या एम.बी.ए.करना चाहती है | दिव्या ने इसके लिए प्रवेश परीक्षा उतीर्ण करली और ''बिरला उच्च शिक्षण संस्थान'' मे उसका चयन भी हो गया ; पर अब फीस की इतनी बड़ी रकम का इंतजाम कैसे किया जाये, ये बड़ी  चिंता रमा को थी | कुल खर्चा ढाई लाख रुपया था,सब भर दिया बस आखिरी साल का पंद्रह हजार रुपया बाकी था | किसे कहे ! क्या करे ? कुछ समझ नहीं आ रहा था | रमा को लगा अब कुछ नहीं हो सकता |
                                       अब तो कोई भी रिश्तेदार, या जान-पहचान वाला नहीं बचा था जिससे मदद ली जा सकती है | फीस भरने के अब सिर्फ पांच ही दिन बचे है | रमा क्या करे, उसके तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा है | उसकी हालत बिना पानी की मछली की तरह हो गयी थी | रमा आज हिम्मत करके अपनी स्कूल की एक सहेली मोना को फोन किया | पर पंद्रह हजार कोई छोटी रकम तो नहीं थी | मोना की भी आर्थिक स्थति ज्यादा अच्छी नहीं थी वो भी मदद नहीं कर सकी |
                                         रमा की चिंता बढती जा रही थी, दिन भी एक ही बचा था | रमा बैठ गयी और पुरानी बातो को याद करने लगी, कि पढने मे कितनी तेज थी दिव्या ,उसकी लगन को देख कर कालेज प्रशाशन ने दिव्या  की बी,ए. की तीनो साल की फीस भी माफ़ कर दी थी | इस बार भी कालेज प्रसाशन ने कोशिश की पर अब उच्च   शिक्षा थी, तो फीस माफ़ करवाना बहुत मुश्किल था | फीस के कारण बेटी आगे पढ़ नहीं पायेगी ,ये सोच कर रमा अब रोने लगी थी |
                                              रमा के बहुत से रिश्तेदार ऐसे थे जिनके पास बहुत पैसा था, वे बहुत कंजूस प्रवति के लोग थे ;वो कहते है कि पैसा नहीं है तो पढने की क्या जरुरत है | | पर रमा उनको मदद के लिए कभी नहीं कहती | वो लोग मंदिरों मे अपने नाम की तख्ती लगाने के लिए,पाठ-पूजा और हवन के लिए और बाकी जगहों पर पैसा दान-पुण्य के काम मे लगाना ज्यादा पसंद करते थे, क्योंकि वहां नाम होता है | पर परिवार की एक प्रतिभाशाली लड़की को पढने मे उसकी कोई मदद नहीं कर सकते थे |  दिव्या का फोन आया 'माँ फीस का इंतजाम हुआ क्या ? क्या कहती रमा बेटी को कि 'नहीं हुआ आज तुम्हारा कॉलेज मे आखिरी दिन है| फिर भी रमा ने कहा 'तुम फिक्र न करो कुछ न कुछ इंतजाम हो जायेगा |
                                              मानसिक थकान थी,आँखे रो-रोकर सूज गयी, रमा सर पकड कर बैठ गयी,तभी डोर-बेल बजी,अब इस वक्त कौन हो सकता है ! दरवाजा खोला तो सामने एक व्यक्ति खड़ा मुस्करा रहा था | रमा ने उसे पहचाना नहीं प्रश्नभरी नजरो से देखने लगी | 'अंदर आने का नहीं कहोगी क्या रमा ? रमा को आश्चर्य हो रहा था कि जिसे मै जानती तक नहीं वो मेरा नाम भी जानता है | रमा ने उन्हें अंदर आने को कहा और दरवाजा खुला ही छोड़ा;ये देख कर वो व्यक्ति मुस्कुराया ; उसके मुस्कुराने का मतलब रमा नहीं समझी | पानी पिलाने के बाद रमा ने कहा 'अब बताइए कौन है आप ! मुझे कैसे जानते है ? जवाब मे उसने एक कवर दिया 'कहा इसमें पंद्रह हजार रूपया है बेटी की फीस भर देना |,रमा को समझ नहीं आ रहा कि ये कौन इंसान है जो इस वक्त भगवान बन कर आया है | 'पहले अपनी पहचान बताइए , मेरी मदद क्यों करना चाहते है ?
                           'शायद तम्हे याद नहीं,हम मिडिल तक साथ पढ़े है ;उस वक्त मेरी माँ मुझे पैसा नहीं देती थी  तुम्हे याद नहीं !सब बच्चे कैंटीन मे खाते,और मै पैसो की वजह से नहीं खाता ,मुझे बहुत बुरा लगता और मै रो पड़ता था |दोस्त चिड़ाते क्या ! खाने के पैसे भी नहीं है ?| तुमने स्कूल की कैंटीन वाले चाचा से मुझे मिलवाकर कहा था कि ये जो भी खाना चाहे दे देना पैसा मे दे दूंगी | ज्यादा अच्छी बात तो ये रही कि तुमने मेरे दोस्तों को या और किसी को कभी ये बात नहीं नहीं बताई जिसके कारण मुझे कभी शर्मिंदा नहीं होना पड़ा | तुम भूल गयी मै अक्सर अपने बच्चो, को ये बात बताता हूँ | कल मोना मिली उसने तुम्हारी बेटी की फीस भरने की परेशानी की बात बताई |मोना, मै और तुम तीनो साथ पढ़े है |  ये मत समझना की मै उस बचपन मे की गयी मदद का बदला चुकाने आया हूँ ; उसका मोल तो मै अपना सब कुछ देकर भी चूका ही नहीं सकता | आगे भी एसी कोई परेशानी हो तो मुझे याद करना,ख़ुशी होगी कि मैंने तुम्हारे लिए कुछ किया | रमा कुछ बोलती उससे पहले वो कवर को टेबल पर रख कर चला गया |
                         रमा की आँखों से आंसू बहने लगे | उसे याद ही नहीं कि उसने स्कूल मे कभी इनकी मदद की थी | जो पौधा उसने अपने बचपन मे लगाया था आज वो पेड़ बन कर फल दे गया है | अब रमा ने बेटी को सूचना की कि 'तुम कल से कॉलेज जा सकोगी | कोई फरिश्ता आया और मेरी मदद कर गया है | रमा ने बेटी को बताया कि इस तरह से लोगो कि मदद करनी चाहिए कि करो और भूल जाओ | रमा ना तो उसे बैठने को कह सकी ना चाय,कॉफ़ी के लिए पूछा ,बस वो तो हैरान थी कि बचपन मे कि गयी किसी कि मदद मेरी बेटी के कितनी काम आई  है |
शांति पुरोहित


                                                                                                                                                                                                                                     
                          दूध का जला छाछ को भी फूंक कर पिता है          
                                                                                                                                                             मीरा चाची के बेटे विनय की शादी का अवसर था | मीरा चाची को मैंने पिछले कई दिनों से आराम करते हुए नहीं देखा,बिना थके और अति उत्साह के साथ काम करने मे लगी है | ना खाने-पीने की चिंता और ना पल भर आराम करती है | बस एक ही चिंता है कि बेटे की शादी मे कोई कसर ना रहे,बहु रीमा के स्वागत मे कोई कमी ना रहे बस | शादी मे कुछ दिन ही रह गये है तो सारे रिश्तेदार और मेंहमान भी आ गये है | कहते है ना सुख -दुख मे रिश्तेदार ना आये तो क्या मजा |  घर वालो के आने से ही ख़ुशी मे चार चाँद लग जाते है | मीरा के घर मे रिश्तेदारो  की खूब चहल -पहल थी |
                                      ''जगदीश, तुम यहाँ खड़े क्या कर रहे हो,जाओ तुम हलवाई के पास ही रहो उनको किसी भी चीज के लिये परेशान ना होना पड़े | दिवाकर तुम टेन्ट वाले से सारा सामान  टाइम पर भेजने के लिये अभी ही फोन करके बोल दो,और हाँ डेकोरेशन वाले भी आ गये है' चिराग, तुम पूरा घर दुलहन की तरह सजा देना कोई कसर ना रखना |'' मीरा चाची ने डेकोरेशन वाले चिराग भाई को कहा ''गोपाल तुम सब मेहमानों के खाने,और ठरहने की व्यवस्था देखो | जाओ सब अपने अपने काम मे लग जाओ | मीरा चाची ने सब को काम समझाया| और अब वो पंडित से मांगलिक कार्य शुरू करने का शुभ मोहरत पूछने मे व्यस्त हो गयी है|''

                                       तभी चाचा ने मीरा चाची को बुलाया और कहा कि''बहु के लिये जेवर आ गये हैऔर हाँ, सोनी जी से मैंने कुछ और जेवर मंगवाए है पसंद कर लो बहु को  पहली बार खाना बनाने की रश्म अदायगी के बाद सगुन जो देना| '' जब तक मीरा आंटी ये सब काम ख़तम करती उससे पहले ही औरतो ने मंगल गीत गाकर बेटे की हल्दी की रश्म शुरू कर दी | मीरा चाची ने अपने लाडले बेटे के हल्दी लगा कर उसका माथा चूम लिया और दुसरे कामो मे व्यस्त हो गयी |
                                       दुसरे दिन मेहदी और महिला संगीत का बहुत ही भव्य कार्यक्रम हुआ सब ने बहुत ही सराहा | आज विनय की बारात धूम -धाम से बहु को लेने गयी है | अब मीरा चाची ने आज थोडा आराम किया है |
                                आखिरकार मीरा चाची की बहु घर आ गयी | बहु का खूब स्वागत किया | बेटे और बहुको देख कर मीरा चाची ख़ुशी का अनुभव कर रही थी | जैसे उनके घर मे दुनिया भर की खुशिया आ गयी हो बहु के आने से,  और मन मे ये भी सोच रखा था कि बहु को सब कुछ सौंप कर घर के काम से अब छुट्टी  ले लुंगी और  आराम का जीवन बसर करुँगी  | मीरा चाची ने दोनों को घुमने के लिये सिंगापूर भेजा| उनके लिये बेटे -बहु की खुशियों से बढ़ कर कुछ नहीं था |बेटे -बहु दस दिन बाद घूम कर वापस आ गये |दोनों बहुत खुश है |बहु ने सास का शुक्रिया माना कि उनको इतना अच्छा घुमने का मौका दिया |अब धिरे -धिरे बहु घर के काम मे लग गयी एक बहु के लिये जब वो नई -नई ससुराल आती है तो उहे पता चलता है कि उसके मायके की रीत और उसकी ससुराल की रीत मे फर्क होता है | तो रीना का भी सब तरीका जैसे रहने का ,खाना बनाने का तरीका अलग था |तो मीरा चाची ने रीमा से कहा ''चलो मे तुम्हे यहाँ के कुछ तौर- तरीके सीखा देती हूँ |फिर धीरे -धीरे तुम सब सीख जाओगी , पर रीमा ने सीधा जवाब दे दिया कि ''नहीं सीखना मुझे नया तरीका अगर मेरे तरीके से आप को रहना है तो ठीक ,नहीं तो आप ही खाना बनाते रहिये |''ये सुन कर चाची को बहुत ही हैरानी हुई |अब तो दिन ब दिन उसका व्यवहार बिगड़ता ही जा रहा था |अब चाचा -चाची को दुःख तो इस बात का ज्यादा हो रहा था कि ये सब देखने के बावजूद भी विनय अपनी पत्नी को कभी कुछ नहीं बोलता था | अभी शादी को दो माह ही हुए थे | एक दिन मीरा आंटी ने बहु से कहा''रीमा ''मुझे एक कप चाय दे दो आज सर मे बहुत दर्द है|''कितनी बार चाय बनाउ क्या मे चाय और खाना बनाने के लिये ही आई हूँ यहाँ,मेरे पास भी करने को और भी काम है और हाँ चाय तो आप भी बना सकती है,इतना बड़ा जवाब देकर रीमा अपने कमरे मे तम -तमाती चली गयी |
                              मीरा आंटी बहु से ये सब सुन कर हैरान हो गयी उसने बहु से ऐसा तो कुछ कहा नहीं कि उसे इतना गुस्सा करना पड़ा | बहु से इतना तो हर सास -ससुर उम्मीद रखते है कि बहु खाना नाश्ता और चाय तो बना कर दे| मीरा चाची को बहु के इस बर्ताव से बहुत ठेस पहुंची है पर उन्होंने तय किया कि विनय के पापा को ये सब वो नहीं बताएगी |
                               लेकिन बात यही पर ही ख़तम नहीं होती है अब तो रीमा का जैसे ये रोज का ही काम हो गया था | अब तो ससुर जी के सामने भी वो ये सब करने लगी थी | उस दिन विनय के पापा को जल्दी ऑफिस जाना था | मीरा भी रसोई मे गयी है रीमा की मदद करने, लेकिन रसोई तो बंद पड़ी थी | और उसी वक्त रीमा तैयार होकर पहले से ही तय किट्टी पार्टी मे अपने दोस्तों के साथ चली गयी | मीरा चाची हैरान रह गयी अब इतनी जल्दी वो अकेली कैसे खाना बनाएगी | बहु को विनय के पापा ने भी देखा जाते हुए उन्हें बहुत गुस्सा आया पर मीरा चाची ने बोलने से मना किया उनका ये मानना है कि घर की औरतो के बीच मे आदमी को नहीं बोलना चाहिए घर का माहौल और बिगड़ जाता है | बहुत बार बोलना चाहा उन्होंने पर हर बार चाची उन्हें चुप करा देती थी| वो अपनी पत्नी को बहु से कुछ भी सुनते हुए देखते तो दुखी हो जाते थे |
                                  ऐसा कब तक बर्दास्त किया जा सकता है आखिरकार एक साल के बाद उन्होंने एक फैसला किया | उस रात जब सब खाना खा रहे थे, तो चाचा ने विनय को एक चाबी दी और कहा कि ''विनय ये तुम्हारे लिये नए घर की चाबी है| तुम कल से ही वहां चले जाओ | तुम्हारी पत्नी का बर्ताव अब बर्दाश्त नहीं होता | जब घर तुम्हारी मम्मी को ही संभालना है तो दिल मे सुकून तो होना चाहिए ना | अब मीरा चाची और अखिलेश चाचा छोटे बेटे रंजन के साथ आराम से रहने लगे | रंजन का इंजीनियरिंग का अन्तिम वर्ष चल रहा था |
                                 मीरा चाची उन कडवी यादो को भूल जाना चाहती थी पर वो अनचाही यादे उनका दामन ही नहीं छोड़ रही थी | अक्सर मीरा चाची और अखिलेश चाचा बाते करते है कि अब छोटे बेटे की शादी करनी है |पर अभी तक बड़ी बहु के व्यव्हार से डरे हुए है | पर इस कारण रंजन को कुंवारा तो नहीं रख सकते | पर लड़की अगर रीमा जैसी ही निकली तो फिर से वो सब देखना पड़ेगा | पर ये जिम्मेदारी भी पूरी तो करनी है तो अब लड़की की तलाश शुरू हुई |
                                   पर रंजन ने तय कर लिया था कि उसे शादी नहीं करनी है |भाभी के लिये उसके दिल मे एक माँ जैसे छवि थी|  भाभी के लिये एक सम्मान की भावना थी, पर भाभी ने अपने बेरुखेपन से सब धूमिल कर दिया | अब वो शादी करके अपने और अपने माता पिता को और दुखी नहीं करना चाहता था | मीरा चाची ने उसे समझाया की सब लडकिया एक जैसी थोड़ी होती है |पर उसको कैसे यकीन दिलाया जाये |
                                        मीरा चाची ने अपनी इस उलझन के साथ रंजन के लिये लड़की देखने का सिलसिला शरू किया | कुछ रिश्ते इनको नहीं जंचते होते थे और कुछ अपनी लड़की का रिश्ता इनके यहाँ नहीं करना चाहते थे | अब इनके सामने डर के साथ निराशा भी थी | समय बीतता रहा आखिरकार अखिलेश चाचा की बहन ने एक रिश्ता बताया | आज सब रेणु को देखने उसके घर जा रहे है | रेणु तो एक नजर मे ही सब को पसंद आ गयी थी | वो थी भी बहुत सुंदर,चंचल और उसकी माँ ने बताया पढ़ी लिखी होने के साथ -साथ वो घर के सब काम मे दक्ष है | संस्कारो वाली लड़की थी |
                                       अब मीरा चाची के घर फिर से शहनाई बजेगी फिर से घर मे बहु आएगी सब खुश थे,पर फिर भी जेहन मे कहीं दूर हल्का सा डर भी था कि ..........
    रेणु ने अपने शादी को लेकर बहुत से अरमान अपने दिल मे सजा के रखे है | रेणु को खुले विचारो वाली सास पसंद थी | पति बहुत प्यार करने वाला हो और ससुर जी पिता के समान उसे अपनी बेटी समझे इस तरह उसने और भी कई अरमान दिल मे सजा कर रखे है |
                                      पर यहाँ तो सब उल्टा ही मिला सास ने कभी किसी काम की तारीफ नहीं की और ना ही झगड़ा किया रंजन ने भी ज्यादा प्यार नहीं दिखाया | अब रेणु क्या करे उसने ये तो सोचा भी नहीं था कि ऐसा सब होगा |कई बार रेणु ने जानना चाहा कि ऐसा क्यों कर रहे है क्या बात है पर कोशिश करने पर भी कुछ नहीं हुआ | धिरे -धिरे रेणु की तबियत बिगड़ने लगी तो मीरा चाची को भी फिक्र हुई | समय ऐसे ही बीतता रहा |दो साल होने को आये रेणु को अपनी ससुराल मे| एक दिन अचानक अखिलेश चाचा को दिल का दौरा पड़ा | उनको अस्पताल मे भर्ती किया गया | इस संकट की घड़ी मे बड़ी बहु रीमा ने कुछ देर के लिये आकर महज औपचारिकता ही पूरी करी | पर रेणु ने अपना पूरा क्रतव्य निभाया सुबह से लेकर शाम तक वो सेवा मे लगी रहती | ससुरजी को दवा देना सास के लिये खाना लाना और फिर घर मे रंजन के लिये नाश्ता बनाना आदि सब कुछ वो कर रही थी |पन्द्रह दिन बाद ससुरजी को अस्पताल से छुटी दे दी गयी |
                                इन पंद्रह दिनों मे रेणु का अपने ससुराल वालो के प्रति प्यार देखकर मीरा चाची को बहुत अच्छा लगा | और उन्होंने सोचा कि इतनी अच्छी बहु के साथ हम इतने दिनों क्यों प्यार नहीं जता पाए ये तो आई तब से ही इसने हम सब की कितनी सेवा की है हमने इसे समझने मे कितनी देर लगा दी पर हम भी क्या कर सकते है बड़ी बहु रीमा के कारण ये सब रेणु के साथ करना पड़ा कहते है ना कि दूध का जला छछ को भी फूंक कर पीता है तभी रेणु सास के कमरे मे चाय देने आयी रेणु को देख कर मीरा चाची अपने को रोक नहीं सकी और झट से रेणु को गले से लगाया और अपने रूखे वयवहार के लिये माफ़ी मांगी | रेणु तो कब से तरस रही थी सास के प्यार पाने के लिये रेणु संस्कारो वाली थी कहा ''माँ आज मेरा इस घर मे आना सार्थक हुआ है आपने मुझे दिल से अपनाया |''है और सास बहु दोनों की आँखों ख़ुशी के आंसू थे |
   
                           शांति पुरोहित

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ये कहानी भी पढना और प्रतिभाव देना


                                         
                               
मायाजाल
रीटा के पापा मिस्टर आर. माथुर बैंक मे मैनेजर है;लेकिन अभी तक अपना खुद का घर नहीं बना सके थे हर दो साल बाद उनका तबादला किसी दुसरे शहर मे  हो जाता था तो कैसे ! और कहाँ घर बनाये ! हाँ,गाँव मे उनका पुश्तैनी  घर था,पर उस घर को तो उन्होंने बचपन मे अपनी पढाई के कारण छोड़ दिया था उनको गाँव छोड़े बहुत साल हो गये थे मिस्टर आर.माथुर के माता-पिता इसी आशा मे बैठे थे, कि एक दिन उनका बेटा पढ़-लिख कर आएगा और गाँव की भलाई के लिए काम करेगा ;पर उनका ये सपना उस वक्त टूट कर बिखर गया जब बेटे ने कहा 'मेरी कानपूर की स्टेट बैंक मे नौकरी लगी है; और मै, आपको लेने के लिए आया हूँ |
बड़ा घर लिया है हम सब आराम से रहेंगेउन्होंने इंकार कर दिया ''इस उम्र मे गाँव छोड़ कर हम कहीं नहीं जायेगे,बहुत समझाया कि इस उम्र मे अकेले कैसे रहोगेपर वो माने नहींदो साल बाद आर.माथुर ने माधवी से एक सादे समारोह मे माता-पिता की उपस्तिथि मे शादी कर ली |
माधवी बहुत समझदार थी, उसने आते ही अपने सास -ससुर को अपने पास रहने के लिए राजी कर लिया  समय बीतता रहा ,माधवी ने एक सुंदर सी लड़की रीटा को जन्म दिया | समय बीतता रहा | बेटी रीटा अब थोड़ी बड़ी  हो गयी | घर मे वो सिर्फ माँ को ही देखती थी ,क्योंकि मिस्टर आर.माथुर तो जल्दी ही बैंक निकल जाते थे | रीटा पापा को बहुत मिस करती, पर पापा तो छुटी के दिन के आलावा कभी उसके साथ नहीं रहते थे | पूरा दिन अपने काम मे व्यस्त रहते रहते थे | देखा गया है कि बेटी को पापा से ज्यादा लगाव रहता है | रीटा भी पापा के साथ रहना चाहती थी,उनके साथ खेलना और बाहर घ्हुमना चाहती थी |
दिन महीने साल बीतते गये | ''पापा हमारा घर कब बनेगा'' पूछा रीटा ने माधवी भी तो अब यही चाहती थी की रीटा अब बड़ी हो गयी है कुछ समय बाद उसकी शादी भी करनी है तो अपना खुद का घर तो होना ही चाहिये ना अब मिस्टर आर.माथुर के सेवा निवृति मे भी सिर्फ दो साल का समय बचा था मिस्टर आर.माथुर ने बेटी को जवाब मे कुछ नहीं कहा और बैंक चले गये |
आज मिस्टर आर.माथुर ने,  राज प्रोपर्टी डीलर से अपने लिए एक फ़्लैट बुक करवाया बैंक का काम जल्दी से ख़त्म किया और घर पहुँच गये माधवी और रीटा को जल्दी से तैयार होने को बोल कर खुद फ्रेश होने वाशरूम चले गये |माधवी और रीटा को बहुत पसंद आया अपना नया घर और आखिर कुछ दिनों बाद रीटा और माधवी को अपना नया घर मिल गया था |
रीटा रोज पापा से घर मे इंटीरियर डेकोरेशन के लिए कहती थी पर मिस्टर आर.माथुर के घर के काम के लिए वक्त ही नहीं बचता ,बस घर से बैंक और बैंक से घर आने-जाने मे वक्त ख़त्म हो जाता था पर आज उन्होंने रीटा की ये शिकायत भी ख़त्म करने की ठानली और कृष्णा इंटीरियर डेकोरेटर के मालिक सिंह साब को फोन किया |उन्होंने शाम तक आदमी भेजने का बोला |
                          आज जब घर की डोर-बैल बजी तो दरवाजा रीटा ने खोला सामने एक बहुत ही आकर्षक लड़का खड़ा था |

रीटा मंत्र-मुग्ध होकर खड़ी उसे देखती ही रह गयी तभी वो लड़का बोला मेम,मेरा नाम पुष्कर है, मै, ''कृष्णा इंटीरियर डेकोरेटर कंपनी'' से आया हूँ ओहयस अंदर आइये,और रीटा पुष्कर को घर के अंदर ले गयी पुष्कर ने  थोड़ी देर घर को देखा और कहा 'एक दो दिन मे काम शुरू कर दूंगा, कह कर चला गया |
रात को खाना-खाने के वक्त मिस्टर आर.माथुर ने देखा आज पत्नी और बेटी दोनों काफी खुश लग रही है | ''क्या बात है आज इतनी खुश ख़ुशी का कोई कारण तो बताओ|' रीटा ने कहा ''एक दो दिन मे इंटीरियर का काम चालू हो रहा है; और अब जल्दी से घर के इनोग्रेशन की डेट भी तय करनी है और भी बहुत से काम करने है अब जल्दी से मेरे सारे दोस्तों को मेरा घर दिखाना है |
पुष्कर और रीटा दोनों ने साथ मिलकर इंटीरियर का काम किया तो दोनों मे नजदीकिया बढ़ गयी घर के आलावा वो दोनों बाहर होटल,पार्क और कॉफ़ी शॉप पर भी मिलने लगे थे आज जब वो दोनों काफी शॉप पर बैठे थे पुष्कर ने रीटा को शादी करने के लिए कहा,तो रीटा ने कहा ''पापा से बात करुँगी |'
मिस्टर आर.माथुर ने शादी के लिए इस लिए इंकार कर दिया क्योंकि पुष्कर दूसरी जाति का था लेकिन रीटा और पुष्कर को तो अब कोई भी बंधन शादी करने से रोक नहीं सकता था उन दोनों ने कौर्ट मे शादी करने का फैसला किया, और दो महीने बाद दोनों ने शादी कर ली जब मिस्टर आर.माथुर को बेटी की इस हरकत का पता चला तो खुद को ही इसके लिए जिम्मेदार समझा उन्होंने पत्नी से कहा ''मै थोडा समय अगर अपनी बेटी के लिए भी निकालता तो शायद ये ना होता रीटा मुझे बहुत मिस करती ,थी पर मैंने उसकी इस जरूरत की तरफ कभी ध्यान ही नहीं दिया काम के मायाजाल मे फंसा रहाऔर आज मुझे ये दिन देखना पड़ा क्या इज्ज़त रह जाएगी मेरी जब सब को पता चलेगा कि मेरी बेटी ने इस तरह से शादी करी है | माधवी और आर.माथुर दोनों ने ये माना है कि घर मे जवान लड़की थी;इंटीरियर के लिए आने वाला पुष्कर भी रीटा की हम उम्र था,तो हमे सजग रहना था | आज के ज़माने के लड़के-लड़की तो बहुत ही आधुनिक विचारो वाले होते है | आज की नयी पीढ़ी के बच्चे अपनी सोच-समझ को ही सही मानते है | माधवी ने कहा 'मै तो कहती हूँ ;हर माता-पिता को अपने जवान होते बच्चो पर नजर रखनी ही चाहिये,और अगर उन्हें कुछ लगे तो बच्चो का मन टटोल कर उनसे वो सब जानना चाहिये ,जो उनके दिमाग मे चल रहा हो;और माता पिता को पता भी नहीं है | तभी माता-पिता का अपने बच्चो के प्रति सही मायनो मे अपना फर्ज निभाना मानना चाहिये |,
मिस्टर माथुर कुछ महीनो बाद रीटा से मिलने उसकी ससुराल गये एक ही बेटी थी,तो उससे ज्यादा दिन तक  दूर नहीं रह सकते थे पर वहां देखा कि पुष्कर का घर बहुत छोटा था रहने वाले कुल पांच जन थे ये देख कर तो वो और भी दुखी हुए और तय किया कि रीटा को नया घर देंगे |जब रीटा और पुष्कर घर पापा-मम्मी से मिलने आये तो एक चाबी पुष्कर को दी कहा ''ये तुम्हारे और तम्हारे परिवार के लिए घर हैअब से इसमें आराम से रहो मेरे तो रीटा के आलावा और कोई संतान भी नहीं है तो मेरे रहते मेरी बेटी कैसे तखलीफ़ मे रह सकती है मिस्टर आर.माथुर भावुक हो गये और रीटा और उसकी माँ भी रोने लगी थी |
शांति पुरोहित


  दीया तले अँधेरा                                                                                               समाज कल्याण विभाग के प्रमुख रमाशंकर अपने माता-पिता की एक मात्र संतान थे| उनके माता -पिता ने उनका विवाह बड़े ही धूम-धाम से पास ही के गाँव के नगर सेठ की बेटी सीता से करा दिया था | रामशंकर के माता-पिता सुन्दर सुशील बहू को पाकर बहुत खुश थे | सीता सुन्दर तो थी ही साथ ही पढ़ी-लिखी और समझदार भी थी| रमाशंकर भी इतनी गुणवान पत्नी पाकर बहुत खुश था |
शादी के एक साल बाद घर मे बच्चे की किलकारी गूंजने की खबर से सब खुश थे| अपने वंश को आगे बढ़ता जान सब खुश थे, पर सीता को उन सब की ये बात पसंद नहीं आई, लड़की भी हो सकती है पर कुछ कह नहीं सकी और सीता ने बेटी को जन्म दिया | घर के सारे लोग नाराज हुए पर इसमें उसका क्या दोष था | बातो -बातो मे सीता ने अपने पति को समझाया कि पति-पत्नी मे से किसी एक मे कुछ कमी रहती है तो बेटी होती है वैसे सीता को पता था पर पति को स्पष्ट बता नहीं सकती, घुमा फिरा के बताया तब भी रमाशंकर भड़क गये और गुस्से से सीता पर हाथ भी उठाया |
अभी बेटी एक साल की भी नहीं हुई सीता को दूसरे बच्चे के लिए मजबूर किया पर दूसरी भी बेटी हुई| सीता पर वापस गुस्सा किया और कहा की तुम ‘हमे बेटा कब पैदा कर के दोगी?’ जैसे बेटे की चाह ने रामशंकर को अँधा कर दिया था | फिर तीसरे साल सीता को बच्चे के लिए मजबूर किया गया | इस बार रामशंकर को किसी ने लिंग-परिक्षण कराने की सलाह दी| रमाशंकर ने सीता को जबरदस्ती जाँच कराने अपनी माँ के साथ भेजा | पता चला सीता के गर्भ मे दो बेटियाँ पल रही है, रमाशंकर की माँ ने बेटे को फोन से जानकारी दी कि जुड़वाँ बेटियाँ आने वाली है, उस वक़्त रमाशंकर सभा मे ‘’बेटी बचाओ’’ विषय पर भाषण देने गये थे| रमाशंकर ने कहा कि ‘दोनों बेटियों को निकलवा दो, अब और बेटी नहीं चाहिए| वो भाषण देने लगा | जब सीता और उसकी सास डॉ. के पास गर्भ गिराने की बात करने को गयी तो डॉ. ने कल आने को कहा, फिर जब दोनों वापस घर के लिए निकली तो सीता ने कुछ बहाना बना कर सास को घर भेज दिया और खुद सभा स्थल पहुँच गयी और अपने पति के असल विचारो की पोल खोल दी| ये सब सीता से जानकर विभाग ने रमाशंकर को उसी वक़्त पद से हटाया और पूरे विभाग वालो ने एक स्वर मे रमाशंकर की आलोचना करी की दीपक तले अँधेरा इसे ही कहते है|  सीता ने तलाक लेकर अलग रहने का फैसला किया |
सीता समझदार तो थी ही, उसने दोनों बेटियों को जन्म दिया और अस्पताल के डॉ., से लिखवा लिया कि बेटी होने का कारण खुद रमाशंकर था; और सब को दिखाया समाज कल्याण विभाग ने सीता की बहादुरी के लिए वो पद उसे दे दिया जो उसके पति के पास था | | सीता की समझदारी से उसकी दोनों बेटियाँ बच गयी और दोनों डॉ. बन गयी अब सीता अपनी चारो बेटियों के साथ रहती है | रमाशंकर अब अपनी करनी पर पछता रहा है |उसकी चारो बेटियाँ ऊँचे पद पर काम कर रही है; बेटे की चाह ने उसका सब कुछ बर्बाद कर दिया था |

शांति पुरोहित


           कहानी किस्मत की                                                                                   दुबई के रहने वाले रहमान मियां का अपना बहुत बड़ा तैयार वस्त्रो का कारोबार था लाखो का सालाना मुनाफा कमाते थे परिवार के नाम पर पत्नी और एक बेटा दो ही थे दुबई मे रहमान मियाँ का नाम इज्ज़त के साथ लिया जाता था साजिदरहमान मियाँ का बेटा दुबई मे शानदार स्कूल मे पढता था |सब कुछ ठीक चल रहा था पर कहते है ना समय बदलते कितना वक्त लगता है एक दिन रहमान मियाँ को दिल का दौरा पड़ा और वो इस दुनिया से कूच कर गये |उस वक्त साजिद, सात साल का बच्चा था तो जाहिर सी बात थी, कि इतना बड़ा काम तो वो सम्भाल नहीं सकता था |
तो साजिद की अम्मी उलफत बेगम ने पति के काम को संभाला अब ये तो होता ही है कि औरत काम करेगी तो घर और बच्चे को तो अपनी क़ुरबानी देनी ही पड़ेगी उलफत साजिद को बिलकुल भी वक्त नहीं दे पा रही थी साजिद को बड़ा नागवार लगता था, कि उसकी अम्मी उसको काम के चलते संभाल नहीं पाती थी |पुरे दिन उलफत को बाहर रहना पड़ता था ऐसे मे  साजिद को नौकर के भरोसे ही रहना पड़ता था |साजिद अपनी अम्मी के लिए बहुत रोता था, ये तो प्रक्रति प्रदत नियम है कि जब बच्चा छोटा होता है तो उसे माँ का प्यार चाहिये माँ ही उसके लिए सब कुछ होती है और अगर किसी कारण वश बच्चे को बचपन मे माँ का साथ नहीं मिलता है तो बच्चा कुंठा के साथ बड़ा होता है और वो ही कुंठा उसके आगे के जीवन मे साफ देखी जा सकती है साजिद अपने अबुजान -अम्मी दोनों को ही मिस किया करता था अबू साजिद को एक बहुत बड़ा आदमी बनाना चाहते थे| पर इंसान का सोचा कहाँ होता है|उपर वाले ने तो साजिद के लिए जैसे कुछ और ही सोच कर रखा था| जो भविष्य के गर्भ मे छुपा था | धीरे –धीरे साजिद ने ये मान लिया कि उसकी अम्मी को काम के लिए जाना ही होगा,और उसे ऐसे ही नौकरों के सहारे रहना पड़ेगा | उसके बाल मन मे अब ये बात घर कर गयी की वो जब बड़ा होकर शादी करेगा तो अपनी बीवी को कमाने नहीं जाने देगा,और अपने बच्चो को माँ से दूर नहीं रहने देगा |
इन सब परिस्थितियों ने साजिद के दिल पर बुरा प्रभाव डाला परिणाम स्वरूप पन्द्रह साल के साजिद, ने एक दिन कह दिया कि हमे दुबई नहीं अब भारत रहना है साजिद की अम्मी ने पहले तो इसे बेटे का बाल सुलभ हठ, ही माना सोचा कुछ दिनो मे सब भूल जायेगा,पर ऐसा नहीं हुआ अम्मी के समझाइश का भी असर नहीं हुआ उलफत ने कहा ‘’साजिद यहाँ तेरे अबुजान का इतना बड़ा कारोबार है,जो बड़े होने पर तम्हे बहुत काम आयेगा,बहुत आराम से जीवन जी सकोगे वहां भारत मे तो अपना काम जमेगा या नहीं ये भी पता नहीं है पर,साजिद जो जैसे जिद पर अटका हुआ था बस यहाँ से जाना है, तो उलफत   बेगम को बेटे की जिद के आगे हार मान भारत आना पड़ा बहुत कोशिश करने पर भी साजिद ना तो यहाँ आकर आगे पढ सका और ना ही कारोबार की इतनी समझ नहीं होने से उसमे भी नाकामी मिली अब तो साजिद, को बड़ी समस्या हुई पर करे क्या कुछ समझ नहीं आ रहा था |
उस वक्त सरकस का बहुत चलन था सिनेमा से ज्यादा लोग सरकस पसंद करते थे साजिद बचपन से ही निडर था जैसे डर कर जीना तो उसने सीखा ही नहीं था साजिद के एक दोस्त ने साजिद को सरकस मे काम दिलवा दिया |अम्मी ने अपना माथा ठोक लिया कि राजा की तरह पला हुआ रहमान मिया का बेटा पैसा कमाने के लिए तमाशबीन का काम करेगा |अम्मी ने साजिद से कहा ‘’चलो वापस दुबई चलते है, तेरे अब्बू, का बहुत नाम है अभी भी वहां कोई काम मिल ही जायेगा पर साजिद ने ना बोला | रस्सी पर चलने का काम साजिद करता था धिरे -धीरे साजिद काम मे पारंगत हो गया और खूब पैसा कमाने लगा एक दिन उलफत की एक सहेली रेहाना घर आई और अपनी बेटी की साजिद से शादी के लिए कहा उल्फत को तो अब साजिद के लिए बहु लानी थी और कुछ दिनों बाद रेशमा की साजिद के साथ शादी हो गयी| रेशमा बहुत ही नेक लड़की थी पर उसे साजिद का ये काम पसंद नहीं था| उसे डर लगा रहता था कि उसका वैवाहिक जीवन शुरू होने के साथ ही ख़त्म ना हो जाये | रेशमा ने बहुत समझाया साजिद ,को पर साजिद तो जैसे ये काम नहीं नहीं छोड़ने का ठान ही चूका था | साजिद की अम्मी, ने भी ने भी रेशमा की बात को सही कहा | साजिद की अम्मी तो कुछ साल बाद अपने बेटे की सलामती की बात अपने मन मे लेकर इस दुनिया से चली गयी| अब रेशमा अकेली ही साजिद की फ़िक्र करने वाली रह गयी पर साजिद ने तो डरना जैसे सीखा ही नहीं था | जैसे उस पर जूनून सवार था कि काम तो यही करना है और कुछ भी काम नहीं करना है | रेशमा ने भी अपनी किस्मत मान कर चुपी साध ली | और अपनी ग्रहस्थी सँभालने लगी | एक –एक करके साजिद के तीन बेटिया आई | पर साजिद एक बेटा भी चाहता था | जो बड़ा होकर उसके काम मे उसका साथ दे सके | और उसके ना रहने पर बेटा कमा कर ला सके, पर रेशमा बेटा नहीं चाहती थी | वो नहीं चाहती कि बहु भी उसकी तरह शौहर की फिक्र मे रोज एक मौत मरे| और आखिर मे अलाह ने रेशमा की सुनली बेटा हुआ ही नहीं |
समय की रफ़्तार को कौन रोक पाया है अब साजिद तीन बेटियों का बाप और एक खुबसूरत पत्नी का का पति था साजिद अपने परिवार की हर जरुरत को पूरा करने की भरसक कोशिश करता था रोज के सौ रुपया कमाता था साजिद को देख कर सब को यही लगता कि हमे भी साजिद की तरह ही काम करके पैसा कमाना चाहिये |पर साजिद को तो कमाना ही था और कौन कमाता,चार जन की जिम्मेदारी उस पर थी |उपर से घर की औरत का बाहर जाकर कमाना उसे शुरू से ही पसंद नहीं था | उस वक्त सौ रुपया कमाना अपने आप मे बड़ी बात हुआ करती थी साजिद को तो कमाना ही था क्योंकि वो अपने धर्म के उसूलो का पक्का था उसने ये तय कर लिया था कि जब तक वो जियेगा उसकी बेगम और बेटिया कहीं भी और कुछ भी काम करने नहीं जाएगी |
एक दिन रेशमा ने कहा ''मै इतनी पढ़ी -लिखी हूँ, मुझे भी कुछ काम करने दोघर मे ज्यादा पैसा आएगा,| ''अगर इतना पैसा कम पड़ता है,तो कह दो मैऔर मेहनत कर लूँगासाजिदका इतना पक्का इरादा देख कर रेशमा को चुप होना पड़ा पर कैसे कहे साजिदसे कि पैसा तो कम पड़ेगा ही,तीन बच्चे है,| बड़ी बेटी अठारह साल की,छोटी पंद्रह और तेरह साल की है तीनो की पढाई का खर्चा कम नहीं है बड़ी बेटी का कालेज मे पहला साल भी शुरू हो गया है बहुत पैसा चाहिये घर चलाने के लिए पर साजिद को तो जैसे रोज का सौ रुपया बहुत ज्यादा लगता है रेशमा के कुछ समझ नहीं आ रहा था |वो साजिद को इस बारे मे, ज्यादा कुछ नहीं कह सकती,क्योंकि साजिदका काम ही ऐसा था,वो रस्सी पर चलने का काम करता था जमीन से पंद्रह माले से भी ऊपर रस्सी पर एक छोर से दुसरे छोर तक जाताऔर फिर पैरासूट से वापस नीचे आता था इस काम मे बहुत खतरा रहता है,तो उलफत साजिद को घर की परेशानी कभी बताती ही नहीं थी |साजिद को सभी चिन्ताओ से मुक्त रखना ही जैसे उलफत का परम धर्म था क्योंकि इसके कारण ही उसका सुहाग जिन्दा रह सकता है उसका ये मानना था | साजिद कभी नहीं डरता अपने काम से उसकी शर्ट पर तीन तमगे लग गये थे बहुत सारे इनाम भी जीते है देश -विदेश मे ये करतब दिखाने कंपनी के साथ जाता रहता है साजिद के इस काम से रेशमा की जान हमेशा हलक मे अटकी रहती है जब भी साजिद काम के लिए निकलता है,रेशमा अलाह ताला के सामने नमाज पढने को बैठ जाती है अलाह से अपने शौहर की सलामती के लिए दुआ मांगती है साजिद खुद का विज्ञापन करने के लिए अपनी शर्ट पर अलग -अलग केटेगरी के लेबल लगा कर विज्ञापन करता था ,जैसे वो एक मशीन बन गया हो |पर उसे सुकून था कि उसके घर की औरते बाहर कमाने नहीं जाती है और घर भी अच्छे से चल रहा है |
                                     आज साजिद अपने जीवन का सबसे बड़ा काम करने जा रहा था आज उसे वर्ल्ड रिकार्ड बनाने जाना था अगर ये रिकार्ड साजिद अपने नाम कर लेता है तो उसे दस लाख रुपया मिलने वाले थेऔर इन रुपयों को साजिद अपनी तीनो बेटियों के लिए कमाना चाहता था |बेटियों को अच्छी शिक्षा दिलाना उसका सपना था |और फिर बाप के पास पैसा होगा तो ही उसकी बेटियों को अच्छे घर के लड़के मिलेंगे | बिना पैसो के कौन किसी को पूछता है उसने इसके लिए सालो तैयारी की थी,कि वो ये इनाम की रकम जीत सके ,पर रेशमा की जान हलक मे थी रेशमा ने दो दिन पहले से ही अलाहसे दुआ मंगनी शुरू कर दी थी उसे डर था की साजिद उपर से गिर ना जाये,अगर उसे कुछ होता है तो वो सब साजिद के बिना नहीं रह पायेंगे | तीन जवान बेटियों को लेकर वो अकेली कैसे जी पायेगी| पर साजिद आज बहुत ऊंचाई पर जाकर रिकार्ड बनाना चाहता था |वो साजिद को मना भी करना चाहती थी पर वो कहाँ मानने वाला था|बस सब कुछ अलाह के भरोसे छोड़ दिया सब को साजिदपर भरोसा था और साजिदको खुद पर तीन बड़ी बेटियों की माँ उलफत आज बहुत डरी हुई थी|साजिद निकल गया पर उसने जाने से पहले रेशमा को साथ चलने को कहा पर उसने मना कर दिया रेशमा ये सब कभी भी नहीं देखती थी 
                                 सारा पंडाल खचाखच भरा था आज सरकस के मालिक की सारी टिकटे बिक गयी थी सब साँस रोक कर साजिदका खेल रस्सी पर चलने का देख रहे थेसाजिद चल रहा था रस्सी परलोग प्रार्थना कर रहे थे कि साजिदसफल हो कर लौटे पर अचानक साजिदका पैर उचका और वो ऊंचाई से नीचे गिरा और साजिद मर गया रेशमा को जिस बात का डर था वही हुआ रेशमा और उसकी बेटिया आखिरकर अकेली रह गयी कुछ दिन बाद रेशमा ने बड़ी बेटी से कहा''कल से मै काम ढूंढने जा रही हूँ बेटी ने कहा ''मै भी काम करूंगीरेशमाने कहा लोग क्या कहेंगे तो बेटी ने कहा अम्मीकुछ नहीं कहेंगे लोग अब अबू,नहीं है हमे सँभालने के लिए काम तो हमे ही करना पड़ेगा |रेशमा और तीनो बेटिया रोने लगी थी | आखिरकार साजिद की बीवी को कमाने को बाहर जाना पड़ा |
                            शांति पुरोहित