Saturday, 18 May 2013
Thursday, 2 May 2013
दीपक तले अँधेरा
समाज कल्याण विभाग के प्रमुख रमाशंकर अपने माता -पिता की एक मात्र संतान थे | उनके माता -पिता ने उसका विवाह बड़े ही धूम -धाम से पास ही के गाँव के नगर सेठ की बेटी सीता से करा दिया था | रामशंकर के माता -पिता सुन्दर सुशील बहु को पाकर बहुत खुश थे | सीता सुन्दर तो थी ही साथ ही पढ़ी लिखी और समझदार भी थी | रमाशंकर भी इतनी गुणवान पत्नी पाकर बहुत खुश था |
शादी के एक साल बाद घर मे बच्चे की किलकारी गूंजने की खबर से सब खुश थे अपने वंश को आगे बढ़ता जान सब खुश थे पर सीता को उन सब की ये बात पसंद नहीं आई लड़की भी हो सकती है पर कुछ कह नहीं सकी और सीता ने बेटी को जन्म दिया | घर के सारे लोग नाराज हुए पर इसमें उसका क्या दोष था | बातो -बातो मे सीता ने अपने पति को समझाया कि पति -पत्नी मे से किसी एक मे कुछ कमी रहती है तो बेटी होती है वैसे सीता को पता था पर पति को स्पस्ट बता नहीं सकती घुमा फिरा के बताया तो भी रमाशंकर भड़क गये और गुस्से से सीता पर हाथ भी उठाया |
अभी बेटी एक साल की भी नहीं हुई सीता को दुसरे बच्चे के किये मजबूर किया पर दूसरी भी बेटी हुई| सीता पर वापस गुस्सा किया और कहा की तुम हमे बेटा कब पैदा कर के दोगी | जैसे बेटे की चाह ने रामशंकर को अँधा कर दिया था | फिर तीसरे साल मे सीता को बच्चे के लिए मजबूर किया | इस बार रामशंकर को किसी ने लिंग -परिक्षण कराने की सलाह दी जबरदस्ती जाँच कराने सीता को अपनी माँ के साथ भेजा | पता चला सीता के गर्भ मे दो बेटिया पल रही है जैसे ही रमाशंकर की माँ ने बेटे को फोन से जानकारी दी की जुड़वाँ बेटिया आने वाली है उस वक़्त रमाशंकर एक सभा मे भाषण देने गये थे रमाशंकर ने कहा की दोनों बेटियों को निकलवा दो अब और बेटी नहीं चाहिए और वो भाषण देने लगा | जब सीता और उसकी सास डॉ. के पास गर्भ गिराने की बात करने को गयी तो डॉ. ने कल आने को कहा फिर जब दोनों वापस घर के लिए निकली तो सीता ने कुछ बहाना बना कर सास को घर भेजा और खुद सभा स्थल पहुँच गयी और अपने पति के असल विचारो की पोल खोल दी ये सब सीता से जानकर विभाग ने रमाशंकर को उसी वक़्त पद से हटाया और पुरे विभाग वालो ने एक स्वर मे रमाशंकर आलोचना की थी | सीता ने तलाक लेकर अकेले रहने का फैसला किया |
सीता समझदार तो थी ही उसने दोनों बेटियों को जन्म दिया और अस्पताल के डॉ. से लिखवा लिया कि बेटी होने का कारण खुद रमाशंकर था और सब को दिखाया समाज कल्याण विभाग ने सीता की बहादुरी के लिए वो पद दे दिया | सीता की समझदारी से उसकी दोनों बेटिया बच गयी और दोनों डॉ. बन गयी अब सीता अपनी चारो बेटियों के साथ रहती है | रमाशंकर अब अपनी करनी पर पछता रहा है उसकी चारो बेटिया ऊँचे पदों पर काम कर रही है बेटे की चाह ने उसका सब
कुछ बर्बाद कर दिया था |
ये कहानी भी पढना और प्रतिभाव देना
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Thursday, 4 April 2013
Monday, 1 April 2013
सार्थक होली
आज होली है और करुणा अपने घर के पूजा स्थल मे विराजित अपने कान्हा को सुगन्धित पुष्पों से होली खेला रही थी,तभी करुणा कि बारह साल की पोती प्रिया आई और कहा’’दादी,आप यहाँ बैठी हो,मैंने आपको सब जगह देखा|’’क्यों,क्या हुआ|,बाहर आओ ना रंग,गुलाल और पानी से होली खेलते है,अरे ! कहाँ है इतना पानी,बर्बाद करने के लिये| करुणा ने कहा | प्रिया को गुस्सा आगया ‘’आप को नहीं खेलना है तो मत खेलो मुझे तो खेलना है प्लीज आप पानी कि बर्बादी का वास्ता देकर मुझे मत रोको और वो चली गयी खेलने |
करुणा चुपचाप अपने कमरे मे जाकर बैठ गयी,सोचने लगी कि कैसे बच्चो को पानी कि कीमत समझाई जाये |करुणा ने मन ही मन कुछ तय किया,करुणा महाराष्ट्र मे रहती थी यहाँ पर पानी कि बहुत तंगी रहती है |पानी को देख कर ही खर्च किया जाता है|
कुछ दिनों बाद करुणा अपनी पोती प्रिया को उस जगह जे जाती है जहाँ,कई कई दिनों से पानी आता है |महाराष्ट्र का एक गाँव तो ऐसा है जहाँ पैतीस दिनों बाद पानी आता है |वहां के वासिंदो को पानी स्टोर करके रखना पड़ता है|करुणा अपने एक परिचित के घर प्रिया को ले कर जारही है रास्ते मे प्यास लगने पर प्रिया करुणा से बिसलेरी कि पानी कि बोटल खरीदने को बोलती है,तब करुणा ने कहा ‘यहाँ पानी ऐसे नहीं मिलता है ,तो कैसे मिलता है|’प्रिया ने पूछा,परिचित का घर आचुका था दोनों अन्दर गयी ,परस्पर अभिवादन के बाद सब बैठ गये थे |
करुणा ने बात शुरू करते हुए प्रिया से कहा ‘’यहाँ कई कई दिनों से पानी आता है .पीने के लिए ही मुश्किल से पानी मिलता है नहाने के लिए तो यहाँ कोई सोचता भी नहीं है |कई कई दिनों से यहाँ के लोग नहा पाते है |करुणा अपनी पोती को और भी कई घरो में ले कर गयी सब का यही हाल था सब पानी के लिये तरसते हुए नजर आये थे |
ये सब देख कर प्रिया बहुत दुखी हुई दादी से होली वाले दिन के लिए माफ़ी मांगने लगी’’मुझे नहीं पता था था कि पानी कि कितनी वेल्यु है हमारे जीवन मे,प्रिया ने कहा ‘’पानी बिना इंसान जिन्दा नहीं रह सकता है इसलिए आज से बल्कि अभी से तुम और तुम्हारे दोस्त सभी मिलकर ये वादा करो अपने आप से कि आगे से होली पर पानी कि बर्बादी नहीं करेंगे केवल पुष्प और गुलाल से होली खेलेंगे |’प्रिया ने अपनी दादी कि बात सहर्ष मानली करुणा ने पोती को गले से लगा लिया |
शांति पुरोहित
http://www.shuruaathindi.org/2013/03/blog-post_22.html
खुशी
‘सूरज,की पहली किरण जैसे ही धरती पर अपनी लालिमा बिछाती है...नीरू रोज सुबह सूरज के निकलने कि पहले ही उठ जाती थी...और सूरज का स्वागत करती थी | ये ही वो वक़्त था जिसे वो अपने लिये जीती थी |जैसे ही सूरज की किरण धरती पर आती है ,वो उन्हें अपनी बांहों में समेट लेती और दस मिनिट तक तक आँखे बंद करके खुद मे खो जाती है |उसी वक़्त घर मे से आवाजे आनी शुरू हो जाती है | ‘मम्मी जल्दी क्यों नहीं उठाया,मुझे आज जल्दी कालेज जाना था , नीरू के बेटे जीत आवाज आई अभी वो इसका कुछ जवाब दे,तभी नीरू की तेरह की साल की बेटी पिंकी कहती है,;मम्मी आज मेरे टिफिन मे सेंडविच बना कि डालना मेरे फ्रेंड्स को बहुत पसंद है |
जैसे ही ये दोनों काम नीरू ख़तम करती है,तभी ससुर जी की आवाज आती है की’नीरू चाय मुझे बाहर आँगन मे ही दे जाना आज यही परर बैठ कर चाय पिने का मन कर रहा है |’ तभी सासुजी कि आवाज नीरू के कानो मे आती है ,;नीरू बेटा मुझे चाय कमरे मे ही दे जाना बाहर थोड़ी ठण्ड है |एक को इधर एक को उधर,तभी उसे याद आया की आज ‘ नीरव , की शर्ट भी इस्त्री करनी है,नहीं तो सुबह –सुबह डांट खानी पड़ जाएगी | वो दौड़ कर इस्त्री करने चली गयी |
फिर उसने नीरव को उठाया......नीरव चाय पीता है तब रोज दस मिनिट उनके पास बैठना पड़ता है | ये दस मिनिट वो नीरव के लिये मुश्किल से निकालती ,अपने आप से ही सवाल करती है कि वो इतने से वक़्त मे क्या काम लेगी | नीरव उसे कितना प्यार करता है पर वो दस मिनिट भी नहीं निकाल पाती | नीरव को नीरू का दस मिनिट उसके पास बैठना समझ ही नहीं आता,क्योंकि उस वक़्त नीरू का ध्यान उसका टिफिन बनाने मे लगा रहता था |
सबके चले जाने के बाद वो खुद की चाय ले कर बैठी ही थी की ससुर जी की आवाज आई ‘नीरू मेरा तौलिया कहाँ है ,वो चाय रख कर तौलिया देने गयी वापस आई तब तक चाय ठंडी हो गयी |वैसी ही चाय को पीकर वो चल दी वापस बाकि के काम निपटाने | शाम कब हो जाती थी उसे पता नहीं चलता था |अब वापस वो ही शाम का खाना बानाना वो ही शिकायते,ये क्यों बनाया ,ये क्यों नहीं बनाया ,क्या करती हो सारा दिन |रोज रोज ये ही सब सुन कर अब नीरू तंग आगयी थी |
आज उसकी शादी की शालगिरह है,पर घर मे किसी को भी याद नहीं,सब अपने अपने काम मे जुटे थे,और अपनी अपनी जरुरत की चीज मांगने मे लगे थे |यहाँ तक कि खुद नीरव को भी अपने शादी की शालगिरह याद नहीं थी | सब चले गये तो नीरू की आँखों मे आंसू आगये | अपनी सासुजी के पास बैठ कर रोई और उन्हें कहा कि शायद माँ अपने बेटे की शादी इसलिए करती है कि उसे आगे जाकर कोई काम न करना पड़े ,राधा देवी उसकी सासुजी सुनकर कुछ नहीं बोली ,बस उठ कर अपने कमरे मे चली गयी |
रात को’ नीरव, आया बच्चे आये | वो रात का खाना बनाने मे जुट गयी पर अन्दर ही अन्दर जल रही थी | कि किसी को कुछ याद नहीं,लगता है ,मै इस घर कि कामवाली बाई हूँ,जो दिन भर इनको सभालने मे लगी रहती है | तभी घर कि बेल बजी और एक आदमी हाथ मे केक लिये खड़ा है जिस पर लिखा हैniru from sasu maa सब देखते रह गये,नीरू ने सासुजी के पैर पकड़ कर माफ़ी मांगी वो दिन मे उनको सुना कर आई थी इसलिए,तभी सास राधा देवी ने उसे दो टिकिट दिए और कहा कि जाओ घूम कर आओ दार्जिलिंग तुम और नीरव |
राधा देवी ने नीरू से कहा ‘’मे जानती हूँ तुम हम सब को सँभालने मे कितनी परेशां होती हो,पर नीरू ये घर इसलिए ही टिका है कि तुम अच्छे से संभालती हो ,तुम इस घर की काम वाली बाई नहीं ,घर की मालकिन हो | बड़े नसीब वाले है हम ,हमें तुम जैसी बहु मिली ,जो गृह लक्ष्मी बन कर इस घर मे आई है |
अब राधा देवी ने नीरू से कहना शुरू किया ‘’जब मै इस घर मे बहु बन कर आई ,मेरी सासुजी का सवभाव बहुत तेज था ,बात बात मे उनका टोकना रोज का काम था | मै उनसे बहुत डरती थी ,बाद मे मैंने सोचा ऐसे कसे चलेगा |धिरे धिरे मैंने उनके दिल मै अपने लिये जगह बनानी शुरु की ,और कुछ ही सालो मे उनकी और मेरी पक्की दोस्ती हो गयी | अब हम दोनों के बिच मे माँ बेटी का रिश्ता कायम हो चूका था | अब घर मे सब खुश थे | तुम्हारे ससुर जी बहुत खुश हुए मेरे इस काम से ‘’तुमने कसे इतनी जल्दी मेरी माँ का मन जीत लिया ,सच मे तुम ने इस घर को नरक होने से बचालिया मे बहुत खुश हूँ |
शांति पुरोहित
shanti.purohit61@gmail.com
http://www.shuruaathindi.org/2013/03/blog-post_31.html
Saturday, 23 March 2013
सुधा की व्यथा
- ‘’रामपुर’’छोटा सा है पर अंधविश्वास और कुरीतियों से सरोबार था,सदियों पुरानी कुप्रथाए आज भी प्रासंगिक है | जैसे –बाल-विवाह,स्त्री शिक्षा और विधवा –विवाह आदि|बाल –विवाह के फलस्वरूप दुस्परिनाम भुगतते रहने के बाद भी आज भी बड़ी तादाद मै गाँवो और शहरों मै बालविवाह होते रहते है|बाल विधवा को ही अभागी समझा जाता है या ईश्वरीय प्रकोप मान कर चलते है |
गाँव के अस्पताल मै डॉ.की कमी के कारन बड़ी बीमारियों का इलाज शहर जाकर करवाना गाँव वालो के बस मै नहीं होता है |परिणाम स्वरूप बाल मरतु दर ज्यादा होती है फल स्वरूप बच्चियों को विधवा होने का दंश झेलना पड़ता है |
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| लेखिका |
विधवा का पुनः विवाह करना तो गाँव वाले अपने परिवार कि तोहीन समझते है |इसके विपरीत बड़ी बूढी महिलाये विधवा को कैसे जीना है’उनके लिए अनेको कड़े कानून कायदे निर्धारित करती है |कांटो भरा जीवन जीना पड़ता है खुली हवा मै साँस लेना तक दूभर होता था
‘रामपुर गाँव मे लडकियों को पढाने कि इच्छा रखना तो जैसे रेगिस्तान मे पानी की बूंद चाहने जैसा था |आगे जाकर घर का काम ही तो करना है फिर पढ़ कर कौन सा बैरिस्टर बनना है | ये कहा जाता था |
ऐसे गाँव कि रहने वाली थी मेरी कहानी की नायिका सुधा | भाई बहनों मै सब से छोटी होने के कारण हर चीज के लिये तरसना पड़ता था| इससे बड़े भाई बहनों कि जरुरत पूरी नहीं होती थी | किसी भी मांग पर सुधा को ये सुनने को मिलता था कि ‘’पहले जो तुमसे बड़े है उनकी तो जरुरत पूरी हो फिर तुमारा नम्बर है|
और वो दिन कभी सुधा के जीवन मे नहीं आया,पिताजी गाँव के ही जमींदार के खेत मे किसानी करते थे|परिवार कि बुनियादी जरुरतो को ही मुश्किल से पूरी कर पाते थे ,तो बच्चो को स्कूल भेजना तो बहुत दूर कि बात थी |जैसे तैसे कर के परिवार का भरण पोषण कर रहे थे |
एक दिन घर मे कोहराम मच गया सुधा के पिता ने सुधा के छ साल के पति के किसी बीमारी से मरने कि खबर सुनाई |माँ को रोते बिलखते देख वो भी रोने लगी उसके साथ जो घटित हुआ उससे तो बेखबर थी कि उसके तो भाग ही फूट गये |
उसका जीवन तो शुरू होने से पहले ही ख़तम हो गया था | मासूम बच्ची को अब कांटो भरा जीवन जीना होगा ये सोच कर माँ का तो जैसे कलेजा मुह को आ रहा था |नियति के क्रूर हाथो ने उसके कलेजे के टुकड़े का सब कुछ ले लिया था |
अब सुधा के माँ बापू पर कटे पंछी कि भांति हो दुखी थे कैसे उम्र भर बेटी को संभाल सकेंगे ,दोबारा विवाह कर नहीं सकते|विधवा को हेय द्रष्टि से देखा जाता थ अपशकुनी माना जाता था| परिवार कि बड़ी औरतों दवारा निर्धारित किये गये नियमो के अनुसार ही हर विधवा को चलना था |
समय ने रफ़्तार पकड़ी अब सुधा चौदह साल कि हो गयी थी |वो कुछ काम करके अपना जीवन यापन करना चाहती थी बोझ बन कर नहीं रहना था उसे |सुधा गाँव के ही एक सेठ के घर मे काम करने लगी सेठानी को रसोई के काम मे मदद करने लगी और वो उनके घर मे ही रहने लगी थी |एक बार सेठानी कि ननद मुंबई से आई उसने सुधा को देखा तो भाभी से कहा ‘आप इज़ाज़त दो तो सुधा सुधा को मुंबई ले जाऊ ,तुरंत ही उसके बापू को बुलाया थोड़ी देर बाद वो सुधा को भेजने को राजी हो गये सेठजी कि बहन थी तो सोचने कि तो कोई बात ही नहीं थी |
अब सुधा नई मालकिन सेठानी कि ननद कविता थी |कविता ने सुधा को स्कूल मे दाखिला दिलाया और पढ़ाने के साथ साथ उसे मुंबई जैसे बड़े शहर मे रहने के तौर तरीके भी सिखाने लगी |वहा कि भागती हुई जिन्दगी मे लोग सवेरे जल्दी निकल जाते है और देर रात थके मांदे लोकल ट्रेनों मे सफ़र करते हुए घर पहुंचते है |कविता और उसके पति भी ऑफिस मे काम करते है |
सुधा के मुंबई आने के बाद कविता के घर बेटी का जनम हुआ सुधा ने सब कुछ संभाल लिया था |कुछ समय बाद बेटी कि जिम्मेदारी भी सुधा को सौप दी गयी थी |सुधा कविता कि बेटी को अपनी बेटी कि तरह पालने लगी |उसे मान मनुहार करके दूध पिलाना ,खाना खिलाना ,पार्क मे लेजाना आदि सब वो ही करती थी |जब नीलू स्कूल जाने लगी तो सुधा उसे स्कूल छोड़ने और लेने जाती थी |
समय ने फिर रफ़्तार पकड़ी कविता के साथ रहते हुए सुधा को पच्चीस साल होगये थे इस दौरान सुधा को कभी ये नहीं लगा कि कविता मालकिन और वो काम वाली बाई ह| कहते है न कि बेटिया कब बड़ी हो जाती है माँ बाप को पता ही न चलता है |नीलू कि शादी कि घर मे चर्चा होने लगी |कभी लड़के वाले कविता के घर आते कभी वो लड़का देखने जाते थे |अब सुधा बैचैन रहने लगी वो सोच मे पड़ गयी कि बिना नीलू के वो कैसे रह पायेगी |आख़िरकार नीलू का रिश्ता तय हुआ वो शादी के बाद अपने पति के घर चली गयी |
अब सुधा को खालीपन लगने लगा जैसे अब उसके पास करने को कोई भी काम नहीं है |कविता और उसका पति सुबह ही ऑफिस चले जाते थ |’क्या तुम नीलू के घर काम करोगी,पूछा कविता ने ?सुधा को जैसे अपने कानो पर विश्वास नहीं हुआ ‘क्या आप सच कह रही हो ?’हां ‘सच ही कह रही हु ‘उसके यहाँ से जाने के बाद तुम बीमार रहने लगी हो | तुमारा उसके प्रति प्यार देख कर लगता नहीं कि तुम उसके बिना जी पाओगी ‘तो मैंने ये निर्णय लिया है | जैसे प्यासे को पानी मिलगया हो उसने जल्दी से हां बोल दी थी |
कविता ने अपने दामाद और नीलू से बात कि दामाद को कहा ‘बेटा सुधा एक नेक और इमानदार इंसान है पच्चीस सालो से काम कर रही है नीलू को बेटी मानती है तुम कहो तो इसे तुमरे घर भेज दू | नीलू और दामाद कि हां हुई और अब सुधा नीलू के घर आगयी थी |नीलू का स्वभाव भी अपनी माँ कविता जैसा ही था सुधा नीलू के घर के काम को अच्छी तरह से सँभालने लगी |
नीलू कि बचपन से ही आदत थी वो अपनी किसी भी चीज को ठीक से नहीं रखती थी उसकी सुधा अम्मा ही ही ये सब करती थी |यहाँ भी वो ऐसे ही करती थी अब यहाँ भी उसकी सुधा आगयी बिखरी हुई चीजों को करीने से रखने के लिए | उसके पति को नीलू कि ये लापरवाई कतई पसंद नहीं थी अक्सर वो नीलू पर इस बात के लिये नाराज होता था पर उसे कोई चिंता नहीं थी .उसे थो अपनी सुधा अम्मा पर तब से भरोसा था .जब उसने अम्मा कि ऊँगली पकड़ कर चलना सीखा था तो लाजमी है अविश्वास कि तो कोई बात ही नहीं थी |नीलू और उसका पति दोनों एक बड़ी कंपनी मे काम करते थे | कंपनी का मेनेजमेंट वो ही देखते थे बहुत वयस्त रहते थे पर दो दिन अपने मौज मस्ती के लिये निकाल ही लेते थे | और निकल जाते पिकनिक मनाने अपने |ऐसे ही वो दोनों अपने किसी रिश्तेदार के घर शादी मे गये थे ,वापस आकर जल्दी से नीलू ने अपने कीमती हीरे के गहने और कपडे ऐसे ही उतार कर पलंग पर रख दिये और खंडाला के लिये निकल गये| वहां पहुँचते ही नीलू को अपने गहनों कि याद आई पर उसने कहा चिंता कि कोई बात नहीं है ,सुधा अम्मा है न वो संभाल कर रख देगी .पर उसका पेटी बहुत नाराज हो रहा था था |उसका मानना था कि इतने कीमती गहने और रुपया देख कर तो किसी का भी मन डोल सकता है |पर नीलू निश्चिंत थी फिर भी उसका मन नहीं लग रहा था |बड़ी मुश्किल से वो रात काटी |वापस आकर नीलू ने सबसे पहले अपनी माँ को फ़ोन किया साडी बात बतायी कविता बोली ‘’अरे ‘’नीलू इतनी सी बात के लिये नाहक ही अपना प्रोग्राम छोड़ कर आई वो तेरी ‘सुधा अम्मा ‘’ है उसे तुमसे प्यार है ,गहनों से नहीं|’कोई ‘बात नहीं अब आगये हो तो सम्भाललो अपने गहने ;जय से ही फ़ोन कट हुआ सुधा ने एक बैग उसके हाथ पर रखा और कहा’’नीलू बेटा ये तुम्मारे गहने मेरे पास फ़ोन नंबर नहीं थे कैसे बताती पर मे रात भर सो नहीं सकी थी |सुधा ने फ़ोन पर कि गयी नीलू कि बाते सुन ली थी ,वो तो गहने देने ही कमरे मे आरही थी |नीलू ने अपने पति कि और देखा तिरछी नजर से और मन ही कहा देखो मैंने कहा था न कि सुधा अम्मा सब संभाल लेगी ,उसके पति कि नजरे नीची हो गयी |नीलू सुधा के गले लग गयी और तीनो जन खाना खाने के बाद सोगये थे |
सुबह सुधा अम्मा के हाथ कि चाय नहीं मिलने पर वो उसके कमरे गयी तो देखा वो वंहा नहीं थी,सुधा को घर मे ना पाकर नीलू रोने लगी पर उसका पति घर के सामान को देख रहा था कि वो कुछ लेकर तो नहीं गयी इसी दौरान उसका लिका पत्र मिला नीलू पड़ने लगी ‘’नीलू मे जा रही हूँ ,तुम्हारे पति को मुझ पर भरोसा नहीं और बिना भरोसा मे कंही नहीं रहा सकती |और हां ‘’मै कविता मैडम ‘’के घर नहीं जा रही हूँ |
अब जिसे भी रखो संभाल के रखना जमाना खराब है और हाँ अपने गहनों को भी ......पढ़ कर नीलू रोने लगी अब तो उसके पति ने भी अपना सर पकड़ लिया और बोला ईमानदार सुधा अम्मा को हमने शक करके खो दिया है |नीलू सोच रही है कि माँ को क्या जवाब देगी| सुधा ने अब अपना बाकी का जीवन वापस अपने गाँव मे गुजारने के लिए सोचा है
नीलू सोच रही है कि जिस सुधा माँ ने हमारे साथ सालो परिवार कि तरह काटे आज अपने स्वाभिमान कि रक्षा के लिये एक झटके मे सब कुछ छोड़ कर वापस अपनी दुनिया मे चली गयी है |
शान्ति पुरोहित
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