Saturday, 1 June 2013

                          दूध का जला छाछ को भी फूंक कर पिता है          
                                                                                                                                                             मीरा चाची के बेटे विनय की शादी का अवसर था | मीरा चाची को मैंने पिछले कई दिनों से आराम करते हुए नहीं देखा,बिना थके और अति उत्साह के साथ काम करने मे लगी है | ना खाने-पीने की चिंता और ना पल भर आराम करती है | बस एक ही चिंता है कि बेटे की शादी मे कोई कसर ना रहे,बहु रीमा के स्वागत मे कोई कमी ना रहे बस | शादी मे कुछ दिन ही रह गये है तो सारे रिश्तेदार और मेंहमान भी आ गये है | कहते है ना सुख -दुख मे रिश्तेदार ना आये तो क्या मजा |  घर वालो के आने से ही ख़ुशी मे चार चाँद लग जाते है | मीरा के घर मे रिश्तेदारो  की खूब चहल -पहल थी |
                                      ''जगदीश, तुम यहाँ खड़े क्या कर रहे हो,जाओ तुम हलवाई के पास ही रहो उनको किसी भी चीज के लिये परेशान ना होना पड़े | दिवाकर तुम टेन्ट वाले से सारा सामान  टाइम पर भेजने के लिये अभी ही फोन करके बोल दो,और हाँ डेकोरेशन वाले भी आ गये है' चिराग, तुम पूरा घर दुलहन की तरह सजा देना कोई कसर ना रखना |'' मीरा चाची ने डेकोरेशन वाले चिराग भाई को कहा ''गोपाल तुम सब मेहमानों के खाने,और ठरहने की व्यवस्था देखो | जाओ सब अपने अपने काम मे लग जाओ | मीरा चाची ने सब को काम समझाया| और अब वो पंडित से मांगलिक कार्य शुरू करने का शुभ मोहरत पूछने मे व्यस्त हो गयी है|''

                                       तभी चाचा ने मीरा चाची को बुलाया और कहा कि''बहु के लिये जेवर आ गये हैऔर हाँ, सोनी जी से मैंने कुछ और जेवर मंगवाए है पसंद कर लो बहु को  पहली बार खाना बनाने की रश्म अदायगी के बाद सगुन जो देना| '' जब तक मीरा आंटी ये सब काम ख़तम करती उससे पहले ही औरतो ने मंगल गीत गाकर बेटे की हल्दी की रश्म शुरू कर दी | मीरा चाची ने अपने लाडले बेटे के हल्दी लगा कर उसका माथा चूम लिया और दुसरे कामो मे व्यस्त हो गयी |
                                       दुसरे दिन मेहदी और महिला संगीत का बहुत ही भव्य कार्यक्रम हुआ सब ने बहुत ही सराहा | आज विनय की बारात धूम -धाम से बहु को लेने गयी है | अब मीरा चाची ने आज थोडा आराम किया है |
                                आखिरकार मीरा चाची की बहु घर आ गयी | बहु का खूब स्वागत किया | बेटे और बहुको देख कर मीरा चाची ख़ुशी का अनुभव कर रही थी | जैसे उनके घर मे दुनिया भर की खुशिया आ गयी हो बहु के आने से,  और मन मे ये भी सोच रखा था कि बहु को सब कुछ सौंप कर घर के काम से अब छुट्टी  ले लुंगी और  आराम का जीवन बसर करुँगी  | मीरा चाची ने दोनों को घुमने के लिये सिंगापूर भेजा| उनके लिये बेटे -बहु की खुशियों से बढ़ कर कुछ नहीं था |बेटे -बहु दस दिन बाद घूम कर वापस आ गये |दोनों बहुत खुश है |बहु ने सास का शुक्रिया माना कि उनको इतना अच्छा घुमने का मौका दिया |अब धिरे -धिरे बहु घर के काम मे लग गयी एक बहु के लिये जब वो नई -नई ससुराल आती है तो उहे पता चलता है कि उसके मायके की रीत और उसकी ससुराल की रीत मे फर्क होता है | तो रीना का भी सब तरीका जैसे रहने का ,खाना बनाने का तरीका अलग था |तो मीरा चाची ने रीमा से कहा ''चलो मे तुम्हे यहाँ के कुछ तौर- तरीके सीखा देती हूँ |फिर धीरे -धीरे तुम सब सीख जाओगी , पर रीमा ने सीधा जवाब दे दिया कि ''नहीं सीखना मुझे नया तरीका अगर मेरे तरीके से आप को रहना है तो ठीक ,नहीं तो आप ही खाना बनाते रहिये |''ये सुन कर चाची को बहुत ही हैरानी हुई |अब तो दिन ब दिन उसका व्यवहार बिगड़ता ही जा रहा था |अब चाचा -चाची को दुःख तो इस बात का ज्यादा हो रहा था कि ये सब देखने के बावजूद भी विनय अपनी पत्नी को कभी कुछ नहीं बोलता था | अभी शादी को दो माह ही हुए थे | एक दिन मीरा आंटी ने बहु से कहा''रीमा ''मुझे एक कप चाय दे दो आज सर मे बहुत दर्द है|''कितनी बार चाय बनाउ क्या मे चाय और खाना बनाने के लिये ही आई हूँ यहाँ,मेरे पास भी करने को और भी काम है और हाँ चाय तो आप भी बना सकती है,इतना बड़ा जवाब देकर रीमा अपने कमरे मे तम -तमाती चली गयी |
                              मीरा आंटी बहु से ये सब सुन कर हैरान हो गयी उसने बहु से ऐसा तो कुछ कहा नहीं कि उसे इतना गुस्सा करना पड़ा | बहु से इतना तो हर सास -ससुर उम्मीद रखते है कि बहु खाना नाश्ता और चाय तो बना कर दे| मीरा चाची को बहु के इस बर्ताव से बहुत ठेस पहुंची है पर उन्होंने तय किया कि विनय के पापा को ये सब वो नहीं बताएगी |
                               लेकिन बात यही पर ही ख़तम नहीं होती है अब तो रीमा का जैसे ये रोज का ही काम हो गया था | अब तो ससुर जी के सामने भी वो ये सब करने लगी थी | उस दिन विनय के पापा को जल्दी ऑफिस जाना था | मीरा भी रसोई मे गयी है रीमा की मदद करने, लेकिन रसोई तो बंद पड़ी थी | और उसी वक्त रीमा तैयार होकर पहले से ही तय किट्टी पार्टी मे अपने दोस्तों के साथ चली गयी | मीरा चाची हैरान रह गयी अब इतनी जल्दी वो अकेली कैसे खाना बनाएगी | बहु को विनय के पापा ने भी देखा जाते हुए उन्हें बहुत गुस्सा आया पर मीरा चाची ने बोलने से मना किया उनका ये मानना है कि घर की औरतो के बीच मे आदमी को नहीं बोलना चाहिए घर का माहौल और बिगड़ जाता है | बहुत बार बोलना चाहा उन्होंने पर हर बार चाची उन्हें चुप करा देती थी| वो अपनी पत्नी को बहु से कुछ भी सुनते हुए देखते तो दुखी हो जाते थे |
                                  ऐसा कब तक बर्दास्त किया जा सकता है आखिरकार एक साल के बाद उन्होंने एक फैसला किया | उस रात जब सब खाना खा रहे थे, तो चाचा ने विनय को एक चाबी दी और कहा कि ''विनय ये तुम्हारे लिये नए घर की चाबी है| तुम कल से ही वहां चले जाओ | तुम्हारी पत्नी का बर्ताव अब बर्दाश्त नहीं होता | जब घर तुम्हारी मम्मी को ही संभालना है तो दिल मे सुकून तो होना चाहिए ना | अब मीरा चाची और अखिलेश चाचा छोटे बेटे रंजन के साथ आराम से रहने लगे | रंजन का इंजीनियरिंग का अन्तिम वर्ष चल रहा था |
                                 मीरा चाची उन कडवी यादो को भूल जाना चाहती थी पर वो अनचाही यादे उनका दामन ही नहीं छोड़ रही थी | अक्सर मीरा चाची और अखिलेश चाचा बाते करते है कि अब छोटे बेटे की शादी करनी है |पर अभी तक बड़ी बहु के व्यव्हार से डरे हुए है | पर इस कारण रंजन को कुंवारा तो नहीं रख सकते | पर लड़की अगर रीमा जैसी ही निकली तो फिर से वो सब देखना पड़ेगा | पर ये जिम्मेदारी भी पूरी तो करनी है तो अब लड़की की तलाश शुरू हुई |
                                   पर रंजन ने तय कर लिया था कि उसे शादी नहीं करनी है |भाभी के लिये उसके दिल मे एक माँ जैसे छवि थी|  भाभी के लिये एक सम्मान की भावना थी, पर भाभी ने अपने बेरुखेपन से सब धूमिल कर दिया | अब वो शादी करके अपने और अपने माता पिता को और दुखी नहीं करना चाहता था | मीरा चाची ने उसे समझाया की सब लडकिया एक जैसी थोड़ी होती है |पर उसको कैसे यकीन दिलाया जाये |
                                        मीरा चाची ने अपनी इस उलझन के साथ रंजन के लिये लड़की देखने का सिलसिला शरू किया | कुछ रिश्ते इनको नहीं जंचते होते थे और कुछ अपनी लड़की का रिश्ता इनके यहाँ नहीं करना चाहते थे | अब इनके सामने डर के साथ निराशा भी थी | समय बीतता रहा आखिरकार अखिलेश चाचा की बहन ने एक रिश्ता बताया | आज सब रेणु को देखने उसके घर जा रहे है | रेणु तो एक नजर मे ही सब को पसंद आ गयी थी | वो थी भी बहुत सुंदर,चंचल और उसकी माँ ने बताया पढ़ी लिखी होने के साथ -साथ वो घर के सब काम मे दक्ष है | संस्कारो वाली लड़की थी |
                                       अब मीरा चाची के घर फिर से शहनाई बजेगी फिर से घर मे बहु आएगी सब खुश थे,पर फिर भी जेहन मे कहीं दूर हल्का सा डर भी था कि ..........
    रेणु ने अपने शादी को लेकर बहुत से अरमान अपने दिल मे सजा के रखे है | रेणु को खुले विचारो वाली सास पसंद थी | पति बहुत प्यार करने वाला हो और ससुर जी पिता के समान उसे अपनी बेटी समझे इस तरह उसने और भी कई अरमान दिल मे सजा कर रखे है |
                                      पर यहाँ तो सब उल्टा ही मिला सास ने कभी किसी काम की तारीफ नहीं की और ना ही झगड़ा किया रंजन ने भी ज्यादा प्यार नहीं दिखाया | अब रेणु क्या करे उसने ये तो सोचा भी नहीं था कि ऐसा सब होगा |कई बार रेणु ने जानना चाहा कि ऐसा क्यों कर रहे है क्या बात है पर कोशिश करने पर भी कुछ नहीं हुआ | धिरे -धिरे रेणु की तबियत बिगड़ने लगी तो मीरा चाची को भी फिक्र हुई | समय ऐसे ही बीतता रहा |दो साल होने को आये रेणु को अपनी ससुराल मे| एक दिन अचानक अखिलेश चाचा को दिल का दौरा पड़ा | उनको अस्पताल मे भर्ती किया गया | इस संकट की घड़ी मे बड़ी बहु रीमा ने कुछ देर के लिये आकर महज औपचारिकता ही पूरी करी | पर रेणु ने अपना पूरा क्रतव्य निभाया सुबह से लेकर शाम तक वो सेवा मे लगी रहती | ससुरजी को दवा देना सास के लिये खाना लाना और फिर घर मे रंजन के लिये नाश्ता बनाना आदि सब कुछ वो कर रही थी |पन्द्रह दिन बाद ससुरजी को अस्पताल से छुटी दे दी गयी |
                                इन पंद्रह दिनों मे रेणु का अपने ससुराल वालो के प्रति प्यार देखकर मीरा चाची को बहुत अच्छा लगा | और उन्होंने सोचा कि इतनी अच्छी बहु के साथ हम इतने दिनों क्यों प्यार नहीं जता पाए ये तो आई तब से ही इसने हम सब की कितनी सेवा की है हमने इसे समझने मे कितनी देर लगा दी पर हम भी क्या कर सकते है बड़ी बहु रीमा के कारण ये सब रेणु के साथ करना पड़ा कहते है ना कि दूध का जला छछ को भी फूंक कर पीता है तभी रेणु सास के कमरे मे चाय देने आयी रेणु को देख कर मीरा चाची अपने को रोक नहीं सकी और झट से रेणु को गले से लगाया और अपने रूखे वयवहार के लिये माफ़ी मांगी | रेणु तो कब से तरस रही थी सास के प्यार पाने के लिये रेणु संस्कारो वाली थी कहा ''माँ आज मेरा इस घर मे आना सार्थक हुआ है आपने मुझे दिल से अपनाया |''है और सास बहु दोनों की आँखों ख़ुशी के आंसू थे |
   
                           शांति पुरोहित

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ये कहानी भी पढना और प्रतिभाव देना


                                         
                               
मायाजाल
रीटा के पापा मिस्टर आर. माथुर बैंक मे मैनेजर है;लेकिन अभी तक अपना खुद का घर नहीं बना सके थे हर दो साल बाद उनका तबादला किसी दुसरे शहर मे  हो जाता था तो कैसे ! और कहाँ घर बनाये ! हाँ,गाँव मे उनका पुश्तैनी  घर था,पर उस घर को तो उन्होंने बचपन मे अपनी पढाई के कारण छोड़ दिया था उनको गाँव छोड़े बहुत साल हो गये थे मिस्टर आर.माथुर के माता-पिता इसी आशा मे बैठे थे, कि एक दिन उनका बेटा पढ़-लिख कर आएगा और गाँव की भलाई के लिए काम करेगा ;पर उनका ये सपना उस वक्त टूट कर बिखर गया जब बेटे ने कहा 'मेरी कानपूर की स्टेट बैंक मे नौकरी लगी है; और मै, आपको लेने के लिए आया हूँ |
बड़ा घर लिया है हम सब आराम से रहेंगेउन्होंने इंकार कर दिया ''इस उम्र मे गाँव छोड़ कर हम कहीं नहीं जायेगे,बहुत समझाया कि इस उम्र मे अकेले कैसे रहोगेपर वो माने नहींदो साल बाद आर.माथुर ने माधवी से एक सादे समारोह मे माता-पिता की उपस्तिथि मे शादी कर ली |
माधवी बहुत समझदार थी, उसने आते ही अपने सास -ससुर को अपने पास रहने के लिए राजी कर लिया  समय बीतता रहा ,माधवी ने एक सुंदर सी लड़की रीटा को जन्म दिया | समय बीतता रहा | बेटी रीटा अब थोड़ी बड़ी  हो गयी | घर मे वो सिर्फ माँ को ही देखती थी ,क्योंकि मिस्टर आर.माथुर तो जल्दी ही बैंक निकल जाते थे | रीटा पापा को बहुत मिस करती, पर पापा तो छुटी के दिन के आलावा कभी उसके साथ नहीं रहते थे | पूरा दिन अपने काम मे व्यस्त रहते रहते थे | देखा गया है कि बेटी को पापा से ज्यादा लगाव रहता है | रीटा भी पापा के साथ रहना चाहती थी,उनके साथ खेलना और बाहर घ्हुमना चाहती थी |
दिन महीने साल बीतते गये | ''पापा हमारा घर कब बनेगा'' पूछा रीटा ने माधवी भी तो अब यही चाहती थी की रीटा अब बड़ी हो गयी है कुछ समय बाद उसकी शादी भी करनी है तो अपना खुद का घर तो होना ही चाहिये ना अब मिस्टर आर.माथुर के सेवा निवृति मे भी सिर्फ दो साल का समय बचा था मिस्टर आर.माथुर ने बेटी को जवाब मे कुछ नहीं कहा और बैंक चले गये |
आज मिस्टर आर.माथुर ने,  राज प्रोपर्टी डीलर से अपने लिए एक फ़्लैट बुक करवाया बैंक का काम जल्दी से ख़त्म किया और घर पहुँच गये माधवी और रीटा को जल्दी से तैयार होने को बोल कर खुद फ्रेश होने वाशरूम चले गये |माधवी और रीटा को बहुत पसंद आया अपना नया घर और आखिर कुछ दिनों बाद रीटा और माधवी को अपना नया घर मिल गया था |
रीटा रोज पापा से घर मे इंटीरियर डेकोरेशन के लिए कहती थी पर मिस्टर आर.माथुर के घर के काम के लिए वक्त ही नहीं बचता ,बस घर से बैंक और बैंक से घर आने-जाने मे वक्त ख़त्म हो जाता था पर आज उन्होंने रीटा की ये शिकायत भी ख़त्म करने की ठानली और कृष्णा इंटीरियर डेकोरेटर के मालिक सिंह साब को फोन किया |उन्होंने शाम तक आदमी भेजने का बोला |
                          आज जब घर की डोर-बैल बजी तो दरवाजा रीटा ने खोला सामने एक बहुत ही आकर्षक लड़का खड़ा था |

रीटा मंत्र-मुग्ध होकर खड़ी उसे देखती ही रह गयी तभी वो लड़का बोला मेम,मेरा नाम पुष्कर है, मै, ''कृष्णा इंटीरियर डेकोरेटर कंपनी'' से आया हूँ ओहयस अंदर आइये,और रीटा पुष्कर को घर के अंदर ले गयी पुष्कर ने  थोड़ी देर घर को देखा और कहा 'एक दो दिन मे काम शुरू कर दूंगा, कह कर चला गया |
रात को खाना-खाने के वक्त मिस्टर आर.माथुर ने देखा आज पत्नी और बेटी दोनों काफी खुश लग रही है | ''क्या बात है आज इतनी खुश ख़ुशी का कोई कारण तो बताओ|' रीटा ने कहा ''एक दो दिन मे इंटीरियर का काम चालू हो रहा है; और अब जल्दी से घर के इनोग्रेशन की डेट भी तय करनी है और भी बहुत से काम करने है अब जल्दी से मेरे सारे दोस्तों को मेरा घर दिखाना है |
पुष्कर और रीटा दोनों ने साथ मिलकर इंटीरियर का काम किया तो दोनों मे नजदीकिया बढ़ गयी घर के आलावा वो दोनों बाहर होटल,पार्क और कॉफ़ी शॉप पर भी मिलने लगे थे आज जब वो दोनों काफी शॉप पर बैठे थे पुष्कर ने रीटा को शादी करने के लिए कहा,तो रीटा ने कहा ''पापा से बात करुँगी |'
मिस्टर आर.माथुर ने शादी के लिए इस लिए इंकार कर दिया क्योंकि पुष्कर दूसरी जाति का था लेकिन रीटा और पुष्कर को तो अब कोई भी बंधन शादी करने से रोक नहीं सकता था उन दोनों ने कौर्ट मे शादी करने का फैसला किया, और दो महीने बाद दोनों ने शादी कर ली जब मिस्टर आर.माथुर को बेटी की इस हरकत का पता चला तो खुद को ही इसके लिए जिम्मेदार समझा उन्होंने पत्नी से कहा ''मै थोडा समय अगर अपनी बेटी के लिए भी निकालता तो शायद ये ना होता रीटा मुझे बहुत मिस करती ,थी पर मैंने उसकी इस जरूरत की तरफ कभी ध्यान ही नहीं दिया काम के मायाजाल मे फंसा रहाऔर आज मुझे ये दिन देखना पड़ा क्या इज्ज़त रह जाएगी मेरी जब सब को पता चलेगा कि मेरी बेटी ने इस तरह से शादी करी है | माधवी और आर.माथुर दोनों ने ये माना है कि घर मे जवान लड़की थी;इंटीरियर के लिए आने वाला पुष्कर भी रीटा की हम उम्र था,तो हमे सजग रहना था | आज के ज़माने के लड़के-लड़की तो बहुत ही आधुनिक विचारो वाले होते है | आज की नयी पीढ़ी के बच्चे अपनी सोच-समझ को ही सही मानते है | माधवी ने कहा 'मै तो कहती हूँ ;हर माता-पिता को अपने जवान होते बच्चो पर नजर रखनी ही चाहिये,और अगर उन्हें कुछ लगे तो बच्चो का मन टटोल कर उनसे वो सब जानना चाहिये ,जो उनके दिमाग मे चल रहा हो;और माता पिता को पता भी नहीं है | तभी माता-पिता का अपने बच्चो के प्रति सही मायनो मे अपना फर्ज निभाना मानना चाहिये |,
मिस्टर माथुर कुछ महीनो बाद रीटा से मिलने उसकी ससुराल गये एक ही बेटी थी,तो उससे ज्यादा दिन तक  दूर नहीं रह सकते थे पर वहां देखा कि पुष्कर का घर बहुत छोटा था रहने वाले कुल पांच जन थे ये देख कर तो वो और भी दुखी हुए और तय किया कि रीटा को नया घर देंगे |जब रीटा और पुष्कर घर पापा-मम्मी से मिलने आये तो एक चाबी पुष्कर को दी कहा ''ये तुम्हारे और तम्हारे परिवार के लिए घर हैअब से इसमें आराम से रहो मेरे तो रीटा के आलावा और कोई संतान भी नहीं है तो मेरे रहते मेरी बेटी कैसे तखलीफ़ मे रह सकती है मिस्टर आर.माथुर भावुक हो गये और रीटा और उसकी माँ भी रोने लगी थी |
शांति पुरोहित


  दीया तले अँधेरा                                                                                               समाज कल्याण विभाग के प्रमुख रमाशंकर अपने माता-पिता की एक मात्र संतान थे| उनके माता -पिता ने उनका विवाह बड़े ही धूम-धाम से पास ही के गाँव के नगर सेठ की बेटी सीता से करा दिया था | रामशंकर के माता-पिता सुन्दर सुशील बहू को पाकर बहुत खुश थे | सीता सुन्दर तो थी ही साथ ही पढ़ी-लिखी और समझदार भी थी| रमाशंकर भी इतनी गुणवान पत्नी पाकर बहुत खुश था |
शादी के एक साल बाद घर मे बच्चे की किलकारी गूंजने की खबर से सब खुश थे| अपने वंश को आगे बढ़ता जान सब खुश थे, पर सीता को उन सब की ये बात पसंद नहीं आई, लड़की भी हो सकती है पर कुछ कह नहीं सकी और सीता ने बेटी को जन्म दिया | घर के सारे लोग नाराज हुए पर इसमें उसका क्या दोष था | बातो -बातो मे सीता ने अपने पति को समझाया कि पति-पत्नी मे से किसी एक मे कुछ कमी रहती है तो बेटी होती है वैसे सीता को पता था पर पति को स्पष्ट बता नहीं सकती, घुमा फिरा के बताया तब भी रमाशंकर भड़क गये और गुस्से से सीता पर हाथ भी उठाया |
अभी बेटी एक साल की भी नहीं हुई सीता को दूसरे बच्चे के लिए मजबूर किया पर दूसरी भी बेटी हुई| सीता पर वापस गुस्सा किया और कहा की तुम ‘हमे बेटा कब पैदा कर के दोगी?’ जैसे बेटे की चाह ने रामशंकर को अँधा कर दिया था | फिर तीसरे साल सीता को बच्चे के लिए मजबूर किया गया | इस बार रामशंकर को किसी ने लिंग-परिक्षण कराने की सलाह दी| रमाशंकर ने सीता को जबरदस्ती जाँच कराने अपनी माँ के साथ भेजा | पता चला सीता के गर्भ मे दो बेटियाँ पल रही है, रमाशंकर की माँ ने बेटे को फोन से जानकारी दी कि जुड़वाँ बेटियाँ आने वाली है, उस वक़्त रमाशंकर सभा मे ‘’बेटी बचाओ’’ विषय पर भाषण देने गये थे| रमाशंकर ने कहा कि ‘दोनों बेटियों को निकलवा दो, अब और बेटी नहीं चाहिए| वो भाषण देने लगा | जब सीता और उसकी सास डॉ. के पास गर्भ गिराने की बात करने को गयी तो डॉ. ने कल आने को कहा, फिर जब दोनों वापस घर के लिए निकली तो सीता ने कुछ बहाना बना कर सास को घर भेज दिया और खुद सभा स्थल पहुँच गयी और अपने पति के असल विचारो की पोल खोल दी| ये सब सीता से जानकर विभाग ने रमाशंकर को उसी वक़्त पद से हटाया और पूरे विभाग वालो ने एक स्वर मे रमाशंकर की आलोचना करी की दीपक तले अँधेरा इसे ही कहते है|  सीता ने तलाक लेकर अलग रहने का फैसला किया |
सीता समझदार तो थी ही, उसने दोनों बेटियों को जन्म दिया और अस्पताल के डॉ., से लिखवा लिया कि बेटी होने का कारण खुद रमाशंकर था; और सब को दिखाया समाज कल्याण विभाग ने सीता की बहादुरी के लिए वो पद उसे दे दिया जो उसके पति के पास था | | सीता की समझदारी से उसकी दोनों बेटियाँ बच गयी और दोनों डॉ. बन गयी अब सीता अपनी चारो बेटियों के साथ रहती है | रमाशंकर अब अपनी करनी पर पछता रहा है |उसकी चारो बेटियाँ ऊँचे पद पर काम कर रही है; बेटे की चाह ने उसका सब कुछ बर्बाद कर दिया था |

शांति पुरोहित


           कहानी किस्मत की                                                                                   दुबई के रहने वाले रहमान मियां का अपना बहुत बड़ा तैयार वस्त्रो का कारोबार था लाखो का सालाना मुनाफा कमाते थे परिवार के नाम पर पत्नी और एक बेटा दो ही थे दुबई मे रहमान मियाँ का नाम इज्ज़त के साथ लिया जाता था साजिदरहमान मियाँ का बेटा दुबई मे शानदार स्कूल मे पढता था |सब कुछ ठीक चल रहा था पर कहते है ना समय बदलते कितना वक्त लगता है एक दिन रहमान मियाँ को दिल का दौरा पड़ा और वो इस दुनिया से कूच कर गये |उस वक्त साजिद, सात साल का बच्चा था तो जाहिर सी बात थी, कि इतना बड़ा काम तो वो सम्भाल नहीं सकता था |
तो साजिद की अम्मी उलफत बेगम ने पति के काम को संभाला अब ये तो होता ही है कि औरत काम करेगी तो घर और बच्चे को तो अपनी क़ुरबानी देनी ही पड़ेगी उलफत साजिद को बिलकुल भी वक्त नहीं दे पा रही थी साजिद को बड़ा नागवार लगता था, कि उसकी अम्मी उसको काम के चलते संभाल नहीं पाती थी |पुरे दिन उलफत को बाहर रहना पड़ता था ऐसे मे  साजिद को नौकर के भरोसे ही रहना पड़ता था |साजिद अपनी अम्मी के लिए बहुत रोता था, ये तो प्रक्रति प्रदत नियम है कि जब बच्चा छोटा होता है तो उसे माँ का प्यार चाहिये माँ ही उसके लिए सब कुछ होती है और अगर किसी कारण वश बच्चे को बचपन मे माँ का साथ नहीं मिलता है तो बच्चा कुंठा के साथ बड़ा होता है और वो ही कुंठा उसके आगे के जीवन मे साफ देखी जा सकती है साजिद अपने अबुजान -अम्मी दोनों को ही मिस किया करता था अबू साजिद को एक बहुत बड़ा आदमी बनाना चाहते थे| पर इंसान का सोचा कहाँ होता है|उपर वाले ने तो साजिद के लिए जैसे कुछ और ही सोच कर रखा था| जो भविष्य के गर्भ मे छुपा था | धीरे –धीरे साजिद ने ये मान लिया कि उसकी अम्मी को काम के लिए जाना ही होगा,और उसे ऐसे ही नौकरों के सहारे रहना पड़ेगा | उसके बाल मन मे अब ये बात घर कर गयी की वो जब बड़ा होकर शादी करेगा तो अपनी बीवी को कमाने नहीं जाने देगा,और अपने बच्चो को माँ से दूर नहीं रहने देगा |
इन सब परिस्थितियों ने साजिद के दिल पर बुरा प्रभाव डाला परिणाम स्वरूप पन्द्रह साल के साजिद, ने एक दिन कह दिया कि हमे दुबई नहीं अब भारत रहना है साजिद की अम्मी ने पहले तो इसे बेटे का बाल सुलभ हठ, ही माना सोचा कुछ दिनो मे सब भूल जायेगा,पर ऐसा नहीं हुआ अम्मी के समझाइश का भी असर नहीं हुआ उलफत ने कहा ‘’साजिद यहाँ तेरे अबुजान का इतना बड़ा कारोबार है,जो बड़े होने पर तम्हे बहुत काम आयेगा,बहुत आराम से जीवन जी सकोगे वहां भारत मे तो अपना काम जमेगा या नहीं ये भी पता नहीं है पर,साजिद जो जैसे जिद पर अटका हुआ था बस यहाँ से जाना है, तो उलफत   बेगम को बेटे की जिद के आगे हार मान भारत आना पड़ा बहुत कोशिश करने पर भी साजिद ना तो यहाँ आकर आगे पढ सका और ना ही कारोबार की इतनी समझ नहीं होने से उसमे भी नाकामी मिली अब तो साजिद, को बड़ी समस्या हुई पर करे क्या कुछ समझ नहीं आ रहा था |
उस वक्त सरकस का बहुत चलन था सिनेमा से ज्यादा लोग सरकस पसंद करते थे साजिद बचपन से ही निडर था जैसे डर कर जीना तो उसने सीखा ही नहीं था साजिद के एक दोस्त ने साजिद को सरकस मे काम दिलवा दिया |अम्मी ने अपना माथा ठोक लिया कि राजा की तरह पला हुआ रहमान मिया का बेटा पैसा कमाने के लिए तमाशबीन का काम करेगा |अम्मी ने साजिद से कहा ‘’चलो वापस दुबई चलते है, तेरे अब्बू, का बहुत नाम है अभी भी वहां कोई काम मिल ही जायेगा पर साजिद ने ना बोला | रस्सी पर चलने का काम साजिद करता था धिरे -धीरे साजिद काम मे पारंगत हो गया और खूब पैसा कमाने लगा एक दिन उलफत की एक सहेली रेहाना घर आई और अपनी बेटी की साजिद से शादी के लिए कहा उल्फत को तो अब साजिद के लिए बहु लानी थी और कुछ दिनों बाद रेशमा की साजिद के साथ शादी हो गयी| रेशमा बहुत ही नेक लड़की थी पर उसे साजिद का ये काम पसंद नहीं था| उसे डर लगा रहता था कि उसका वैवाहिक जीवन शुरू होने के साथ ही ख़त्म ना हो जाये | रेशमा ने बहुत समझाया साजिद ,को पर साजिद तो जैसे ये काम नहीं नहीं छोड़ने का ठान ही चूका था | साजिद की अम्मी, ने भी ने भी रेशमा की बात को सही कहा | साजिद की अम्मी तो कुछ साल बाद अपने बेटे की सलामती की बात अपने मन मे लेकर इस दुनिया से चली गयी| अब रेशमा अकेली ही साजिद की फ़िक्र करने वाली रह गयी पर साजिद ने तो डरना जैसे सीखा ही नहीं था | जैसे उस पर जूनून सवार था कि काम तो यही करना है और कुछ भी काम नहीं करना है | रेशमा ने भी अपनी किस्मत मान कर चुपी साध ली | और अपनी ग्रहस्थी सँभालने लगी | एक –एक करके साजिद के तीन बेटिया आई | पर साजिद एक बेटा भी चाहता था | जो बड़ा होकर उसके काम मे उसका साथ दे सके | और उसके ना रहने पर बेटा कमा कर ला सके, पर रेशमा बेटा नहीं चाहती थी | वो नहीं चाहती कि बहु भी उसकी तरह शौहर की फिक्र मे रोज एक मौत मरे| और आखिर मे अलाह ने रेशमा की सुनली बेटा हुआ ही नहीं |
समय की रफ़्तार को कौन रोक पाया है अब साजिद तीन बेटियों का बाप और एक खुबसूरत पत्नी का का पति था साजिद अपने परिवार की हर जरुरत को पूरा करने की भरसक कोशिश करता था रोज के सौ रुपया कमाता था साजिद को देख कर सब को यही लगता कि हमे भी साजिद की तरह ही काम करके पैसा कमाना चाहिये |पर साजिद को तो कमाना ही था और कौन कमाता,चार जन की जिम्मेदारी उस पर थी |उपर से घर की औरत का बाहर जाकर कमाना उसे शुरू से ही पसंद नहीं था | उस वक्त सौ रुपया कमाना अपने आप मे बड़ी बात हुआ करती थी साजिद को तो कमाना ही था क्योंकि वो अपने धर्म के उसूलो का पक्का था उसने ये तय कर लिया था कि जब तक वो जियेगा उसकी बेगम और बेटिया कहीं भी और कुछ भी काम करने नहीं जाएगी |
एक दिन रेशमा ने कहा ''मै इतनी पढ़ी -लिखी हूँ, मुझे भी कुछ काम करने दोघर मे ज्यादा पैसा आएगा,| ''अगर इतना पैसा कम पड़ता है,तो कह दो मैऔर मेहनत कर लूँगासाजिदका इतना पक्का इरादा देख कर रेशमा को चुप होना पड़ा पर कैसे कहे साजिदसे कि पैसा तो कम पड़ेगा ही,तीन बच्चे है,| बड़ी बेटी अठारह साल की,छोटी पंद्रह और तेरह साल की है तीनो की पढाई का खर्चा कम नहीं है बड़ी बेटी का कालेज मे पहला साल भी शुरू हो गया है बहुत पैसा चाहिये घर चलाने के लिए पर साजिद को तो जैसे रोज का सौ रुपया बहुत ज्यादा लगता है रेशमा के कुछ समझ नहीं आ रहा था |वो साजिद को इस बारे मे, ज्यादा कुछ नहीं कह सकती,क्योंकि साजिदका काम ही ऐसा था,वो रस्सी पर चलने का काम करता था जमीन से पंद्रह माले से भी ऊपर रस्सी पर एक छोर से दुसरे छोर तक जाताऔर फिर पैरासूट से वापस नीचे आता था इस काम मे बहुत खतरा रहता है,तो उलफत साजिद को घर की परेशानी कभी बताती ही नहीं थी |साजिद को सभी चिन्ताओ से मुक्त रखना ही जैसे उलफत का परम धर्म था क्योंकि इसके कारण ही उसका सुहाग जिन्दा रह सकता है उसका ये मानना था | साजिद कभी नहीं डरता अपने काम से उसकी शर्ट पर तीन तमगे लग गये थे बहुत सारे इनाम भी जीते है देश -विदेश मे ये करतब दिखाने कंपनी के साथ जाता रहता है साजिद के इस काम से रेशमा की जान हमेशा हलक मे अटकी रहती है जब भी साजिद काम के लिए निकलता है,रेशमा अलाह ताला के सामने नमाज पढने को बैठ जाती है अलाह से अपने शौहर की सलामती के लिए दुआ मांगती है साजिद खुद का विज्ञापन करने के लिए अपनी शर्ट पर अलग -अलग केटेगरी के लेबल लगा कर विज्ञापन करता था ,जैसे वो एक मशीन बन गया हो |पर उसे सुकून था कि उसके घर की औरते बाहर कमाने नहीं जाती है और घर भी अच्छे से चल रहा है |
                                     आज साजिद अपने जीवन का सबसे बड़ा काम करने जा रहा था आज उसे वर्ल्ड रिकार्ड बनाने जाना था अगर ये रिकार्ड साजिद अपने नाम कर लेता है तो उसे दस लाख रुपया मिलने वाले थेऔर इन रुपयों को साजिद अपनी तीनो बेटियों के लिए कमाना चाहता था |बेटियों को अच्छी शिक्षा दिलाना उसका सपना था |और फिर बाप के पास पैसा होगा तो ही उसकी बेटियों को अच्छे घर के लड़के मिलेंगे | बिना पैसो के कौन किसी को पूछता है उसने इसके लिए सालो तैयारी की थी,कि वो ये इनाम की रकम जीत सके ,पर रेशमा की जान हलक मे थी रेशमा ने दो दिन पहले से ही अलाहसे दुआ मंगनी शुरू कर दी थी उसे डर था की साजिद उपर से गिर ना जाये,अगर उसे कुछ होता है तो वो सब साजिद के बिना नहीं रह पायेंगे | तीन जवान बेटियों को लेकर वो अकेली कैसे जी पायेगी| पर साजिद आज बहुत ऊंचाई पर जाकर रिकार्ड बनाना चाहता था |वो साजिद को मना भी करना चाहती थी पर वो कहाँ मानने वाला था|बस सब कुछ अलाह के भरोसे छोड़ दिया सब को साजिदपर भरोसा था और साजिदको खुद पर तीन बड़ी बेटियों की माँ उलफत आज बहुत डरी हुई थी|साजिद निकल गया पर उसने जाने से पहले रेशमा को साथ चलने को कहा पर उसने मना कर दिया रेशमा ये सब कभी भी नहीं देखती थी 
                                 सारा पंडाल खचाखच भरा था आज सरकस के मालिक की सारी टिकटे बिक गयी थी सब साँस रोक कर साजिदका खेल रस्सी पर चलने का देख रहे थेसाजिद चल रहा था रस्सी परलोग प्रार्थना कर रहे थे कि साजिदसफल हो कर लौटे पर अचानक साजिदका पैर उचका और वो ऊंचाई से नीचे गिरा और साजिद मर गया रेशमा को जिस बात का डर था वही हुआ रेशमा और उसकी बेटिया आखिरकर अकेली रह गयी कुछ दिन बाद रेशमा ने बड़ी बेटी से कहा''कल से मै काम ढूंढने जा रही हूँ बेटी ने कहा ''मै भी काम करूंगीरेशमाने कहा लोग क्या कहेंगे तो बेटी ने कहा अम्मीकुछ नहीं कहेंगे लोग अब अबू,नहीं है हमे सँभालने के लिए काम तो हमे ही करना पड़ेगा |रेशमा और तीनो बेटिया रोने लगी थी | आखिरकार साजिद की बीवी को कमाने को बाहर जाना पड़ा |
                            शांति पुरोहित  

Sunday, 19 May 2013

               धरोहर एक गुरु की          सूश्री शांति पुरोहित की कहानी    (  धरोहर एक गुरु की  )




                                                                                                                                                              सदर बाजार मे पीपल के पेड़ के गटे पर टाट-पट्टी बिछा कर बैठता है पन्ना लाल ! उसके दाई और एक लकड़ी कि पेटी रखी रहती है,जिसमे उस्तरा,कैंची मशीन और कंघा रहता है | पास मे ही पानी कि बाल्टी रखी है,वो  बाल काटते वक्त पानी उसी मे से लेता है |
                                          उन दिनों आज की तरह ''ब्यूटीपार्लर'' का चलन नहीं हुआ करता था |लोग-बाग़ यहाँ नाई के पास आकर बाल कटवा लिया करते, हजामत भी करवा लेते थे | पुरे दिन खटने के बाद भी पन्ना की कमाई दो-तीन रुपया ही होती थी | शहर से दूर कच्ची बस्ती मे कच्चे मकान बस्ती वाले लोगो के बने है,वही  पर पन्नालाल का भी घर है | घर की दीवारे गारे-गोबर की,और छत खपरेल की बनी थी | घर की औरते फर्श को गारे से लीप लेती थी |
                                पन्ना ने सोचा ''खाली बैठने से तो बैगार ही भली'' ये लोग जहाँ ज्यादा घर होते है,वही किसी गली के मोड़ पर या किसी दरख्त के नीचे बने गटे को अपना ठिकाना बना लेते है | आस- पास के घरो के लोग इनके पास आते रहते है जिनसे इनकी रोजी-रोटी चलती रहती है,और लोगो को अपने इस काम के लिए ज्यादा दूर भी नहीं जाना पड़ता है |
                                गाँव मे कोई मरता है, तो ये वहां जाना पहले पसंद करते है,क्योंकि वहां एक ही दिन मे अच्छी कमाई हो जाती है | बाप का जो काम,वही पन्ना का काम, और अब अपने बेटे को भी पन्ना इसी काम मे लगाना चाहता था | कई बार अपने बेटे सोहन को दूकान पर बैठा कर पन्ना घरो मे लोगो के कटिंग करने जाता था | सोहन ने काम तो अभी तक कुछ भी नहीं सीखा था |
                                जहाँ पन्ना बैठा करता था,वहा सामने बने आलिशान घर मे सीनियर सेकंड्री स्कूल के प्रिंसिपल साहब अपने परिवार सहित रहते थे | तेज गर्मी,सर्दी और बरसात मे पन्ना उन्ही के घर के आगे बने बरामदे मे बैठ जाया करता था |
                                  पन्ना की इतनी आमदनी नहीं थी कि वो सोहन की पढाई चलने दे;पांचवी पास करते ही सोहन का स्कूल से नाम कटवा लिया और धंधे पर लगा लिया | पर एक बार सोहन स्कूल क्या गया उसका मन अब पढने के सिवा किसी और काम मे नहीं लगता | अक्सर सोहन पिंसिपल जी के घर से पढने के लिए कोई किताब मांग कर ले आता और दुकान पर पढता रहता | पिंसिपल जी की नजर से ये छुप नहीं सका कि सोहन को पढने का मौका मिले, तो ये पढ़-लिख कर बहुत बड़ा आदमी बन सकता है |
                                   सोहन की पढने की लगन देख कर प्रिंसिपल साहब ने एक दिन पन्ना से पूछा ''तुमने सोहन को पढने से क्यों रोका वो बहुत होशियार है, पढने मे उसकी बहुत रूचि है,मै चाहता हूँ तुम उसे पढाने के बारे मे एक बार फिर से सोचो ?'' मै मदद करने को तैयार हूँ, तुम ठीक समझो तो जरुर बताना, मै तुम्हारे जवाब की प्रतीक्षा करूँगा |
                                 '' कैसे हां भरू साहब...अपनी लाचारी व्यक्त करते हुए पन्ना बोला, सुबह से शाम तक खटता हूँ तो भी बच्चो के पेट पालने तक की कमाई नहीं होती है......तो इसकी फीस,किताबे,कापियों का खर्चा कहाँ से निकालूगा |'' ये तो प्रिंसिपल साहब जानते ही थे कि पन्ना की मुख्य समस्या यही रही होगी |प्रिंसिपल साहब ने कहा ''देखो बच्चे को पढ़ते हुए तो तुम भी देखना चाहते होगे,तो ये खर्च की चिंता तुम मुझ पर छोड़ दो ,ये सब मै देख लूँगा....अगर सोहन का मन पढने मे वापस लगता है तो इसके पढने का खर्च मै करूँगा |
                                  पन्ना लाल बहुत खुश हुआ और कहा ''आप मेरे बच्चे के लिए इतना सब करने के लिए तैयार है,तो ये बहुत बड़ी मदद होगी सोहन के भविष्य के लिए,मेरे सारे परिवार के लिए बहुत बड़ी बात है | आप बड़े दयालु हो...आपके दिल मे हम जैसो के लिए इतनी दयालुता देख कर मै आपमें भगवान के दर्शन कर रहा हूँ |आपको भगवान खूब बरकत दे |
                                   सोहन ने उसी दिन प्रिंसिपल साहब को अपना गुरु माना;उनके निर्देशन मे उसने दसवी क्लास मे दूसरी पोजीशन लाकर साबित कर दिया कि प्रिंसिपल साहब ने उस पर विश्वास करके कोई गलती नहीं की है उसने उनकी उम्मीद पर खरा उतरना शुरू कर दिया है | गाँव और स्कूल का नाम रौशन किया |पन्ना के कुटुम्ब,परिवार मे यहाँ तक पूरी जात मे सोहन पहला बच्चा है, जिसने दसवी पास की,वो भी पोजीशन के साथ | प्रिंसिपल साहब आज से दस साल पहले कलकता से आये थे,तब से इसी हाई स्कूल के प्रिंसिपल है | गरीब,होनहार, प्रतिभाशाली बच्चो को सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओ से मदद दिला कर उन्हें आगे बढ़ने मे हमेशा मदद की है | अब तक सैकड़ो बच्चो को वो पढने के अवसर उपलब्ध करा चुके है | और एसी प्रतिभाओ को तराशने के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहते है |उदारमना, जो है गाँव वाले उनकी बहुत इज्जत करते है |
                                 अपनी मेहनत और लगन से सोहन ने सीनियर भी अच्छे अंक के साथ उतीर्ण कर ली | अब पन्ना उसे अपने पुस्तैनी काम मे लगाना चाहता था | चाहता था कि सोहन काम मे मदद करेगा तो कमाई ज्यादा होगी | पर प्रिंसिपल साहब को ये पता चला तो कहा ''पन्ना पहले तुम सोहन की राय तो जान लो,वो क्या चाहता है| ''सोहन को पूछा तो उसने कहा ''मेरा फर्ज बनता है कि मै पिता की मदद करू, पर अपनी पढाई बंद करके नहीं,मै टयुसन पढ़ा कर पिताजी की मदद  करने के साथ अपनी पढाई जरी रखूँगा |''
                               पढने के साथ सोहन पिताजी की मदद भी करने लगा था | पन्ना खुश था बेटे से मदद पाकर | एक दिन प्रिंसिपल साहब ने सोहन से कहा ''तुम जितना चाहो पढो,कभी इंकार नहीं करूंगा,पर मेरी एक छोटी सी इच्छा है वो तुम्हे पूरी करनी है|''
                                 'जी, कहिये क्या करना है आपके लिए,''इच्छा सिर्फ इतनी सी है कि जब तुम पढ़-लिख कर कुछ बन जाओ तो अपनी जात-बिरादरी,भाई ,बहन और परिवार जन को भूल तो नहीं जाओगे ना| जो गरीब और आर्थिक रूप से पीड़ित हो उनकी मदद जरुर करना ,अपनी पढाई को अपने करियर तक सीमित  मत रखना | सब को तुम्हारी पढाई का फायदा मिलना चाहिये |''
                                 सोहन ने कभी नहीं सोचा कि प्रिंसिपल एसी कोई इच्छा उसके सामने रखेंगे | इसमें उनका तो कोई निजी फायदा भी नहीं था | अगर मै हां बोलू ,तो उनको आत्मसंतुस्टी होगी,और यही वो शायद मुझसे चाहते है | बहुत मायना रखती थी उनकी ये इच्छा सोहन के लिए| थोड़ी देर सोचने के बाद बोला ''सर पूरी कोशिश करूँगा आपकी इच्छा पूरी करने की |'' प्रिंसिपल साहब आश्वासन पाकर खुश हो गये |ढेरो आशीर्वाद दिया | तुम्हारी शिक्षा का लाभ सब को मिले नहीं तो सब बेकार हो जायेगा | कोशिश यही करना प्रतिभा संपन्न बच्चो की हर तरह से मदद करना | मैंने देखा है कि तुम्हारी जाती-बिरादरी के लड़के-लडकिया बहुत पिछड़े हुए है | सोहन ने हां कहा |
                               अगले तीन सालो मे ग्रेजुएसन हो गयी | ऍम.बी.ए. के लिए सोहन ने आई.आई.ऍम बंगलौर मे फॉर्म भरा हुआ था, चयन तो होना ही था,पढने मे तेज जो था | सोहन ने बैगलोर जाकर वहां की युनिवर्सिटी के बारे मे अपने सर,प्रिंसिपल साहब को सब बताया और उनका आशीर्वाद ले कर अपनी पढाई मे व्यस्त हो गया |दिन,महीने, साल बीतते गये;अब प्रिंसिपल साहब को बुढ़ापा-जनित रोगों ने घेर लिया था वो रिटायर हो कर अपने गाँव चले गये थे | उनका बेटा प्रशांत उनकी अच्छी तरह से सेवा-चाकरी कर रहा था | पर थोडा ठीक होते ही वो समाज-सेवा को निकल जाते थे |
                                   कुछ ही समय बाद सोहन सबका चहेता बन गया क्योंकि हर सेमेस्टर मे अव्वल आता था | यूनिवर्सिटी मे ही पढ़ाने का ऑफर मिला सोहन को और उसी वक्त फोरेंन की टॉप कंपनी से ऑफ़र आया | सोहन अच्छा पैकेज और विदेश मे रहने के लालच के लिए उस कंपनी का ऑफ़र स्वीकार कर लिया,और प्रिंसिपल साहब को पत्र द्वारा सूचना भेज दी | पत्र पाकर खुश हुए प्रिंसिपल साहब की ख़ुशी पत्र मे लिखा ये पढ़ कर गायब हो गयी कि ''सर मै विदेश जॉब के लिए जा रहा हूँ | ''ओह नो '' इतना बड़ा धोखा मेरे साथ किया सोहन ने,कोई बात नहीं ! पर मैंने तुमसे ये तो नहीं चाहा था | अब आगे कुछ नहीं कहूँगा और वो उदास हो गये थे |
                                उन्होंने सोहन को एक पत्र लिखा ''तुम मुझे धोखा कैसे दे सकते हो ? तुमने मुझसे मेरी इच्छा पूरी करने का वादा किया था | पर कोई बात नहीं अब से तुम् अपने फैसले खुद ले सकते हो | मै अब कुछ नहीं कहूँगा |'' पत्र पढ़ कर सोहन को जैसे एक झटका सा लगा,प्रिंसिपल का चेहरा आँखों के सामने घुमने लगा | और वो सब याद आया जो उसे सर ने कहा था | मन ही मन मे कुछ तय करते हुए सब से पहले उस विदेशी कंपनी को अपने नहीं आने की सूचना भेजी और प्रिंसिपल साहब को लिखा ''सर मुझे माफ़ करना मै लुभावने पेकेज के लालच मे आ गया था | अब अपने घर आ रहा हूँ, अपने पिताजी की और आपकी इच्छा जो पूरी करनी है | जैसे  ही सोहन का पत्र प्रिंसिपल साहब के घर पहुंचा उनके बेटे ने उनको पढ़ कर सुनाया | उन्होंने पत्र को अपने हाथ मे लिया और काँपते हाथो से उस पर लिखा ''शाबाश बेटे मुझे तुमसे यही तो आशा थी |'' और ढेरो आशीर्वाद दिया |
                         अंत मे प्रिसिपल साहब ने सोहन के आ जाने के बाद उसे बहुत कुछ समझा कर , उससे जी भर कर बाते कर लेने के बाद अंतिम साँस ली | सोहन रो पडा | सामाजिक सरोकार के कारण सोहन दस दिन तक प्रिंसिपल साहब के बेटे के साथ रहा और फिर अपने घर अपने गुरु प्रिंसिपल साहब से किये गये वादे को  पूरा करने आ गया था | साथ मे उनका लिखा वो पत्र भी ले कर आया जो सोहन के लिए प्रिंसिपल साहब की धरोहर के रुप मे था और हमेशा उसके पास रहेगा | उनकी धरोहर को संभालना अब सोहन के लिए उसके जीने का उद्देश्य बन गया था |
                                 शांति पुरोहित
  
मेरी कहानी पढना और अपने अनमोल प्रतिभाव देना. ".धरोहर एक गुरु की  "  

Thursday, 2 May 2013

दीपक तले अँधेरा













समाज कल्याण विभाग के प्रमुख रमाशंकर अपने माता -पिता की एक मात्र संतान थे | उनके माता -पिता ने उसका विवाह बड़े ही धूम -धाम से पास ही के गाँव के नगर सेठ की बेटी सीता से करा दिया था | रामशंकर के माता -पिता सुन्दर सुशील बहु को पाकर बहुत खुश थे | सीता सुन्दर तो थी ही साथ ही पढ़ी लिखी और समझदार भी थी | रमाशंकर भी इतनी गुणवान पत्नी पाकर बहुत खुश था |
शादी के एक साल बाद घर मे बच्चे की किलकारी गूंजने की खबर से सब खुश थे अपने वंश को आगे बढ़ता जान सब खुश थे पर सीता को उन सब की ये बात पसंद नहीं आई लड़की भी हो सकती है पर कुछ कह नहीं सकी और सीता ने बेटी को जन्म दिया | घर के सारे लोग नाराज हुए पर इसमें उसका क्या दोष था | बातो -बातो मे सीता ने अपने पति को समझाया कि पति -पत्नी मे से किसी एक मे कुछ कमी रहती है तो बेटी होती है वैसे सीता को पता था पर पति को स्पस्ट बता नहीं सकती घुमा फिरा के बताया तो भी रमाशंकर भड़क गये और गुस्से से सीता पर हाथ भी उठाया |
अभी बेटी एक साल की भी नहीं हुई सीता को दुसरे बच्चे के किये मजबूर किया पर दूसरी भी बेटी हुई| सीता पर वापस गुस्सा किया और कहा की तुम हमे बेटा कब पैदा कर के दोगी | जैसे बेटे की चाह ने रामशंकर को अँधा कर दिया था | फिर तीसरे साल मे सीता को बच्चे के लिए मजबूर किया | इस बार रामशंकर को किसी ने लिंग -परिक्षण कराने की सलाह दी जबरदस्ती जाँच कराने सीता को अपनी माँ के साथ भेजा | पता चला सीता के गर्भ मे दो बेटिया पल रही है जैसे ही रमाशंकर की माँ ने बेटे को फोन से जानकारी दी की जुड़वाँ बेटिया आने वाली है उस वक़्त रमाशंकर एक सभा मे भाषण देने गये थे रमाशंकर ने कहा की दोनों बेटियों को निकलवा दो अब और बेटी नहीं चाहिए और वो भाषण देने लगा | जब सीता और उसकी सास डॉ. के पास गर्भ गिराने की बात करने को गयी तो डॉ. ने कल आने को कहा फिर जब दोनों वापस घर के लिए निकली तो सीता ने कुछ बहाना बना कर सास को घर भेजा और खुद सभा स्थल पहुँच गयी और अपने पति के असल विचारो की पोल खोल दी ये सब सीता से जानकर विभाग ने रमाशंकर को उसी वक़्त पद से हटाया और पुरे विभाग वालो ने एक स्वर मे रमाशंकर आलोचना की थी | सीता ने तलाक लेकर अकेले रहने का फैसला किया |
सीता समझदार तो थी ही उसने दोनों बेटियों को जन्म दिया और अस्पताल के डॉ. से लिखवा लिया कि बेटी होने का कारण खुद रमाशंकर था और सब को दिखाया समाज कल्याण विभाग ने सीता की बहादुरी के लिए वो पद दे दिया | सीता की समझदारी से उसकी दोनों बेटिया बच गयी और दोनों डॉ. बन गयी अब सीता अपनी चारो बेटियों के साथ रहती है | रमाशंकर अब अपनी करनी पर पछता रहा है उसकी चारो बेटिया ऊँचे पदों पर काम कर रही है बेटे की चाह ने उसका सब 
कुछ बर्बाद कर दिया था |
ये कहानी भी पढना और प्रतिभाव देना
http://www.saadarblogaste.in/2013/05/blog-post_12.html